'मुलायम कुनबे में घमासान का लाभ अखिलेश को होगा'
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2012 में मुलायम सिंह यादव ने अपनी राजनीतिक विरासत अखिलेश यादव को सौंप दी थी। अब ऐसा नहीं है कि जब वो चाहेंगे उसे वापस ले लेंगे। जनता अखिलेश यादव में ही मुलायम सिंह यादव को देखती है। हकीकत तो यह है कि पार्टी में अखिलेश के अलावा कुछ बचा नहीं है।
1969 में जब कांग्रेस के अंदर सिंडिकेट बना और विवाद हुआ था तो इंदिरा गांधी विजेता के रूप में सामने आईं। आज उस दौर को कोई याद नहीं करता कि उस वक्त कांग्रेस में क्या हुआ था और क्या नहीं। ये तो समय के सूखे छिलके की तरह होता है जिसका एक समय के बाद कोई अस्तित्व नहीं होता। अभी सपा में जो भी इमोशनल ड्रामा चल रहा है, वो पारिवारिक है और यह होना ही था।
जब राजनीति में कोई बहुत पुराना पड़ जाता है और अपने सूर्यास्त के समय की लड़ाई लड़ होता है तब इतिहास रहा है कि हमेशा सूर्योदय के समय की लड़ाई लड़ने वाले के साथ जनता रहती है ना कि सूर्यास्त के समय पर पहुंच गए लोगों के साथ।
'चाचा भतीजा से माइक छीन रहा है ना कि भतीजा चाचा से'
फिर चाहे इंदिरा गांधी का समय हो या अभी दो साल पहले नरेंद्र मोदी का समय हो। यह सभी पार्टियों में होता है और यही समाजवादी पार्टी में भी हो रहा है। 2017 में अखिलेश यादव सत्ता में रहे या ना रहे उनके सामने अभी 2022, 2027, और 2032 की लड़ाई है। वोटरों को अखिलेश यादव में मुलायम सिंह यादव दिखते हैं ना कि शिवपाल सिंह यादव में।
वोटर मान चुका है कि मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक विरासत के वारिस अखिलेश यादव ही हैं। यह एक सच्चाई है। इस पूरे घटनाक्रम में अखिलेश की शख्सियत बढ़ी है और शिवपाल सिंह यादव की घटी है। चाचा भतीजा से माइक छीन रहा है ना कि भतीजा चाचा से माइक छीन रहा है।
हमेशा सहानुभूति कमजोर के साथ होती है। सहानुभूति उनके साथ नहीं होती है जो दस की संख्या में एक पर वार करते हैं।
'मुलायम की स्थिति तो भीष्म पितामह की तरह है'
मुलायम की स्थिति तो भीष्म पितामह की तरह है कि 'मैं किसी के साथ और मेरा दिल किसी के साथ।' इस पूरे झगड़े का सबसे ज्यादा फ़ायदा अखिलेश यादव को मिलने वाला है। आज़ादी के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश में साढ़े तीन पार्टियां चुनाव में चुनौती पेश कर रही हैं।
इससे पहले तो दो पार्टियों के बीच ही मुख्य तौर पर लड़ाई होती थी, लेकिन अब सपा, बसपा और बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस भी खेल बिगाड़ने की स्थिति में हो सकती है। अगर कांग्रेस 40 से ज्यादा सीटें लाती है तो वो किंग मेकर की भूमिका में उत्तर प्रदेश में आ जाएगी।
दो ही बात है कि किसके चेहरे पर उत्तर प्रदेश का चुनाव लड़ा जाएगा और कौन टिकट बांटेगा। कुछ दिनों में यह दोनों ही चीजें फाइनल हो जाएंगी और मेरा मानना है कि यह चेहरा अखिलेश का ही होगा।