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Bus Marshal: नौकरी जाने के बाद इस तरह जिंदगी चला रहे बस मार्शल, वेटर-सिक्योरिटी गार्ड बनने को मजबूर

Tue, 03 Dec 2024 06:21 PM IST
निर्मल कांत डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला।
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला। Published by: निर्मल कांत Updated Tue, 03 Dec 2024 06:21 PM IST
सार

Bus Marshal: आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच राजनीति का शिकार हो रहे बस मार्शलों को अपने परिवार की जिंदगी चलाने के लिए कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा है। किसी को विवाहों-कार्यक्रमों में वेटर का काम करना पड़ रहा है तो किसी को सिक्योरिटी गार्ड का काम करके अपनी जिंदगी चलाने को मजबूर होना पड़ रहा है।

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After losing job how bus marshal managing his life, forced to become a waiter security guard
बस मार्शल अशोक मांझी, अनीता। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली के 10,792 बस मार्शलों को नौकरी से हटाए जाने को लगभग डेढ़ साल का समय हो गया है। उनकी नौकरी कब लगेगी, यह अब तक साफ नहीं है। बस मार्शलों की नौकरी भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच राजनीति का शिकार हो गई है। आम आदमी पार्टी का कहना है कि उसने मार्शलों को नौकरी देने का प्रस्ताव भेज दिया है, लेकिन उपराज्यपाल उसे पास नहीं कर रहे हैं। वहीं, भाजपा का कहना है कि केजरीवाल-आतिशी सरकार बस मार्शलों को नौकरी देने पर नीयत साफ नहीं है। उसे भेजे गए प्रस्ताव सही नहीं हैं। इससे बस मार्शलों की नौकरी का मामला लटकता दिखाई दे रहा है। 
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इस बीच आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच राजनीति का शिकार हो रहे बस मार्शलों को अपने परिवार की जिंदगी चलाने के लिए कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा है। किसी को विवाहों-कार्यक्रमों में वेटर का काम करना पड़ रहा है तो किसी को सिक्योरिटी गार्ड का काम करके अपनी जिंदगी चलाने को मजबूर होना पड़ रहा है। बस मार्शलों में कोई यूपी से है तो कोई बिहार-झारखंड से, कोई मध्य प्रदेश से है तो कोई पश्चिम बंगाल से। नौकरी न मिल पाने के कारण कई बस मार्शलों को अपने गांव तक जाना पड़ गया है। 
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नौकरी से हटाए गए अशोक मांझी ने अमर उजाला को बताया कि बस मार्शल के रूप में 31 अक्टूबर 2023 उनकी नौकरी का आखिरी दिन था। उसके बाद से ही जिंदगी भगवान भरोसे चल रही है। कभी शादी-विवाह में वेटर का काम मिल जाता है तो कभी कोई दूसरी दिहाड़ी का काम करना पड़ जाता है। शादियां भी रोज-रोज तो नहीं होतीं, इसलिए काम भी कभी-कभी ही मिल पाता है। लेकिन पेट को तो रोज रोटी चाहिए। इसलिए उन्हें कभी दिहाड़ी मजदूर की तरह काम करना पड़ता है तो कभी बिना काम के ही रह जाना होता है। 
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लेकिन इसका असर यह हुआ है कि अब उनके बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पा रही है। उनका एक बेटा पांच साल का हो चुका है। लेकिन वे अब तक उसका नाम दाखिला भी नहीं करा पाए हैं। इससे उनके साथ-साथ बच्चे का भविष्य भी अंधेरे में जाता दिखाई दे रहा है। जिन नेताओं ने उन्हेंं नौकरी दिलाने का वादा किया था, अब उनके घर जाने के बाद वे उन्हें कोई आश्वासन नहीं दे रहे हैं। 

अशोक मांझी बताते हैं कि किसी शादी में वेटर का काम करने के बाद उन्हें 700 रुपये मिल जाते हैं। लेकिन शादियां भी दूर-दूर जगहों पर होती हैं। इसी मेहनताने में उनका आने-जाने का किराया भी शामिल होता है। देर रात शादियों से फ्री होने के बाद घर वापस जाने के लिए कई बार उन लोगों को भारी किराया चुकाना पड़ता है। 

विवाह समारोहों में दुनिया भर के लोग भले ही खाना खाते हों, तमाम व्यंजनों के लुत्फ उड़ाते हों, लेकिन उन्हीं विवाह समारोहों में काम करने वाले वेटर उनका स्वाद लेने से वंचित रह जाते हैं। अशोक मांझी बताते हैं कि उनके हेड उन्हें डांटते हैं। यानी इसी पैसे में से उन लोगों को अपने लिए भोजन का भी जुगाड़ करना पड़ता है। 

After losing job how bus marshal managing his life, forced to become a waiter security guard
राजेश कुमार सिन्हा - फोटो : अमर उजाला
'नहीं मिल रही नौकरी'
राजेश कुमार सिन्हा अब 48 वर्ष के हो चुके हैं। बस मार्शल के रूप में नौकरी करने के बाद अब उनकी उम्र काफी अधिक हो चुकी है। अब कोई दूसरा उन्हें नौकरी देने के लिए तैयार नहीं है। सभी मार्शलों को दिल्ली के अलग-अलग 48 विभागों से हटाया गया है। लेकिन अब कोई दूसरा विभाग उन्हें किसी दूसरे रूप में भी नौकरी देने के लिए तैयार नहीं है। 

सिन्हा का कहना है कि उनकी जिंदगी दिल्ली में गुजर गई। कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की, अब तक उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। लेकिन अब राजनीतिक कारणों से उन लोगों की जिंदगी दांव पर लग चुकी है। कुछ बस मार्शलों के राशन कार्ड बने हैं जिससे उन्हें खाने भर का अनाज मिल जाता है, लेकिन ज्यादातर बस मार्शलों के पास राशन कार्ड तक नहीं हैं। इससे उन्हें भुखमरी की हालत से गुजरना पड़ रहा है। 

कोई नहीं सुन रहा हमारी परेशानी
बस मार्शल के रूप में नौकरी से हटाए गए अशोक पासवान ने अमर उजाला को बताया कि हम लोगों को यही नहीं समझ आ रहा है कि अब वे दिल्ली में रुकें या नहीं। कोई भी नेता-पार्टी उनकी बात सुनने के लिए तैयार नहीं है। बांसुरी स्वराज ने लोकसभा चुनाव के पहले उनसे यह वादा किया था कि सांसद बनने के बाद वे उनकी आवाज उठाएंगी, वे लोग भाजपा के पास भी कई बार नौकरी दिलवाने के लिए जा चुके हैं। लेकिन भाजपा नेताओं का कहना है कि वे लगातार उनकी आवाज उठा रहे हैं। लेकिन सत्ता में न होने के कारण वे उन्हें नौकरी नहीं दे पा रहे हैं। लेकिन भाजपा ने यह वादा अवश्य किया है कि सत्ता में आते ही वे सभी बस मार्शलों को नौकरी देंगे। 

अब 10,792 बस मार्शल नई सरकार बनने का इंतजार कर रहे हैं। क्या पता कि नई सरकार के गठन के बाद ही उनकी किस्मत खुले और उनकी रोजी-रोटी फिर उन्हें मिले। 

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