{"_id":"5a0ae8554f1c1b9f678bb3bd","slug":"amar-ujala-baithak-jugalbandi-organised-at-14th-november","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"परस्त्रीगमन का जवाब परपुरुषगमन नहीं हो सकता ","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
परस्त्रीगमन का जवाब परपुरुषगमन नहीं हो सकता
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 15 Nov 2017 06:07 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जो साहित्य औरत को मर्द पर वैसे ही अत्याचार करने की सीख देता है जैसे मर्द औरतों पर करते हैं, वह अच्छा साहित्य नहीं हो सकता। परस्त्रीगमन के उत्तर में यदि स्त्री विमर्श के पैरोकार परपुरुषगमन की वकालत करेंगे तो इससे स्त्री आंदोलन भटक जाएगा।
स्त्री का उद्धार उसके शरीर के निचले आधे हिस्से की आजादी में नहीं, ऊपरी आधे हिस्से की यानी मस्तिष्क की आजादी से होगा। स्त्री का मात्र चेतन होना काफी नहीं है, उसका शिक्षित होना भी अनिवार्य है।
ये तर्क अमर उजाला बैठक के तीसरे आयोजन में मंगलवार सुबह प्रस्तुत किए गए। भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को संवाद के एक मंच पर लाने की इस मुहिम में इस बार एक तरफ थीं स्त्री विमर्श की पर्याय बन कर उभरीं मैत्रैयी पुष्पा और दूसरी तरफ थीं साहित्यकार के साथ साथ आंदोलनकारी कार्यकर्ता की भी पहचान रखने वालीं चित्रा मुद्गल।
विज्ञापन
दोनों ने स्त्री-पुरुष बराबरी और स्त्री समर्थक साहित्यिक धाराओं की बात की। दोनों ने एक-दूसरे से जमकर असहमति जताई। दोनों ने एक दूसरे पर व्यक्तिगत आक्षेप किए। और दोनों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर खूब तालियां बटोरीं।
मैत्रेयी पुष्पा ने बातचीत के आरंभ में ही यह कहकर चित्रा जी को छेड़ दिया कि शहरों की पढ़ी-लिखी महिलाएं अपनी डिग्रियां लिए बैठी रह जाती हैं और गांव-अंचल की कम पढ़ी औरतें उनसे ज्यादा जागरुक साबित हो जाती हैं।
उन्होंने कहा कि डिग्रीसंपन्न होने से कहीं ज्यादा अहम है चेतनासंपन्न होना। इसके जवाब में चित्रा जी ने कहा कि शिक्षा का कोई विकल्प नहीं हो सकता। खाली चेतना के बूते पितृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था का विरोध होगा तो वह भटक जाएगा। उसके लिए स्वावलंबन और शिक्षा अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि स्त्री विमर्श के नाम पर औरत को लंपट होने की सीख दी जा रही है।
इसके जवाब में मैत्रेयी जी ने तड़प तड़प कर जवाब दिए। उन्होंने कहा कि उनके उपन्यासों में स्त्री पात्र काल्पनिक नहीं हैं। वे उनके अपने समाज से उभरे पात्र हैं। उनका साहस, उनका दुस्साहस सच्ची कहानियों से उपजा है।
मैत्रेयी ने यह भी कहा कि उन्होंने यह सोचकर कभी नहीं लिखा कि उन्हें स्त्री विमर्श करना है। उन्होंने तो भोगा हुआ यथार्थ लिखा, असली जीवन के पात्र उठाए और लोगों ने उन्हें बताया कि ये तो स्त्री विमर्श है।
बातचीत में तीखे व्यंग्य भी उभरे। एक संदर्भ में चित्रा जी ने कहा कि कुछ लेखिकाएं ऐसी होती हैं जिन्हें सफर के दौरान हर स्टेशन पर चार प्रेमी मिल जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लेखिकाएं ऐसी भी रही हैं जिनकी एक किताब पर हंस में चार आलेख छप जाते थे।
इसके जवाब में मैत्रेयी जी ने कहा कि हंस में दूसरे लेखकों की किताबों पर भी चार लेख छपते थे, वे किसी की नजर में नहीं आते थे। मैत्रेयी ने ये भी कहा कि मैं कभी अपने प्रेम को नहीं छिपाती।
