आप खेल रही है जाति की राजनीति, आशुतोष खुलकर आए सामने, आतिशी ने हटाया अपना सरनेम
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अपने पुराने दर्द को बयां करते हुए आशुतोष लिखते हैं '23 साल के मेरे पत्रकारिता करियर में मुझसे किसी ने मेरी जाति या सरनेम नहीं पूछा, मैं अपने नाम से जाना जाता रहा। लेकिन जब 2014 के लोकसभा चुनाव में मेरा परिचय पार्टी कार्यकर्ताओं से उम्मीदवार के रूप में कराया गया तो मेरे विरोध के बावजूद मेरे नाम के साथ मेरा 'सरनेम' बताया गया। बाद में मुझे बताया गया- सर आप जीतोगे कैसे, आपकी जाति के यहां काफी वोट हैं।'
बात यहीं खत्म नहीं हुई है गरीबों, दबे कुचलों और सबकी बात करने वाली आप पार्टी में भी पुरानी राजनीतिक पार्टियों की तरह जातिगत राजनीति का बोलबाला है। पार्टी नेता केजरीवाल और मनीष सिसोदिया भले ही ईमानदार पार्टी का दावा करते रहे हों लेकिन पार्टी के ईमानदार कार्यकर्ताओं का खुलासा समय- समय पर सामने आता रहा है।
अब जब लोकसभा चुनाव सिर पर हैं और सारी राजनीति पार्टियां जातिगत राजनीति में व्यस्त हैं तो आम जन की पार्टी आशुतोष के इन आरोपों को तब धार मिली जब पार्टी की पहली उम्मीदवार आतिशी मार्लेना के नाम से मार्लेना हटाने की बात सामने आई।
आम आदमी पार्टी कंठ तक जातिगत राजनीति में डूबी हुई है इसका खुलासा तब हुआ जब पार्टी की वरिष्ठ नेता आतिशी मार्लेना ने पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट प्रभारी के रूप में काम करते हुए अपना बदल लिया। अब वह अपना नाम आतिशी ही इस्तेमाल कर रही हैं। आतिशी के ट्विटर हैंडल समेत प्रचार सामग्री से भी मार्लेना टाइटल गायब है।
मार्लेना सरनेम हटाने की वजह पर आतिशी कहती हैं कि आप मेरे काम पर चर्चा कीजिए, नाम में क्या रखा है, लेकिन आप सूत्रों का कहना है कि भ्रम की स्थिति से बचने के लिये मार्लेना टाइटल आतिशी ने खुद ही हटाया है। ऐसा माना जा रहा था कि विपक्षी दल इस टाइटल का इस्तेमाल कर लोगों में उनके धर्म को लेकर अफवाह न फैला सकें।
वामपंथी विचारधारा रखने वाली आतिशी इस सरनेम का इस्तेमाल कर रही थीं। यह मार्क्स व लेनिन को जोड़कर बना है। पंजाबी मूल की आतिशी क्षत्रिय हैं। उनके पिता विजय सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। पार्टी सूत्र बताते हैं कि पूर्वी दिल्ली सीट का प्रभार मिलने के बाद से अफवाह उड़ाई जा रही है कि आतिशी ईसाई समुदाय से हैं। इसकी वजह उनके नाम से जुड़ा टाइटल था।
दूसरी तरफ, इस बारे में सवाल करने पर आतिशी ने कहा कि अजीब बात है कि लोग हमारे काम से ज्यादा नाम की चर्चा कर रहे हैं। कोई इस पर बात नहीं कर रहा है कि आतिशी ने शिक्षा के लिए क्या किया। लोग मार्लेना टाइटल की चर्चा कर रहे हैं। उपनाम लगाना न लगाना या क्या लगाना है, यह निजी फैसला है।
गौरतलब है कि ऑक्सफोर्ड से उच्च शिक्षा लेने के बाद आतिशी आप से जुड़ीं। 2013 और 2015 के चुनाव में उन्होंने आप का घोषणा पत्र तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। सरकार बनने के बाद शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने आतिशी को अपना सलाहकार बनाया। हालांकि, अप्रैल 2018 में गृह मंत्रालय के आदेश पर यह नियुक्ति रद्द हो गई थी। इसके बाद आप ने उन्हें पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट का प्रभारी नियुक्त किया है। दिल्ली में शिक्षा क्षेत्र में हो रहे काम में आतिशी की भूमिका अहम मानी जाती है।
