ड्रोन बन रहा है आतंकियों का पसंदीदा हथियार, बॉर्डर से सटी भारतीय रिफाइनरीज पर मंडरा रहा खतरा!
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सऊदी अरब में अरामको तेल कंपनी की रिफाइनरी पर हुए हमले में ईरान का हाथ बताया जा रहा है। सऊदी अरब ने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हमले में इस्तेमाल मिसाइलों और ड्रोन के टुकड़ों के मीडिया के सामने सबूत के तौर पर भी दिखाए। उधर, रिफाइनरी पर हुए हमले की यमन के ईरान समर्थित हाउथी विद्रोहियों ने जिम्मेदारी भी ली है। इस हमले से चीन भी सचेत हो गया है और ड्रोन से होने वाले हमलों से निबटने के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं।
आतंकी पहले भी कर चुके हैं ड्रोन का इस्तेमाल
सऊदी अरब में ड्रोन से यह पहला हमला नहीं हुआ है। इसी साल मई में यमन के ईरान समर्थित हाउथी विद्रोहियों ने सऊदी अरब के हवाई अड्डे स्थित सैन्य अड्डे को निशाना बनाया था। उस दौरान भी ड्रोन का इस्तेमाल किया गया था। इस हमले के बाद मध्य पूर्व एशिया में तनाव चरम पर पहुंच गया था। आतंकी संगठनों के हाथ में ड्रोन का लगना सभी देशों के लिए खतरे की घंटी है। इससे पहले हाउदी विद्रोहियों ने रियाद में सऊदी अरब के तेल पंपिंग स्टेशन पर विस्फोटक लदे ड्रोन का इस्तेमाल किया था। उससे कुछ दिन पहले ही आतिकयों ने संयुक्त अरब अमीरात के जलक्षेत्र में सउदी अरब के दो तेल टैंकरों को भी निशाना बनाया था।
वेनेजुएला के राष्ट्रपति बन चुके हैं ड्रोन का निशाना
अभी तक आतंकी संगठन हमलों के लिए रॉकेट लॉन्चर, एके-47 या आत्मघाती हमलावरों को ही इस्तेमाल करते थे, लेकिन आतंकी संगठन अब ड्रोन को नए हथियार के तौर पर देख रहे हैं। यूएई की आरामको तेल कंपनी की रिफाइनरी से पहले वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो पर भी आतंकी ड्रोन से हमला करने की साजिश रच चुके हैं। हालांकि उस हमले में मादुरो बाल-बाल बच गए। मादुरो के साथ सुरक्षा एजेंसियों का अच्छा खासा घेरा भी था, लेकिन इस हमले से वे भी अवाक रह गए। वहीं टेंशन जेने वाली बात यह है कि सरकारों के पास इस तरह के हमलों से निपटने की कोई खास तैयारियां भी नहीं हैं। जब सऊदी अरब जैसे देश में लगातार हो रहे ड्रोन हमलों को रोकने में नाकाम साबित हो रहे हैं, तो विकासशील देशों की तकनीक का अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है।
चीन सऊदी तेल का सबसे बड़ा खरीददार
वहीं चीन भी अरामको तेल संयंत्र पर हुए ड्रोन हमले के बाद सकते में है। चीन के लिए टेंशन की बात इसलिए भी है कि सऊदी अरब पूरी दुनिया को तेल की सप्लाई कर रहा है कि और सप्लाई बाधित होने से चीन को बड़ा झटका लगा है। क्योंकि चीन सऊदी के तेल का सबसे बड़ा खरीददार है। हालांकि चीन का दावा है कि उसके पास ऐसे हालातों से निपटने के पुख्ता इंतजाम हैं। चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स ने एक चीनी सैन्य अधिकारी के हवाले से लिखा है कि वे इस हमले की सफलता से सकते में हैं। वह कहते हैं कि अगर आरामको ने अपना डिफेंस सिस्टम लगाया होता, तो उन्हें इनका नुकसान नहीं झेलना पड़त।
