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Hindi News ›   India News ›   A story of female Indian cricketer, Will I play cricket or become mother?

क्रिकेटर नेहा तंवर ने मां बनने का किया फैसला, फिर की वापसी

Tue, 08 Mar 2016 03:05 PM IST
बीबीसी/नई दिल्ली
बीबीसी/नई दिल्ली Updated Tue, 08 Mar 2016 03:05 PM IST
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A story of female Indian cricketer, Will I play cricket or become mother?
नेहा तंवर

मैं, नेहा तंवर, ओपनिंग बैट्सवुमैन और ऑफ स्पिनर। भारतीय टीम की तरफ से वेस्ट इंडीज, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और इंग्लैंड के खिलाफ खेल चुकी हूं। पर 2014 में मैंने ये सब छोड़ दिया ताकि मैं मां बन सकूं। 14 फरवरी 2014 को जब मैंने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला स्टेडियम के बाहर कदम रखे तो मुझे मालूम था कि ये मेरा आखिरी मैच था। बहुत सोच-समझ कर लिए फैसले के बावजूद उस वक्त मन बहुत दुखी था।

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ऐसा नहीं था कि मैंने अपने करियर की बुलंदियों को छू लिया था या मन में तय कर लिया था कि सारे लक्ष्य हासिल कर लिए थे। मैंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल और फिटनेस के बेहतरीन स्तर को देखा था और समझा था, कई देश की टीमों का सामना किया था। पर अभी भी क्रिकेट का मक्का माने जानेवाले लॉर्ड्स मैदान पर बल्ला नहीं घुमाया था।
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अब भी मेरे अंदर बहुत क्रिकेट बाकी था। लेकिन अब वक्त हो गया था। दबाव परिवार का तो था ही, मेरा अपना मन भी कह रहा था कि अब मेरा मैदान मेरा घर होगा, मेरा बच्चा होगा। पर जब मैं गर्भवती हुई तो क्रिकेट के बाहर खुद को सोच ही नहीं पाती थी, हर चीज में क्रिकेट को ढूंढती थी। टीवी पर मैच देखती रहती थी, कमेंटरी सुनती थी और अपने पुराने खेल के वीडियो देखती।

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A story of female Indian cricketer, Will I play cricket or become mother?
नेहा तंवर

जैसे-जैसे डिलिवरी का समय करीब आया, मुझे डिप्रेशन होने लगा। हर वक्त मैदान पर खेलनेवाली मैं, बिस्तर पर लेटी रहती थी। मुझे लग रहा था कि मैं आसानी से क्रिकेट छोड़ पाऊंगी पर ये तो बहुत मुश्किल होता जा रहा था। मजे कि बात तो ये है कि मैंने कभी भी क्रिकेट खेलने का सपना नहीं देखा था।

स्पोर्ट्स में अच्छी तो थी लेकिन शौक एथलेटिक्स का था। कॉलेज में एडमिशन लेने के लिए भी एथलेटिक्स के ट्रायल के लिए गई थी। पर एथलेटिक्स के कोच नहीं आए थे और क्रिकेट का ट्रायल हो रहा था। बस यूं ही दे दिया, पास हो गई और दिल्ली के मैत्रई कॉलेज में दाखिला हो गया।

तब उड़ान इतनी ऊंची नहीं थी, सोचती थी कि सभी कॉलेजों से चुनकर बनाई जानेवाली दिल्ली युनिवर्सिटी की क्रिकेट टीम में भी जगह मिल गई तो यही सबसे बड़ी उप्लब्धि होगी। जब ऐसा हुआ तो बहुत खुश हुई, मुझे लगा मुझे सब कुछ मिल गया है। पर अभी तो बहुत रास्ता बाकी था।

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नेहा तंवर

पहले अंडर-19, फिर सीनियर लेवल और फिर रेलवे में स्पोर्ट्स श्रेणी में ट्रायल पास किया और नौकरी मिली। तबतक तो क्रिकेट से मोहब्बत इतनी बढ़ गई थी कि क्या कहूं। नजरें आसमान की ओर थीं। मैंने खूब मेहनत की और दिल्ली टीम में चुनी गई, फिर इंटर-जोनल, चैलेंजर ट्रॉफी और आखिरकार 2011 में भारत की टीम में जगह मिली। यही वो समय था कि मेरी शादी हुई। शादी के बाद भी मैं खेलती रही। तीन साल गुजर गए और आखिर मां बनने यानि क्रिकेट छोड़ने का वक्त आ गया।