उन्होंने बताया कि उन्हें आज भी स्कूल का वह लड़का याद है जो उन्हें प्रेम से भीगी चिट्ठियां लिखा करता था। उन्होंने कहा कि मैं उन लड़कियों में हूं जो तीन लडकों के साथ कमरा शेयर करके रहने का साहस रखती हैं। किताबी दुनिया में रहने वाली शहरन मैं नहीं हूं।
विज्ञापन
स्त्री का उद्धार उसके शरीर के निचले आधे हिस्से की आजादी में नहीं, ऊपरी आधे हिस्से की यानी मस्तिष्क की आजादी से होगा। स्त्री का मात्र चेतन होना काफी नहीं है, उसका शिक्षित होना भी अनिवार्य है।
विज्ञापन
ये तर्क अमर उजाला बैठक के तीसरे आयोजन में मंगलवार सुबह प्रस्तुत किए गए। भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को संवाद के एक मंच पर लाने की इस मुहिम में इस बार एक तरफ थीं स्त्री विमर्श की पर्याय बन कर उभरीं मैत्रैयी पुष्पा और दूसरी तरफ थीं साहित्यकार के साथ साथ आंदोलनकारी कार्यकर्ता की भी पहचान रखने वालीं चित्रा मुद्गल।
विज्ञापन
दोनों ने स्त्री-पुरुष बराबरी और स्त्री समर्थक साहित्यिक धाराओं की बात की। दोनों ने एक-दूसरे से जमकर असहमति जताई। दोनों ने एक दूसरे पर व्यक्तिगत आक्षेप किए। और दोनों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर खूब तालियां बटोरीं।
मैत्रेयी पुष्पा ने बातचीत के आरंभ में ही यह कहकर चित्रा जी को छेड़ दिया कि शहरों की पढ़ी-लिखी महिलाएं अपनी डिग्रियां लिए बैठी रह जाती हैं और गांव-अंचल की कम पढ़ी औरतें उनसे ज्यादा जागरुक साबित हो जाती हैं।
उन्होंने कहा कि डिग्रीसंपन्न होने से कहीं ज्यादा अहम है चेतनासंपन्न होना। इसके जवाब में चित्रा जी ने कहा कि शिक्षा का कोई विकल्प नहीं हो सकता। खाली चेतना के बूते पितृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था का विरोध होगा तो वह भटक जाएगा। उसके लिए स्वावलंबन और शिक्षा अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि स्त्री विमर्श के नाम पर औरत को लंपट होने की सीख दी जा रही है।
इसके जवाब में मैत्रेयी जी ने तड़प तड़प कर जवाब दिए। उन्होंने कहा कि उनके उपन्यासों में स्त्री पात्र काल्पनिक नहीं हैं। वे उनके अपने समाज से उभरे पात्र हैं। उनका साहस, उनका दुस्साहस सच्ची कहानियों से उपजा है।
मैत्रेयी ने यह भी कहा कि उन्होंने यह सोचकर कभी नहीं लिखा कि उन्हें स्त्री विमर्श करना है। उन्होंने तो भोगा हुआ यथार्थ लिखा, असली जीवन के पात्र उठाए और लोगों ने उन्हें बताया कि ये तो स्त्री विमर्श है।
बातचीत में तीखे व्यंग्य भी उभरे। एक संदर्भ में चित्रा जी ने कहा कि कुछ लेखिकाएं ऐसी होती हैं जिन्हें सफर के दौरान हर स्टेशन पर चार प्रेमी मिल जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लेखिकाएं ऐसी भी रही हैं जिनकी एक किताब पर हंस में चार आलेख छप जाते थे।
इसके जवाब में मैत्रेयी जी ने कहा कि हंस में दूसरे लेखकों की किताबों पर भी चार लेख छपते थे, वे किसी की नजर में नहीं आते थे। मैत्रेयी ने ये भी कहा कि मैं कभी अपने प्रेम को नहीं छिपाती।
उन्होंने बताया कि उन्हें आज भी स्कूल का वह लड़का याद है जो उन्हें प्रेम से भीगी चिट्ठियां लिखा करता था। उन्होंने कहा कि मैं उन लड़कियों में हूं जो तीन लडकों के साथ कमरा शेयर करके रहने का साहस रखती हैं। किताबी दुनिया में रहने वाली शहरन मैं नहीं हूं।
