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Interview: क्या मुस्लिमों को लुभाने के लिए कादरी को मिला पद्मश्री? मोदी की तारीफ करने वाले कलाकार ने दिया जवाब
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शाह रशीद अहमद कादरी
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से पद्मश्री प्राप्त करने वाले कर्नाटक के बिदरी शिल्प कलाकार शाह रशीद अहमद कादरी गुरुवार को पूरे दिन चर्चा में रहे। दरअसल, सम्मान समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी बातचीत के वीडियो पर जमकर सियासत हो रही है। इस वीडियो में कादरी प्रधानमंत्री की तारीफ कर रहे हैं।सम्मान समारोह के दौरान जब प्रधानमंत्री ने कादरी को बधाई दी और हाथ मिलाया तो उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा कि मैं यूपीए सरकार के दौरान पद्म पुरस्कार के लिए मैंने कई बार कोशिश की, लेकिन मुझे यह नहीं मिला। जब आपकी सरकार आई तो मैंने सोचा कि अब भाजपा सरकार मुझे कोई पुरस्कार नहीं देगी,' लेकिन आपने मुझे गलत साबित कर दिया है। मैं आपका तहेदिल से आभार व्यक्त करता हूं। उनके इसी बयान पर सियासत हो रही है। उनके बयान और बिदरी कला को लेकर अमर उजाला ने रशीद अहमद कादरी से बातचीत की। पढ़िए इस बातचीत के प्रमुख अंश…
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से पद्मश्री प्राप्त करते शाह रशीद अहमद कादरी
- फोटो :
SOCIAL MEDIA
सवाल: बिदरी कला का इतिहास कितना पुराना है और ये कैसे आगे बढ़ा?
जवाब: बिदरी कला कर्नाटक के बीदर से निकली इसलिए इसका नाम बिदरी कला है। करीब 600 साल पहले बीदर में किला बन रहा था। तब ईरान से एक कारीगर को बुलाया गया था, जो पत्थर और लोहे में कारीगरी करता था। वह अपनी तकनीक को छुपाकर काम करता था। शेट्टी परिवार के लोग उसके पीछे पड़े थे। इन लोगों ने किसी तरह से वह तकनीक हासिल करके एक नया काम शुरू किया। उन लोगों ने जिंक मैटल पर काम शुरू किया। और उसे नाम दिया बिदरी वर्क। ये दोनों कारीगर किसी को अपना काम नहीं बताते थे। लेकिन, एक दिन दोनों में झगड़ा हो गया। इसके बाद उनमें से एक ने कसम खाई कि यह काम गली-गली तक फैला दूंगा।
इसके लिए वह उस वक्त के जागीरदारों के पास गया। उनसे पैसे की मदद मिली। जागीरदारों ने यह काम शुरू किया। जागीरदारों की जागीरदारी जाने के बाद ये लोग सामान बेचने के लिए बाजार में निकलें। उस वक्त जो सामान बिकता था। तराजू के एक पलड़े में सामान रहता था और दूसरे पलड़े में उस दौर की करेन्सी रहती थी।
काम बढ़ा तो दूसरे लोगों को इसमें शामिल किया गया। बीदर में इसके 100 कारीगर हैं। हैदराबाद में इसकी मार्केटिंग होती है। शुरू में इसे हैदराबादी बीदर कहा जाता था। लेकिन, मैंने इसमें प्रयास करके इसकी पहचान दिलाई कि यह सिर्फ बीदर में बनता है जो कर्नाटक में है। हालांकि, बिदरी काम की पहचान के लिए कर्नाटक सराकर की ओर कोई खास प्रयास नहीं किया गया।
सवाल: एक बर्तन पर बर्क करने में कितना वक्त लगता है?
जवाब: किसी बर्तन को बनाने के लिए कितना वक्त लगेगा यह बर्तन के साइज पर निर्भर करता है। जैसे एक 25 हजार की एक सुराही है तो उसको पूरा करने के लिए 20 दिन का समय लगता है।
सवाल: बिदरी काम आपने कैसे शुरू किया?