चीन ने बनाई सुरक्षा प्रणाली
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान में मौजूद एयर डिफेंस सिस्टम के ड्रोन का पता लगाना बेहद मुश्किल है। इसका वजह है कि ड्रोन न केवल छोटे होते हैं, बल्कि हल्के होने के साथ धीरे और नीची उड़ान भी भरते हैं। वहीं इनमें इस्तेमाल होने वाली धातु या आवरण कई बार रडार भी पकड़ नहीं पाता। इनका पता लगाने के लिए एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम बनाने की जरूरत है। वहीं चीनी सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि सैन्य पर्यवेक्षकों ने कहा कि ड्रोन हमले चीन का कुछ नहीं बिगाड़ सकते, क्योंकि सुरक्षा को देखते हुए चीन ने ड्रोन हमलों का मुकाबला करने के लिए पहले से ही पूरी प्रणाली विकसित कर ली है।

जैमर से जाम कर सकते हैं सिग्नल
चीन के सैन्य विशेषज्ञ का कहना है कि लेकिन छोटे ड्रोनों को पकड़ने के लिए दमदार क्षमता वाले कई राडार लगाने की जरूरत पड़ेगी, साथ इंफ्रारेड डिटेक्शन और ड्रोन के सिग्नल्स को पकड़ने के लिए रेडियो मॉनिटरिंग सिस्टम लगाना होगा। वहीं एक बार ड्रोन का पता लगने पर उसे आम गन, मिसाइल्स और लेजर हथियारों से गिराया जा सकता है या फिर जैमर के जरिए उसके सिग्नल्स जाम किए जा सकते हैं। चीन की कंपनी चाइना एरोस्पेस साइंस एंड इंडस्ट्री कॉर्पोरेशन (CASIC) ने ड्रोन हमलों को रोकने के लिए कई हथियार जैसे जमीन से छोड़े जाने वाले रॉकेट और ड्रोन का पता लगाने वाले ड्रोन बनाए हैं, जो जाल फैंक उन्हें कब्जे ले सकते हैं।
चीन ने बनाया व्हीकल बेस्ड लेजर सिस्टम LW-30
इसके अलावा चीन ने ड्रोन हमलों को रोकने के लिए राइफल की आकार वाली डिवासेज बनाई हैं, जो जाम करने वाले सिग्नल्स छोड़ती हैं, ताकि ड्रोन का कंट्रोल सिस्टम खत्म हो जाए और उनकी जबरदस्ती लैंडिंग कराई जा सके। एयरशो चाइना 2018 में व्हीकल बेस्ड लेजर सिस्टम LW-30 को भी प्रदर्शित किया था, जो उच्च ऊर्जा वाले लेजर के जरिए कई एरियल डिवाइसेज जैसे फोटोइलेक्ट्रिक गाइडेंस इक्विमेंट्स, ड्रोन, गाइडेड बम और मोर्टार्स को चुटकियों में निशाना बना सकता है। सऊदी अरब में हुए ड्रोन हमलों के बाद चीन में मिलिट्री ड्रोन और काउंटर ड्रोन बनाने कंपनियों सक्रिय हो गई हैं।

कई भारतीय रिफाइनरीज पाक सीमा के पास
वहीं ड्रोन हमले से बचाव के लिए चीन के साथ भारत भी रक्षात्मक तैयारियों में जुट गया है। भारत के लिए यह खतरा इसलिए भी बड़ा है क्योंकि भारत की कई रिफाइनरीज पाकिस्तान की सीमा से सटी हैं, जिनमें जामनगर स्थित रिलायंस की रिफाइनरी, बठिंडा में एचपीसीएल-मित्तल की रिफाइनरी, नयारा एनर्जी का वाडीनार रिफाइनरी और इंडियन ऑयल के पानीपत, मथुरा और कोयली रिफाइऩरी शामिल हैं। इन रिफाइनरीज की सुरक्षा का जिम्मा केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के पास है।
खुफिया एजेंसियों ने दिए थे इनपुट