अमर उजाला बैठक के अखाड़े में भिड़ीं दो दिग्गज लेखिकाएं
बहरहाल, अमर उजाला बैठक में दोनों लेखिकाओं की वक्तृता कला दमक दमक कर सामने आई। किसी ने बहस के दौरान आखिर तक हार नहीं मानीं। तर्क-वितर्क, नोकझोंक चलती रही। दर्शक देखते रहे। इस बीच न जाने कितने अद्भुत विचार बिंदु उभरे।
अमर उजाला का नोएडा स्थित कार्यालय लंबे समय तक दो विदुषियों की यह भिड़ंत याद रखेगा। बैठक में मौजूद कई युवा पत्रकार, कई उभरती लेखिकाएं, नवयुवतियां भी इस आयोजन से बहुत सी सीख लेकर गईं। अमर उजाला परिवार के कई संपादकों व प्रबंधकों के साथ वाणी प्रकाशन समूह की युवा प्रबंधिका अदिति माहेश्वरी भी इस रोचक कार्यक्रम की साक्षी बनीं।
मैत्रेयी पुष्पा
मैत्रेयी पुष्पा का जन्म अलीगढ़ जिले के सिकुर्रा गांव में हुआ। इनका प्रारंभिक जीवन बुंदेलखंड में बीता और शिक्षा झांसी में हुई। मैत्रेयी को बचपन से ही लिखने का शौक था।
मैत्रेयी ने अपने लेखन में उन महिलाओं की पीड़ा बटोरी, जिनकी आवाज दुनिया के शोर में गुम हो जाती थीं। मैत्रेयी के उपन्यासों में स्मृति दंश, चाक, अल्मा कबूतरी, कहैं ईसुरी फाग, बेतवा बहती रही शामिल हैं। इसके अलावा कहानियों में चिन्हार, त्रिया हठ, फैसला, अब फूल नहीं खिलते, बोझ, पगला गई है भागवती, छांह और तु किसकी हो बिन्नी प्रमुख हैं।
मैत्रेयी को कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया है। जिसमें हिंदी अकादमी द्वारा साहित्य कृति सम्मान, कहानी 'फैसला' पर कथा पुरस्कार,'बेतवा बहती रही' उपन्यास पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा प्रेमचंद सम्मान, 'इदन्नम' उपन्यास पर शाश्वती संस्था बैंगलोर द्वारा नंजनागुडु तिरुमालंबा पुरस्कार।
इसके अलावा मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा वीरसिंह देव सम्मान और वनमाली सम्मान उल्लेखनीय हैं। मैत्रेयी पुष्पा इन दिनों हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष हैं।
चित्रा मुदगल
चित्रा मुदगल का जन्म 10 दिसंबर, 1994 को चैन्नई में हुआ। इनकी शिक्षा मुंबई में हुई। मुदगल के जीवन में संघर्ष और साहित्य समानांतर चलता रहा। इनकी ज्यादातर रचनाओं का स्वर, महिलाओं के पक्ष में रहा।
एक दर्जन से ज्यादा कहानी संग्रह। कई उपन्यास और बाल उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. जिनमें आवां, गिलीगडू, एक जमीन अपनी, जीवक, मणिमेख, दूर के ढोल, माधवी, कन्नगी आदि चर्चित और पुरस्कृत कृतियां हैं। गुजराती में दो अनूदित पुस्तकें। अंग्रेजी में 'हाइना ऐंड अदर शॉर्ट स्टोरीज' बहुप्रशंसित हैं। इसके अलावा इन्होंने दिल्ली दूरदर्शन के लिए फिल्म वारिस का निर्माण भी किया।
चित्रा मुदगल समाजसेवा में भी सक्रिय हैं। मुंबई और दिल्ली की कई स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिलकर घरों में काम करने वाली गरीब महिलाओं ंके उत्थान के लिए काम किया है।
मुदगल जी को कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। मुंबई के सहकारी विकास संगठन की ओर से, फणीश्वर नाथ रेणू सम्मान, हिंदी अकादमी दिल्ली का साहित्यकार सम्मान। उपन्यास 'आवां" के लिए व्यास सम्मान। हिंदी अकादमी दिल्ली का साहित्यकार सम्मान।
उपन्यास 'आवां' के लिए व्यास सम्मान। सहस्त्राब्दी का पहला अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान और रूस का अंतरराष्ट्रीय पुश्किन सम्मान भी। उपन्यास 'आवां' आठ भाषाओं में अनूदित तथा देश के 6 प्रतिष्ठित सम्मानों में अलंकृत हैं। फिलहाल, चित्रा मुदगल दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं।