जवाब: हम पिछली तीन पीढ़ियों से यह काम कर रहे हैं। इस काम में कादरी परिवार के ही लोग रहे हैं। हमारे खानदान में ही कई लोग यह काम करते थे। दसवीं तक पढ़ाई के बाद मैंने इसी काम को अपना लिया। इस काम ने मुझे कामयाबी दिलाई। 1970 से ही यह काम मैं कर रहा हूं। 1984 में कर्नाटक सरकार से पहला पुरस्कार मिला। उसके बाद भी कई राष्ट्रीय और राजकीय अवार्ड मिले। मुझे याद भी नहीं अब तक मुझे कितने अवार्ड मिल चुके हैं। इसी काम ने मुझे पहचान दिलाई।
सवाल: बिदरी कला में पिछले पांच दशक में क्या बदलाव आए हैं?
जवाब: बीते पांच दशक में हमनें कई डिजाइनें और पैटर्न विकसित किए हैं। ऐसा करने से बिक्री में भी फर्क आया और सेल ज्यादा होने लगी। इसके लिए मैंने बहुत मेहनत की।
सवाल: सम्मान समारोह के दौरान आपने जो बातें प्रधानमंत्री से कहीं, विरोधी कह रहे हैं कि ये आपसे कहलवाई गई हैं, इस पर आपका क्या कहना है?
जवाब: मेरे दिल में जो था वो बातें मैंने प्रधानमंत्री से कह दी। मुझे इल्म होता कि इस तरह के वीडियो वायरल होगा तो मैं यह बात नहीं बोलता। जो लोग मेरे ऊपर इल्जाम लगा रहे हैं वह सरासर झूठ है। न तो मैं बिकाऊ हूं न ही किसी की बात सुनकर बात कहता। अगर मैं बिकाऊ होता तो इस अवार्ड के लिए 10 साल का इंतजार नहीं करता। ऊपर वाले ने मोदी जी को बोलकर मुझे ये अवार्ड दिलाया है।
सवाल: आपने यूपीए सरकार के वक्त अवार्ड के लिए किस तरह प्रयास किए थे?
जवाब: जब कलर फोटो बहुत महंगे थे। एक बार मैं अप्लाई करता था तो मुझे बहुत महंगा पड़ता था। एक प्रोफाइल बनवाने के लिए चार हजार का खर्च आता था। तीन प्रोफाइल बनाकर मैं अप्लाई करता था। एक मैं कर्नाटक सरकार को देता था। दूसरा डेवलपमेंट कमिश्नर हेंडिक्राफ्ट को देता था और तीसरा गृह मंत्रालय भेजता था। पांच साल तक मैंने अप्लाई करता रहा लेकिन कहीं से कोई जवाब कभी नहीं आया।
सवाल: कहा जा रहा है कि आपको यह पुरस्कार कर्नाटक चुनाव में मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए दिया गया है, आपका क्या कहना है?
जवाब: मैं ज्यादा राजनीति नहीं समझता हूं। जहां तक मुझे पता है कि चुनावों का एलान मार्च के अंत में हुआ। लेकिन, जहां तक मुझे लगता है कि 2022 में ही इस अवार्ड की फाइनल लिस्ट बनी थी। जब कर्नाटक में चुनाव की कोई सुगबुगाहट नहीं थी।
जवाब: बिदरी कला कर्नाटक के बीदर से निकली इसलिए इसका नाम बिदरी कला है। करीब 600 साल पहले बीदर में किला बन रहा था। तब ईरान से एक कारीगर को बुलाया गया था, जो पत्थर और लोहे में कारीगरी करता था। वह अपनी तकनीक को छुपाकर काम करता था। शेट्टी परिवार के लोग उसके पीछे पड़े थे। इन लोगों ने किसी तरह से वह तकनीक हासिल करके एक नया काम शुरू किया। उन लोगों ने जिंक मैटल पर काम शुरू किया। और उसे नाम दिया बिदरी वर्क। ये दोनों कारीगर किसी को अपना काम नहीं बताते थे। लेकिन, एक दिन दोनों में झगड़ा हो गया। इसके बाद उनमें से एक ने कसम खाई कि यह काम गली-गली तक फैला दूंगा।
इसके लिए वह उस वक्त के जागीरदारों के पास गया। उनसे पैसे की मदद मिली। जागीरदारों ने यह काम शुरू किया। जागीरदारों की जागीरदारी जाने के बाद ये लोग सामान बेचने के लिए बाजार में निकलें। उस वक्त जो सामान बिकता था। तराजू के एक पलड़े में सामान रहता था और दूसरे पलड़े में उस दौर की करेन्सी रहती थी।
काम बढ़ा तो दूसरे लोगों को इसमें शामिल किया गया। बीदर में इसके 100 कारीगर हैं। हैदराबाद में इसकी मार्केटिंग होती है। शुरू में इसे हैदराबादी बीदर कहा जाता था। लेकिन, मैंने इसमें प्रयास करके इसकी पहचान दिलाई कि यह सिर्फ बीदर में बनता है जो कर्नाटक में है। हालांकि, बिदरी काम की पहचान के लिए कर्नाटक सराकर की ओर कोई खास प्रयास नहीं किया गया।
सवाल: एक बर्तन पर बर्क करने में कितना वक्त लगता है?
जवाब: किसी बर्तन को बनाने के लिए कितना वक्त लगेगा यह बर्तन के साइज पर निर्भर करता है। जैसे एक 25 हजार की एक सुराही है तो उसको पूरा करने के लिए 20 दिन का समय लगता है।
सवाल: बिदरी काम आपने कैसे शुरू किया?
जवाब: हम पिछली तीन पीढ़ियों से यह काम कर रहे हैं। इस काम में कादरी परिवार के ही लोग रहे हैं। हमारे खानदान में ही कई लोग यह काम करते थे। दसवीं तक पढ़ाई के बाद मैंने इसी काम को अपना लिया। इस काम ने मुझे कामयाबी दिलाई। 1970 से ही यह काम मैं कर रहा हूं। 1984 में कर्नाटक सरकार से पहला पुरस्कार मिला। उसके बाद भी कई राष्ट्रीय और राजकीय अवार्ड मिले। मुझे याद भी नहीं अब तक मुझे कितने अवार्ड मिल चुके हैं। इसी काम ने मुझे पहचान दिलाई।
सवाल: बिदरी कला में पिछले पांच दशक में क्या बदलाव आए हैं?
जवाब: बीते पांच दशक में हमनें कई डिजाइनें और पैटर्न विकसित किए हैं। ऐसा करने से बिक्री में भी फर्क आया और सेल ज्यादा होने लगी। इसके लिए मैंने बहुत मेहनत की।
सवाल: सम्मान समारोह के दौरान आपने जो बातें प्रधानमंत्री से कहीं, विरोधी कह रहे हैं कि ये आपसे कहलवाई गई हैं, इस पर आपका क्या कहना है?
जवाब: मेरे दिल में जो था वो बातें मैंने प्रधानमंत्री से कह दी। मुझे इल्म होता कि इस तरह के वीडियो वायरल होगा तो मैं यह बात नहीं बोलता। जो लोग मेरे ऊपर इल्जाम लगा रहे हैं वह सरासर झूठ है। न तो मैं बिकाऊ हूं न ही किसी की बात सुनकर बात कहता। अगर मैं बिकाऊ होता तो इस अवार्ड के लिए 10 साल का इंतजार नहीं करता। ऊपर वाले ने मोदी जी को बोलकर मुझे ये अवार्ड दिलाया है।
सवाल: आपने यूपीए सरकार के वक्त अवार्ड के लिए किस तरह प्रयास किए थे?
जवाब: जब कलर फोटो बहुत महंगे थे। एक बार मैं अप्लाई करता था तो मुझे बहुत महंगा पड़ता था। एक प्रोफाइल बनवाने के लिए चार हजार का खर्च आता था। तीन प्रोफाइल बनाकर मैं अप्लाई करता था। एक मैं कर्नाटक सरकार को देता था। दूसरा डेवलपमेंट कमिश्नर हेंडिक्राफ्ट को देता था और तीसरा गृह मंत्रालय भेजता था। पांच साल तक मैंने अप्लाई करता रहा लेकिन कहीं से कोई जवाब कभी नहीं आया।
सवाल: कहा जा रहा है कि आपको यह पुरस्कार कर्नाटक चुनाव में मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए दिया गया है, आपका क्या कहना है?
जवाब: मैं ज्यादा राजनीति नहीं समझता हूं। जहां तक मुझे पता है कि चुनावों का एलान मार्च के अंत में हुआ। लेकिन, जहां तक मुझे लगता है कि 2022 में ही इस अवार्ड की फाइनल लिस्ट बनी थी। जब कर्नाटक में चुनाव की कोई सुगबुगाहट नहीं थी।