भारतीय खुफिया एजेसियां पहले ही चेतावनी जारी कर चुकी हैं कि सीमा पार स्थित कई आतंकी संगठन ड्रोन के जरिए आतंकी हमला कर सकता है। जिसके बाद भारत सरकार ने ड्रोन को लेकर नई गाइडलाइंस जारी की थीं। खुफिया एजेंसियों ने अपने इनपुट में कहा था कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई पाकिस्तान की धरती पर पल रहे आतंकी समूहों को पैराग्लाइडिंग के साथ ड्रोन ऑपरेट करने की ट्रेनिंग दे रही है।
भारत में हो रही है टेस्टिंग
हाल में बीएसएफ ने राजधानी में कुछ विशेषज्ञों से ड्रोन का पता लगाने और उसे नेस्तानाबूद करने के तरीके सुझाने के लिए बुलाया था। वहीं निजी कंपनियां, खासतौर पर तेल रिफाइनरी और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) जैसी सरकारी संस्थाएं भी ड्रोन हमलों से निपटने की तैयारी की समीक्षा कर रही हैं। सरकार ने अंतर-मंत्रालय समिति का गठन किया है, जो ड्रोन-रोधी समाधानों की स्टडी कर रही है, जिसके बाद टेंडर जारी होंगे। आइडियाफोर्ज टेक्नोलॉजी, इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज, ट्रैक्टर्स इंडिया, फ्रांस की अंतरिक्ष क्षेत्र की दिग्गज कंपनी थालेस, इजरायल की रक्षा कंपनी रफायल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स भी ड्रोन के हमलों को रोकने के लिए परीक्षण कर रही हैं।
भारत को चाहिए एडवांस रडार सिस्टम या जैमर
भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञ भी चीनी सैन्य एक्सपर्ट्स की चिंताओं से सहमत हैं। उनका कहना है कि ऊंचे उड़ने वाले ड्रोन का परंपरागत रडार सिस्टम या रेडियो फ्रीक्वेंसी आधारित समाधानों से पता लगाया जा सकता है। लेकिन बहुत कम ऊंचाई या तेजी से उड़ने वाले छोटे ड्रोन को पकड़ना मुश्किल होता है। इसके लिए एडवांस रडार सिस्टम या जैमर चाहिए है। विशेषज्ञों के मुताबिक आम ड्रोन 2.4 गीगाहट्र्ज बैंड से कंट्रोल होते हैं, लेकिन जैमर इसमें 'अवरोध' पैदा कर सकते हैं। जिससे ड्रोन का संपर्क टूट जाता है और ड्रोन लक्ष्य से भटक जाता है। वहीं ऑटोनोमस ड्रोन के मामले में जैमर फेल हैं, क्योंकि ऑटोनोमस ड्रोन पहले से ही प्रोग्राम्ड होते हैं और जीपीएस बेस्ड होते हैं। ऐसे मामलों में जीपीएस स्पूफिंग से ड्रोन के जीपीएस को हैक किया जा सकता है। लेकिन ये तकनीकें ड्रोन बनाने की तकनीक से भी कई गुना महंगी हैं।
ये है भारत की ड्रोन नीति
दिसंबर 2018 में डीजीसीए ने ड्रोन के कमर्शियल और निजी इस्तेमाल के लिए ड्रोन उड़ाने के लिए एक ड्रोन नीति जारी की थी। जिसमें 250 ग्राम से ज्यादा ड्रोन चलाने वाले लोगों को लाइसेंस लेना पड़ेगा। 250 ग्राम से कम वजन वाले ड्रोन का पंजीकरण नहीं करवाया जाएगा। लेकिन इन्हें चलाने वालों को पहले पुलिस से इजाजत लेनी होगी और किसी शख्स की निजता का हनन नहीं करना होगा। नीति में नो ड्रोन जोन को परिभाषित किया गया है। इसमें एयरपोर्ट के आस-पास, अंतरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक, दिल्ली के विजय चौक, राज्य राजधानियों के राज्य सचिवालय परिसरों, रणनीतिक स्थानों और महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों के पास उड़ाने की इजाजत नहीं है। यदि कोई प्रतिबंधित क्षेत्र में ड्रोन उड़ाता हुआ पकड़ा जाता है तो उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा के तहत मामला दर्ज किया जाएगा।