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अखिलेश भी निकले बड़े लड़ैया: 'वोट कटवा' नहीं होता तो आसान नहीं था यूपी में फिर भगवा परचम फहराना

Thu, 10 Mar 2022 09:26 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Thu, 10 Mar 2022 09:26 PM IST
सार

2017 के चुनाव के मुकाबले अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी है। 300 पार जाने का भाजपा का सपना फिलहाल पूरा होता नजर नहीं आ रहा है।

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Akhilesh also turned out to be a big fighter! If there was no 'vote katwa', it was not easy to hoist the saffron flag again in UP
योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

उत्तर प्रदेश चुनाव में मुख्य रूप से भाजपा व सपा ही बड़े लड़ैया बनकर उभरे हैं। भाजपा के लिए यह चुनाव जीतना उसकी आन-बान-शान के लिए जरूरी था, वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए भी अस्तित्व की चुनौती। चुनावी जंग या खेल में एक की जीत तो दूसरे की हार तय है। ऐसे में पीएम मोदी व योगी के नेतृत्व में भाजपा, तो अखिलेश के नेतृत्व में सपा नंबर 1 व नंबर 2 बने हैं। 

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2017 के चुनाव के मुकाबले अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी है। 300 पार जाने का भाजपा का सपना फिलहाल पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। नतीजों को देखें तो एनडीए जहां 273 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रहा है, वहीं सपा पिछले चुनाव के मुकाबले 78 सीटें ज्यादा जीत कर 125 सीटें अपने खाते में डाल रही है। बसपा व कांग्रेस की तो बस लाज बची है। कांग्रेस पांच सीटें खोकर 2  पर तो बसपा 18 सीटें हार कर 1 पर सिमट गई है। 
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इन नतीजों से लगता है कि यदि बसपा, कांग्रेस, एआईएमआईएम व कुछ अन्य क्षेत्रीय दल सपा की दौड़ में टांग अड़ाने का काम नहीं करते तो योगी व भाजपा की महाविजय आसान नहीं होती। पिछले चुनाव में सपा गठबंधन को मात्र 47 सीटें मिली थीं। इस बार वह इससे ढाई गुना ज्यादा सीटें हासिल करती नजर आ रही है। इससे साबित होता है कि यदि भाजपा दिल्ली से लखनऊ तक की पूरी ताकत नहीं झोंकती तो जीत आसान नहीं थी। 
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बहन जी ने दिया वॉकओवर?
कहा जा रहा है कि इस चुनाव में बसपा प्रमुख मायावती ने शुरू से ही कम रुचि दिखाई। अनमने ढंग से सक्रिय हुईं भी अखिलेश यादव द्वारा यह कहने के बाद की उन्होंने भाजपा से समझौता कर लिया है। इस बार यदि सपा-बसपा-कांग्रेस गठबंधन होता तो भाजपा के लिए भगवा लहराना आसान नहीं होता। 

प्रचंड जीत की उम्मीद धराशायी
भाजपा के लिए यूपी चुनाव में जीत इसलिए भी जरूरी थी कि 2024 की जीत की गंगोत्री यहीं से निकलेगी। 2017 के मुकाबले एनडीए ने 52 सीटें खोई हैं। यह भी उसके लिए बड़ा नुकसान है। यह भाजपा व योगी सरकार के प्रचंड जीत के दावे से कमतर है। ऐसे में भाजपा को भी यह आत्म मंथन करना होगा कि आखिर वैसे नतीजे क्यों नहीं आए, जैसे अपेक्षित थे? अयोध्या में राम मंदिर, बनारस में काशी विश्वनाथ, हिंदू कार्ड, पाकिस्तान, जैसे तमाम मास्टर कार्ड के बाद भी सरकार बना लेने से संतोष कर लेना 2024 की चुनौती को कम आंकना होगा। 


बसपा, कांग्रेस का अस्तित्व संकट में
यदि बसपा व कांग्रेस की बात तो करें तो यूपी के फलक से ये दोनों बड़ी ताकतें साफ हो गई हैं।  ऐसे में 2024 या 2027 में इनसे किसी बड़े करिश्मे की उम्मीद कम है। हालांकि सपा ने ताकत बढ़ाकर यूपी में अपना वर्चस्व बढ़ाने में कामयाबी पाई है। वह सिंहासन न सही पर उपविजेता का खिताब पाने में सफल रही है। 

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