एक्सप्लेनर: अब एआई बना सकता है नए वायरस, मेडिकल क्रांति के साथ कितना बड़ा है जैविक हथियार का खतरा?
अब एआई की पहुंच सिर्फ कंप्यूटर और डाटा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह जैविक विज्ञान में भी नए प्रयोगों की दिशा बदल रहा है।
विस्तार
इस मामले के सामने आने के बाद एआई कंपनी एंथ्रोपिक ने संबंधित अकाउंट की पहचान की और उस पर तुरंत रोक लगाने का काम किया। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खतरा सिर्फ चिकनगुनिया वायरस तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि अगर भविष्य में एआई वैज्ञानिक ज्ञान, बायोलॉजिकल रिसर्च और ऑटोमेटेड लैबोरेट्रीज के साथ जुड़ गया तो क्या होगा? क्या कोई गलत इरादे वाला व्यक्ति एआई की मदद से ऐसे जैविक प्रयोग कर सकेगा जिनके लिए पहले बहुत ज्यादा वैज्ञानिक ज्ञान और विशषज्ञता की जरूरत होती थी?
एआई ने डिजाइन किए नए वायरस
इस खतरे को समझने के लिए हाल ही में हुए एक रिसर्च को समझना आपके लिए काफी जरूरी है। वैज्ञानिकों ने एआई मॉडल की मदद से पूरे बैक्टीरियोफेज यानी ऐसे वायरस का पूरा जेनेटिक कोड डिजाइन किया, जो बैक्टीरिया को संक्रमित करता है। इस रिसर्च में एआई को लाखों प्राकृतिक जीनोम से मिले डीएनए सीक्वेंस पर ट्रेन किया गया था। इसके बाद एआई ने बिल्कुल नए जीनोम डिजाइन तैयार किए। वैज्ञानिकों ने इनमें से करीब 300 डिजाइन को लैब में बनाकर टेस्ट किया और 16 ऐसे फेज मिले, जो वास्तव में काम करने वाले थे।खास बात यह थी कि ये प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले फेज की सीधी कॉपी नहीं थे। उनके जेनेटिक सीक्वेंस, जीन और दूसरे जैविक गुणों में काफी विविधता थी। इस रिसर्च का मकसद बीमारी फैलाना नहीं था। बल्कि इसका एक बड़ा संभावित फायदा यह है कि भविष्य में ऐसे एआई से डिजाइन किए गए फेज का इस्तेमाल उन बैक्टीरिया के खिलाफ किया जा सकता है, जो मौजूदा इलाज के प्रति प्रतिरोधी हो चुके हैं।
आज कई ऐसे बैक्टीरिया मौजूद हैं, जिन पर सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं का असर पहले जैसा नहीं रहा। यानी जिन दवाओं से पहले बैक्टीरिया आसानी से खत्म हो जाते थे अब वही दवाएं कई बार उन पर बेअसर साबित होती हैं। ऐसी स्थिति में बैक्टीरियोफेज एक संभावित विकल्प बन सकते हैं क्योंकि इनका काम ही बैक्टीरिया को पहचानकर उन्हें खत्म करना होता है।
भविष्य में एआई की मदद से ऐसे बैक्टीरियोफेज तैयार किए जा सकते हैं, जो किसी खास हानिकारक बैक्टीरिया को ज्यादा सटीक तरीके से पहचानकर उन्हें मार सकें। अगर यह तकनीक सफल हुई, तो आने वाले समय में गंभीर बैक्टीरियल संक्रमणों के इलाज का तरीका काफी हद तक बदल सकता है।
गलत इस्तेमाल से विनाशकारी बन सकती है AI की ताकत
यहीं इस पूरी रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण और दूसरा पहलू सामने आता है। इस तकनीक का इस्तेमाल गलत इरादों के लिए भी किया जा सकता है। इसका सकारात्मक इस्तेमाल ऐसे बैक्टीरियोफेज तैयार करने में हो सकता है, जो हानिकारक और दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बैक्टीरिया को निशाना बनाएं। दूसरी तरफ एआई पूरे जीनोम के स्तर पर बायोलॉजिकल सिस्टम डिजाइन करने में सक्षम हो रहा है। यही क्षमता गलत हाथों में कितनी खतरनाक हो सकती है?
सबसे बड़ा डर यह है कि भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल जैविक हथियार बनाने के लिए भी किया जा सकता है। इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने खास ध्यान रखा कि बनाए गए वायरस इंसानों और पौधों की कोशिकाओं को संक्रमित न कर सकें। लेकिन चिंता यह है कि गलत लोग इसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल खतरनाक वायरस बनाने या पहले से मौजूद किसी खतरनाक वायरस को और ज्यादा नुकसानदायक बनाने के लिए कर सकते हैं।
गौर करने वाली बात है कि अभी दुनिया उस स्थिति तक नहीं पहुंची है। हालांकि, जैसे-जैसे एआई के ये मॉडल और ज्यादा अच्छे, सस्ते और आसानी से उपलब्ध होंगे इन्हें इस्तेमाल करना भी आसान हो जाएगा। उस दौरान बिना ज्यादा विशेषज्ञता वाले लोग भी इनका गलत इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं। यही इस तकनीक को लेकर सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है।
इसी वजह से आने वाली चुनौती सिर्फ एआई को और ज्यादा शक्तिशाली बनाने की नहीं बल्कि यह तय करने की भी है कि उसकी ताकत की सीमाएं आखिर कहां तय की जाएं। गौर करने वाली बात है कि आज एआई की मदद से तैयार किया गया एक नया वायरस बैक्टीरिया के खिलाफ इलाज की उम्मीद पैदा कर रहा है। वहीं कल को यही तकनीक किसी और मकसद के लिए इस्तेमाल हो, इसकी गारंटी कौन देगा?
सवाल यह भी है कि जब एआई और ऑटोमेटेड लैब एक साथ काम करने लगेंगे तब इंसानी हस्तक्षेप और निगरानी कितनी रह जाएगी? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। तकनीक के विकास की रफ्तार आज के समय काफी तेज हो चुकी है। लेकिन उसके गलत इस्तेमाल से होने वाले नुकसान को रोकने की तैयारी क्या उतनी ही तेज है? यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।