नौ महीने तक अपने आप से लड़ने के बाद आखिर मैंने हिम्मत जुटाई और अपने परिवार से कहा कि ये हो नहीं पा रहा। बिना क्रिकेट के जिंदगी अधूरी है। मैं बहुत खुशनसीब थी कि वो मान गए। बल्कि मेरे बेटे श्लोक को संभालने की जिम्मेदारी भी ले ली। अब मेरे सामने चुनौती मेरी अपनी थी। प्रेगनेन्सी के वक्त मेरा वजन 20 किलो से बढ़ गया था। अगर मुझे वापस भारत की टीम में जगह बनानी थी तो फिटनेस सबसे जरूरी थी।

ये बहुत मुश्किल था। प्रिमेच्योर सिजेरियन डिलिवरी की वजह से मैं बहुत कमजोर भी हो गई थी। डॉक्टर ने लंबा बेडरेस्ट बताया था। मुझे भी अपने शरीर में इतने बदलाव महसूस हो रहे थे, कि मैं ठीक से उठ-बैठ भी नहीं पाती थी। वजन इतना परेशान करता था कि एक बार लगा कि मैंने जो सोचा है उसे कर भी पाऊंगी या नहीं।

मां बनने के बाद बढ़ गया वजन

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नेहा तंवर अपने बेटे के साथ

श्लोक के पैदा होने के छह महीने के बाद मैंने धीरे-धीरे पैदल चलना शुरू किया। फिर जॉगिंग, फिर दौड़ना पर अब भी बल्ला पकड़ने लायक फिटनेस से मैं बहुत दूर थी। पहले दो महीनों में दो-तीन किलो कम होने के बाद, मानो वजन वहीं रुक गया।

बहुत मेहनत के बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। लेकिन मैं ट्रेनिंग पर नहीं जा पा रही थी। एक दिन, फिर उसके अगले दिन भी, उसके अगले भी। हताशा ने मुझे तोड़ दिया था। फिर पांच दिन बाद पता नहीं कैसे मेरे इरादे फिर मजबूत हुए और मैंने तय किया कि कोशिश करना नहीं छोड़ूंगी, और चल पड़ी मैदान की ओर।

आखिर छह महीने की कड़ी मेहनत के बाद मैंने अपना वजन 20 किलो कम कर लिया और दिल्ली की टीम के ट्रायल्स के लिए पहुंच गई।वहां मुझे देखकर किसी को यकीन नहीं हुआ कि मैं एक बच्चा पैदा करने के बाद भी इतनी फिट हूं। टीम में ज्यादातर युवा खिलड़ियों को तरजीह दी जाती है पर मेरे अनुभव को फिर जगह मिल गई।

क्रिकेट ने दी हिम्मत

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नेहा तंवर औऱ उनके पति

मैं फिर मैदान पर कदम रखने के लिए तैयार थी। साथ ही पहली बार अपने एक साल के बेटे को उसके पापा, दादा-दादी के पास छोड़ शहर से बाहर जाने के लिए भी। ये भी उतना आसान नहीं था, जब पहले दिन श्लोक को छोड़ा तो गला रुंधा रहा। जब फोन पर उसका हाल पूछा तो रो भी पड़ी।

पर क्रिकेट के खेल ने हिम्मत दी। हिम्मत भी और खुशी भी। मैं अब 29 साल की हूं। मैं जब तक फिट रहूंगी, खेलती रहूंगी। मैं और महिला क्रिकेटर्स को नहीं जानती जिन्होंने बच्चा पैदा करने के बाद खेल में वापसी की हो। मैंने की है और मैं इस मौके को गंवाना नहीं चाहती। दिल्ली की टीम में जगह बनाई है पर अब मुझे भारत की टीम में जगह बनानी है। लॉर्ड्स के मैदान पर खेलना है।

राहुल द्रविड़ की तरह, जो मैदान पर डटे रहते हैं और टीम को जिताकर आते हैं। मैं उस महान खिलाड़ी जैसी तो नहीं हूं पर किसी ने मुझसे कहा है कि मैं जिंदगी की पिच पर जमे रहकर, अपने दायरों को तोड़ने का हौसला जरूर रखती हूं।
(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से बातचीत पर आधारित।)

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