अमर उजाला का नोएडा स्थित कार्यालय लंबे समय तक दो विदुषियों की यह भिड़ंत याद रखेगा। बैठक में मौजूद कई युवा पत्रकार, कई उभरती लेखिकाएं, नवयुवतियां भी इस आयोजन से बहुत सी सीख लेकर गईं। अमर उजाला परिवार के कई संपादकों व प्रबंधकों के साथ वाणी प्रकाशन समूह की युवा प्रबंधिका अदिति माहेश्वरी भी इस रोचक कार्यक्रम की साक्षी बनीं।
मैत्रेयी पुष्पा
मैत्रेयी पुष्पा का जन्म अलीगढ़ जिले के सिकुर्रा गांव में हुआ। इनका प्रारंभिक जीवन बुंदेलखंड में बीता और शिक्षा झांसी में हुई। मैत्रेयी को बचपन से ही लिखने का शौक था।
मैत्रेयी ने अपने लेखन में उन महिलाओं की पीड़ा बटोरी, जिनकी आवाज दुनिया के शोर में गुम हो जाती थीं। मैत्रेयी के उपन्यासों में स्मृति दंश, चाक, अल्मा कबूतरी, कहैं ईसुरी फाग, बेतवा बहती रही शामिल हैं। इसके अलावा कहानियों में चिन्हार, त्रिया हठ, फैसला, अब फूल नहीं खिलते, बोझ, पगला गई है भागवती, छांह और तु किसकी हो बिन्नी प्रमुख हैं।
मैत्रेयी को कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया है। जिसमें हिंदी अकादमी द्वारा साहित्य कृति सम्मान, कहानी 'फैसला' पर कथा पुरस्कार,'बेतवा बहती रही' उपन्यास पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा प्रेमचंद सम्मान, 'इदन्नम' उपन्यास पर शाश्वती संस्था बैंगलोर द्वारा नंजनागुडु तिरुमालंबा पुरस्कार।
इसके अलावा मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा वीरसिंह देव सम्मान और वनमाली सम्मान उल्लेखनीय हैं। मैत्रेयी पुष्पा इन दिनों हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष हैं।
चित्रा मुदगल
चित्रा मुदगल का जन्म 10 दिसंबर, 1994 को चैन्नई में हुआ। इनकी शिक्षा मुंबई में हुई। मुदगल के जीवन में संघर्ष और साहित्य समानांतर चलता रहा। इनकी ज्यादातर रचनाओं का स्वर, महिलाओं के पक्ष में रहा।
एक दर्जन से ज्यादा कहानी संग्रह। कई उपन्यास और बाल उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. जिनमें आवां, गिलीगडू, एक जमीन अपनी, जीवक, मणिमेख, दूर के ढोल, माधवी, कन्नगी आदि चर्चित और पुरस्कृत कृतियां हैं। गुजराती में दो अनूदित पुस्तकें। अंग्रेजी में 'हाइना ऐंड अदर शॉर्ट स्टोरीज' बहुप्रशंसित हैं। इसके अलावा इन्होंने दिल्ली दूरदर्शन के लिए फिल्म वारिस का निर्माण भी किया।
चित्रा मुदगल समाजसेवा में भी सक्रिय हैं। मुंबई और दिल्ली की कई स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिलकर घरों में काम करने वाली गरीब महिलाओं ंके उत्थान के लिए काम किया है।
मुदगल जी को कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। मुंबई के सहकारी विकास संगठन की ओर से, फणीश्वर नाथ रेणू सम्मान, हिंदी अकादमी दिल्ली का साहित्यकार सम्मान। उपन्यास 'आवां" के लिए व्यास सम्मान। हिंदी अकादमी दिल्ली का साहित्यकार सम्मान।
उपन्यास 'आवां' के लिए व्यास सम्मान। सहस्त्राब्दी का पहला अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान और रूस का अंतरराष्ट्रीय पुश्किन सम्मान भी। उपन्यास 'आवां' आठ भाषाओं में अनूदित तथा देश के 6 प्रतिष्ठित सम्मानों में अलंकृत हैं। फिलहाल, चित्रा मुदगल दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं।