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Exclusive: आवाजें जो आज भी गूंजती हैं... दूरदर्शन की आवाज शम्मी नारंग-ज्योत्सना श्रीवास्तव, अमर उजाला बतरस में
Sat, 01 Nov 2025 08:03 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 01 Nov 2025 08:03 PM IST
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बतरस
- फोटो : अमर उजाला
अमर उजाला बतरस एक और हफ्ते आम लोगों की जिंदगी से जुड़े अहम मुद्दे के साथ हाजिर है। इस हफ्ते पॉडकास्ट में चर्चा हुई भारत के टेलीविजन की दुनिया के शुरुआती समय की। जी हां, वही समय जब टीवी खोलते ही सिर्फ एक चैनल दिखता था- दूरदर्शन। आज के समय में जब उसी टीवी पर सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों चैनल हैं, तब भी लोग उस पुराने समय को याद कर के अभिभूत हो जाते हैं। इस हफ्ते बतरस में उसी दौर के दो सबसे लोकप्रिय चेहरे मौजूद रहे। इनमें एक नाम है शमी नारंग का, जिनकी आवाज दिल्ली मेट्रो में सफर करने वाले अनाउंसमेंट के दौरान सुन सकते हैं। वहीं, दूसरा चेहरा हैं ज्योत्सना श्रीवास्तव, जिनकी सादगी को लोग आज भी याद करते हैं।
इस पूरे पॉडकास्ट को आप शनिवार रात आठ बजे अमर उजाला के सभी सोशल मीडिया हैंडल्स पर सुन सकते हैं।
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इस पूरे पॉडकास्ट को आप शनिवार रात आठ बजे अमर उजाला के सभी सोशल मीडिया हैंडल्स पर सुन सकते हैं।
एंकर नंदिता कुदेशिया ने अमर उजाला के स्टूडियो में शमी नारंग और ज्योत्सना श्रीवास्तव से चर्चा की और दूरदर्शन के उन्हीं सुनहरे दिनों के अनुभव को जानने की कोशिश की। इस दौरान मेहमानों ने बताया कि बिना शोर और सनसनी वाला वह दौर कैसा था। कैसे टीवी पर सिर्फ सच्चाई और संस्कार के जरिए ही दर्शकों को बहुत कुछ बताने-सिखाने की कोशिश होती थी। उस दौर में न्यूज कैसे गरिमा का प्रतीक बनती चली गई।
इतना ही नहीं दोनों मेहमानों ने डीडी की उन शामों को भी याद किया, जब 7 बजते ही घर में शमी और ज्योत्सना की आवाज घरों में लोगों को टीवी के सामने जुटने पर मजबूर कर देती थी। इस दौर में ज्योत्सना की मुस्कान और शमी की वाणी कैसे दूरदर्शन की असली पहचान बनती चली गई? दोनों ने यह भी बताया कि कैसे उस दौर में दूरदर्शन पत्रकारिता का मानक बना?
इतना ही नहीं दोनों मेहमानों ने डीडी की उन शामों को भी याद किया, जब 7 बजते ही घर में शमी और ज्योत्सना की आवाज घरों में लोगों को टीवी के सामने जुटने पर मजबूर कर देती थी। इस दौर में ज्योत्सना की मुस्कान और शमी की वाणी कैसे दूरदर्शन की असली पहचान बनती चली गई? दोनों ने यह भी बताया कि कैसे उस दौर में दूरदर्शन पत्रकारिता का मानक बना?