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मुलायम-शिवपाल का अखिलेश से झगड़ना क्या सपा की चुनावी रणनीति है?
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 14 Oct 2016 04:54 PM IST
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अखिलेश यादव
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देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में सियासी ड्रामा चल रहा है। एक बड़ा वर्ग मान रहा है कि देश के सबसे बड़े राजनीतिक कुनबे में पद और अधिकार के लिए संघर्ष हो रहा है तो दूसरा वर्ग मान रहा है कि ये अखिलेश यादव की इमेज बिल्डिंग और 2017 के चुनाव में उन्हें एक मजबूत नेता के तौर पर पेश करने की रणनीति का हिस्सा है।
साल 2012 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाले अखिलेश यादव को विपक्षी पार्टियां कमजोर नेता के तौर पर प्रचारित करती रही हैं। भाजपा, बसपा और कांग्रेस लगातार कहती रही हैं कि प्रदेश को साढ़े तीन मुख्यमंत्री चला रहे हैं। अखिलेश अपनी मर्जी से कुछ कर नहीं पाते हैं। इन चीजों से अखिलेश की छवि कमजोर होती जा रही थी।
ऐसी स्थिति में जुलाई 2016 में कौमी एकता दल के सपा में विलय को रोकने और इसमें अहम भुमिका निभाने वाले प्रदेश के बड़े मंत्री बलराम यादव को कैबिनेट से निकालकर अखिलेश ने अपने सख्त तेवर दिखाए थे। यहीं से लगातार चीजें बदलती गईं और स्थिति यहां पर आ गई कि गुरुवार को एक इंटरव्यू में अखिले ने कहा, 'मुझे हराना आसान नहीं, मैं अपने दम पर लड़ना जानता हूं। मैं जब चाहूंगा अपनी रथयात्रा निकालूंगा।'
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कौमी एकता दल के विलय से शुरू विवाद के बाद अखिलेश और शिवपाल में बात इतनी बढ़ी कि घर के चौके की बात चौक-चौराहे तक आ गई। लोग परिवार में ही दो खेमा बनने की बात करने लगे। इस तकरार में मुलायम सिंह के एक और भाई रामगोपाल यादव भी कूद पड़े और अंत में मुलायम सिंह यादव ने हस्तक्षेप करके मामला शांत कराने की कोशिश की।
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साल 2012 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाले अखिलेश यादव को विपक्षी पार्टियां कमजोर नेता के तौर पर प्रचारित करती रही हैं। भाजपा, बसपा और कांग्रेस लगातार कहती रही हैं कि प्रदेश को साढ़े तीन मुख्यमंत्री चला रहे हैं। अखिलेश अपनी मर्जी से कुछ कर नहीं पाते हैं। इन चीजों से अखिलेश की छवि कमजोर होती जा रही थी।
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ऐसी स्थिति में जुलाई 2016 में कौमी एकता दल के सपा में विलय को रोकने और इसमें अहम भुमिका निभाने वाले प्रदेश के बड़े मंत्री बलराम यादव को कैबिनेट से निकालकर अखिलेश ने अपने सख्त तेवर दिखाए थे। यहीं से लगातार चीजें बदलती गईं और स्थिति यहां पर आ गई कि गुरुवार को एक इंटरव्यू में अखिले ने कहा, 'मुझे हराना आसान नहीं, मैं अपने दम पर लड़ना जानता हूं। मैं जब चाहूंगा अपनी रथयात्रा निकालूंगा।'
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कौमी एकता दल के विलय से शुरू विवाद के बाद अखिलेश और शिवपाल में बात इतनी बढ़ी कि घर के चौके की बात चौक-चौराहे तक आ गई। लोग परिवार में ही दो खेमा बनने की बात करने लगे। इस तकरार में मुलायम सिंह के एक और भाई रामगोपाल यादव भी कूद पड़े और अंत में मुलायम सिंह यादव ने हस्तक्षेप करके मामला शांत कराने की कोशिश की।
शिवपाल को बनाया पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष
अखिलेश और मुलायम
मुलायम सिंह ने लखनऊ में प्रेस कान्फ्रेंस करके परिवार में सबकुछ ठीक होने की बात तो कही, लेकिन पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के पद से अखिलेश यादव को हटाते हुए यह जिम्मेदारी शिवपाल यादव को दे दी। यहीं से चीजें परिवार से अलग होकर पार्टी और प्रदेश तक चली गईं। पार्टी के चारों फ्रंटल संगठन के नेताओं ने इस्तीफा दे दिया, जिन्हें बाद में शिवपाल यादव ने अनुशासनहीन बताते हुए बर्खास्त कर दिया।
यहीं से एक सवाल उठने लगा कि ये एक पद और अधिकार के लिए पारिवारिक लड़ाई है या फिर बिल्कुल चुनाव के मुहाने पर खडे़ प्रदेश में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की इमेज बिल्डिंग की कोशिश। मुलायम सिंह यादव द्वारा लिए गए कई निर्णय अखिलेश के विपक्ष में जाते हैं। ऐसे में एक अखिलेश बिल्कुल अलग-थलग पड़े दिखाई दे रहे हैं।
यहीं से एक सवाल उठने लगा कि ये एक पद और अधिकार के लिए पारिवारिक लड़ाई है या फिर बिल्कुल चुनाव के मुहाने पर खडे़ प्रदेश में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की इमेज बिल्डिंग की कोशिश। मुलायम सिंह यादव द्वारा लिए गए कई निर्णय अखिलेश के विपक्ष में जाते हैं। ऐसे में एक अखिलेश बिल्कुल अलग-थलग पड़े दिखाई दे रहे हैं।