वहीं खुद को पाकसाफ बताने वाली तब पिछले दिनों आप पार्टी की मजबूत कड़ी माने जाने वाले दो नेताओं आशीष खेतान और आशुतोष ने पार्टी को बाय-बाय कहे जाने के बाद यह साफ हो गया है कि पार्टी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। लोकसभा चुनाव से पहले दो वरिष्ठ नेताओं का पार्टी से अलग होना और फिर पार्टी में सबकुछ ठीक कहना गड़बड़ी की ओर ईशारा है। इन सबके बीच आप पार्टी ने आतिशी मारलेना को अपना पहला उम्मीदवार घोषित किया है तब से पार्टी की टूट खुल कर सामने आई है।
जातिगत राजनीति के लगते रहे हैं आरोप
वैसे यह तो साफ है कि आतिशी ने अपना सरनेम मार्लेन एक दिन में तो नहीं हटाया है पार्टी में इस पर अच्छे से सलाह मशविरा हुआ होगा और फिर मुख्यमंत्री और पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल साहब की रजामंदी के बाद तय किया गया होगा कि चुनाव जीतने के लिए जो भी जरूरी है, वो किया जाना चाहिए। नई राजनीति का उनका वादा पूरा करने से पहले ही पुराना हो चुका है। संगी साथियों के जाने से चौतरफा किरकिरी झेल रहे केजरीवाल डरे हुए हैं कि कहीं बीजेपी और दूसरी पार्टियां कहीं आतिशी के सरनेम को लेकर राजनीति न करें और उन्हें ईसाई न बताएं अगर ऐसा हुआ तो वह फिर वे चुनाव हार सकती हैं।
लेकिन मार्लेन के सरनेम हटाने और आशुतोष के दुख से यह तो तय हो गया है कि आप ने कुछ भी नया नहीं किया है बल्कि राजनीति का नाम ही दावे करना रहा है और वही केजरीवाल ने भी किया है। इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि अरविंद केजरीवाल न केवल खुद बल्कि उनके साथ कई और नेताओं ने राजनीति की वैतरणी पार करने में कामयाब रहे हैं। और उनका यह दावा कि वह साफ सुथरी राजनीति करने आए हैं वह कोरी कहावत साबित हो रही है।
लेकिन इन सबके बीच यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति जाति से तो चलती है लेकिन अगर बंदे में हो दम तो राजनीति ईसाई की भी चलती है। और इसके लिए सबसे बड़ा उदाहरण हैं जॉर्ज फर्नांडिस। जब वह चुनावी मैदान में उतरे तो मतदाताओं ने उन्हें ईसाई को नहीं जॉर्ज के काम पर वोट दिया था।
जब केजरीवाल ने कहा था कि वो बनिया हैं
अरविंद केजरीवाल ने अन्ना आंदोलन से अलग होकर देश में आदर्शवादी राजनीति करने की बड़ी-बड़ी बातें कही थीं, लेकिन वक्त बे वक्त वो अपने समाज और जाति का जिक्र करना नहीं भूले। विधानसभा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के नेहरू प्लेस में कारोबारियों की एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था, 'मैं बनिया हूं और धंधा समझता हूं। उन्होंने कारोबारियों को लुभाने के लिए कई कदम उठाने का भी एलान किया।' केजरीवाल ने कहा था कि अग्रवाल समुदाय इस देश की इकॉनमी की रीढ़ की हड्डी है।
पार्टी है सवर्णों की
आम आदमी पार्टी की सर्वोच्च निर्णायक इकाई में भी आम आदमी की राजनीति करने का दावा करने वालों ने सभी 11 सदस्य सवर्ण हैं. दूसरी ओर पार्टी के 25 नेशनल कन्वेनर्स में से भी एक-दो नाम छोड़कर सभी सवर्ण हैं। पार्टी के दिल्ली में केजरीवाल सहित 7 मंत्री हैं जिनमें से 5 सवर्ण हैं। जाहिर है अरविंद केजरीवाल के लिए जातिवादी राजनीति को लेकर अपने ऊपर उठ रहे सवालों का जवाब देना आसान नहीं होगा।