अब उद्धव को तोड़नी होगी बाल ठाकरे की यह परंपरा, बंद करना होगा बालकनी से दर्शन देने का रिवाज
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महाराष्ट्र के सियासी दंगल में कई तरह के प्रयोग हुए हैं। वे राजनीतिक दल जो विचारधारा के आधार पर एक दूसरे से दूर रहे, अब सरकार में एक साथ हैं। किंगमेकर की भूमिका में महाराष्ट्र पर राज करने वाले बाल ठाकरे की वह परंपरा, जिसमें वे अपने समर्थकों के साथ यह सोचकर नियमित तौर से मिलते-जुलते नहीं थे कि ज्यादा करीबी होने से असम्मान की भावना पनपती है, अब टूट जाएगी। बाल ठाकरे अपने आवास ‘मातोश्री’ की बालकनी से ही समर्थकों को 'दर्शन' देते थे।
अभी तक उद्धव ठाकरे को भी राजनीतिक जीवन में सार्वजनिक पटल पर उतना ज्यादा नहीं देखा गया, जितना दूसरे दलों के नेता पब्लिक के बीच नियमित तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
बाल ठाकरे को समर्थकों से ज्यादा मेलजोल नहीं था पसंद
चूंकि अब वे मुख्यमंत्री बन गए हैं और उनकी सरकार में दो राजनीतिक दल भी शामिल हैं, ऐसे में उन्हें अब लोगों के बीच रहने की आदत डालनी होगी। दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तरह जनता की समस्याओं को सुनना पड़ेगा। विभिन्न सरकारी दौरे भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा बनेंगे। राजनीति के जानकार बताते हैं कि बाल ठाकरे को अपने समर्थकों के साथ ज्यादा घुलना-मिलना पसंद नहीं था।
उनके पास मराठी मानुस की नब्ज पहचानने का गजब का हुनर था। ठाकरे इस इस कहावत का बखूबी पालन करते थे कि ज्यादा करीबी होने से असम्मान पनपता है। यही वजह रही कि उन्होंने अपने समर्थकों से ज्यादा घुलना-मिलना ठीक नहीं समझा। इसके चलते बाल ठाकरे और समर्थकों के बीच एक दूरी बनी रही।
त्योहारों पर होते थे लोगों के बीच
वे अपने आवास ‘मातोश्री’ की बालकनी से समर्थकों को 'दर्शन' देते थे। जब कभी कोई त्योहार होता, जैसे गणेश उत्सव या दशहरा, उस दौरान वे लोगों के बीच पहुंचते थे। ठाकरे की रैलियों में उनके जोशीले भाषण सुनने के लिए लाखों लोगों की भीड़ पहुंचती थी। महाराष्ट्र के राजनीतिक मंच पर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बाल ठाकरे मराठी गौरव और हिंदुत्व के प्रतीक थे। उनके जोशीले अंदाज के चलते शिवसैनिक उन्हें भगवान की तरह पूजते थे। दूसरी तरफ, उद्धव ठाकरे को अब अपने पिता बाल ठाकरे की कई परंपराओं से किनारा करना पड़ेगा।
उन्हें अपनी पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए लगातार कार्यकर्ताओं के संपर्क में रहना होगा। उनकी सरकार में कांग्रेस और एनसीपी भी हैं, ऐसे में उन्हें शिवसेना की विचारधारा को लेकर बहुत सचेत रहना होगा। उनकी काबिलियत इसी बात से परखी जाएगी कि कैसे वे दो राजनीतिक दलों के साथ शिवसेना का कितना सामंजस्य बना पाते हैं।
सरकार चलाने के साथ-साथ उन्हें अपने कार्यकर्ताओं के साथ भी एक ऐसा संबंध स्थापित करना पड़ेगा, जिससे कि वे लंबे समय तक उनके साथ चलते रहें। उद्धव ठाकरे को अब पूरी तरह से अपने पिता का वह अंदाज 'मातोश्री' की बालकनी से समर्थकों को दर्शन देना या संबोधित करना, छोड़ कर लोगों के बीच आना पड़ेगा।
जब बाल ठाकरे के मताधिकार पर रोक लगा दी गई
बाल ठाकरे गैर-मराठी समुदाय के प्रति कड़ा रूख अपना लेते थे। इसके चलते उन्हें कई बार दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा। 11 दिसंबर 1999 से 10 दिसंबर 2005 के बीच उनके मताधिकार पर रोक लगा दी गई थी। इसकी वजह यह थी कि उन्होंने लोगों से सांप्रदायिक आधार पर वोट देने की अपील की थी। यह मामला उच्च न्यायालय के समक्ष पहुंच गया। चुनाव आयोग ने अदालत के आदेश से एक अधिसूचना जारी कर बाल ठाकरे के मताधिकार पर रोक लगा दी।
ठाकरे को अपने प्रवासी विरोधी विचारों के कारण खासी आलोचना झेलनी पड़ी थी। खासतौर पर हिंदी भाषी राजनीतिज्ञ उनके ज्यादा नाराज रहते थे।
सार्वजनिक जीवन से सन्यास लिया
उन्होंने कथित तौर से बिहारियों को देश के विभिन्न भागों के लिए ‘बोझ’ बताकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। जब उन्होंने सार्वजनिक जीवन से सन्यास लिया, तो वे सार्वजनिक तौर पर लोगों के बीच नहीं आए। ठाकरे ने वीडियो रिकार्डेड भाषणों के जरिए अपने समर्थकों को संबोधित किया और सार्वजनिक जीवन से संन्यास लेने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा,'शारीरिक तौर पर मैं काफी कमजोर हो गया हूं, मैं चल नहीं सकता और मैं अब थक गया हूं।
उन्होंने अपने समर्थकों से उनके पुत्र उद्धव और पोते आदित्य का साथ देने का आग्रह किया। ठाकरे का इशारा साफ था कि शिवसेना के उत्तराधिकारी अब ये दोनों ही होंगे।