अखिलेश ने लिए हैं कड़े फैसले
अखिलेश यादव
- फोटो : amar ujala
एक बड़ा वर्ग मानता है कि समाजवादी पार्टी में सत्ता की धुरी कई लोगों की बीच नाचती है, जबकि राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बसपा में सारे अधिकार मायावती अपने पास ही रखती हैं। इन्हीं वजहों से बसपा सरकार में लॉ एंड ऑर्डर के साथ मंत्रियों और अधिकारियों में अनुशासन दिखता है। अनुशासनहीनता होने पर वह कार्रवाई भी करती हैं और इसका उदाहरण है कि उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल में 10 मंत्रियों पर कार्रवाई की थी।
अखिलेश यादव ने यहां पर भी गियर बदलते हुए अपने कार्यकाल में अबतक 18 मंत्रियों पर कार्रवाई किया है। वहीं, बीते दिनों मुख्य सचिव दीपक सिंघल पर कार्रवाई और कई प्रमुख सचिव के विभाग बदलने की भी कार्रवाई की गई। ऐसे में अखिलेश की छवि को मजबूत करने की कोशिश की गई और यह दर्शाया गया कि वह भी कड़ा फैसला ले सकते हैं।
अखिलेश यादव ने यहां पर भी गियर बदलते हुए अपने कार्यकाल में अबतक 18 मंत्रियों पर कार्रवाई किया है। वहीं, बीते दिनों मुख्य सचिव दीपक सिंघल पर कार्रवाई और कई प्रमुख सचिव के विभाग बदलने की भी कार्रवाई की गई। ऐसे में अखिलेश की छवि को मजबूत करने की कोशिश की गई और यह दर्शाया गया कि वह भी कड़ा फैसला ले सकते हैं।
क्या अखिलेश ने खेला है ट्रंप कार्ड?
अखिलेश यादव
- फोटो : amar ujala
दूसरी तरफ मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव ने अखिलेश की मर्जी के खिलाफ कई बड़े फैसले लिए। इससे यह दिखाने की कोशिश की गई कि अखिलेश चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। सोशल मीडिया में इस तरह की चर्चा उठी कि नाराज अखिलेश, मुलायम का घर छोड़कर नए घर में शिफ्ट हो गए हैं।
बात यही नहीं खत्म होती है। अखिलेश ने लोहिया की पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में कहा था कि जीत उसकी होती है जिसके पास ट्रंप कार्ड होता है। यहीं से एक और एंगल निकलता है। अगस्त-सितंबर 2016 में समाजवादी पार्टी ने साल 2017 में होने वाले चुनाव के लिए जाने माने चुनावी रणनीतिकार और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्टीव जॉर्डिंग को चुना है। वह अमेरिका के डेमोक्रेटिक प्रेसिडेंशियल हिलेरी क्लिंटन का भी चुनावी अभियान संभाल रहे हैं। क्लिंटन के अलावा वह अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर व स्पेन के प्रधानमंत्री मारियानों रेजोय का भी अभियान संभाल चुके हैं।
बात यही नहीं खत्म होती है। अखिलेश ने लोहिया की पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में कहा था कि जीत उसकी होती है जिसके पास ट्रंप कार्ड होता है। यहीं से एक और एंगल निकलता है। अगस्त-सितंबर 2016 में समाजवादी पार्टी ने साल 2017 में होने वाले चुनाव के लिए जाने माने चुनावी रणनीतिकार और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्टीव जॉर्डिंग को चुना है। वह अमेरिका के डेमोक्रेटिक प्रेसिडेंशियल हिलेरी क्लिंटन का भी चुनावी अभियान संभाल रहे हैं। क्लिंटन के अलावा वह अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर व स्पेन के प्रधानमंत्री मारियानों रेजोय का भी अभियान संभाल चुके हैं।
क्या यह स्टीव जॉर्डिंग की रणनीति का हिस्सा है?
अखिलेश
एक वर्ग यह भी कयास लगा रहा है कि मुलायम परिवार में तकरार स्टीव जॉर्डिंग की किसी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। साढ़े तीन मुख्यमंत्री की सरकार का तोहमत झेल रही सपा को नई संजीवनी देने के लिए बनाई गई रणनीति के तौर पर भी इसे देखा जा रहा है। इससे अखिलेश की एक मजबूत मुख्यमंत्री की छवि तो बनेगी ही साथ ही जनता के मन में उनके प्रति एक सहानुभूति भी जाएगी।
वैसे राजनीति में हर पल चीजें बदलती हैं और उसमें भी जब बात देश के सबसे बड़े राजनीतिक अखाडे़ उत्तर प्रदेश की हो रही हो तो कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता। ऐसे में यह तो समय ही बताएगा कि यह सपा की कोई रणनीति है या देश के सबसे बड़े सियासी परिवार के टूटने की शुरुआत।
वैसे राजनीति में हर पल चीजें बदलती हैं और उसमें भी जब बात देश के सबसे बड़े राजनीतिक अखाडे़ उत्तर प्रदेश की हो रही हो तो कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता। ऐसे में यह तो समय ही बताएगा कि यह सपा की कोई रणनीति है या देश के सबसे बड़े सियासी परिवार के टूटने की शुरुआत।