जानिए देश के उन दस स्थानों के बारें में, जहां होती है रावण की पूजा
- जब रावण ने स्थापित किया शिवलिंग
- जहा बीता रावण का बचपन
- रावण की ससुराल
- जहा गूंजता है ' रावण बाबा नमः '
- रावण को मिला शिव का परमभक्त बनने का वरदान
- जहा दशानन ने रचाई शादी
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विस्तार
बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न और राम की रावण पर विजय- यानि विजयदशमी के दिन एक नहीं, बल्कि दो जीतों का जश्न मनाया जाता है। पहली जीत प्रभु राम की और दूसरी जीत देवी दुर्गा की, जिसमें उन्होंने नौ दिनों तक राक्षस महिषासुर के साथ युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध करके उस पर विजय प्राप्त की।
रावण जहाँ बुराई का प्रतीक है, वहीं वो महाज्ञानी भी था, उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके ज्ञान हासिल किया था, लेकिन रावण का अहंकार उसको राम के सामने लाकर आ गया और उसका वध कर के भगवान राम ने बुराई पर अच्छाई की जीत हासिल की। उसी दिन से इसको बुराई पर अच्छाई की जीत का त्योहार मानकर दशहरा के रूप में समस्त देश में मनाया जाता है।
रावण की गलतियों की सीख दी जाती है और राम जैसे गुणों को धारण करने की प्रेरणा भी | मगर देश में कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि पूजा की जाती है.
चलिए आपको ऐसी जगहों के बारे में बताते हैं, जहां पर रावण की पूजा की जाती है...
रावण रुंडी, मंदसौर (मध्यप्रदेश)
रावणग्राम, विदिशा (मध्यप्रदेश)
काकीनाडा (आंध्र प्रदेश)
जोधपुर (राजस्थान)
बिसरख (उत्तर प्रदेश)
इस जगह के बारे में कहा जाता है कि रावण यहां पैदा हुए थे, यही कारण है कि इस गांव के लोग आज भी दशहरा और दिवाली नहीं मनाते हैं, बल्कि रावण की मौत पर शोक मनाते हैं। नवरात्रि के दौरान रावण को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है और आत्मा की शांति के लिए बहुत सारे अनुष्ठान भी किये जाते हैं| बिसरख का ये मंदिर भारत के प्रसिद्ध रावण मंदिरों में से एक माना जाता है |
कांगड़ा, (हिमाचल प्रदेश)
हिमाचल प्रदेश के कंगड़ा जिले में दशहरे के दिन रावण को नहीं जलाया जाता है, पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण ने भगवान शिव को बैजनाथ, कांगड़ा में ही अपनी भक्ति और तपस्या के साथ प्रसन्न किया था और ऐसा माना जाता है कि इसी जगह पर भगवान शिव ने उन्हें वरदान भी दिया था, इसलिए रावण को भगवान शिव के सबसे बड़े भक्त के रूप में भी जाना जाता है|
गढ़चिरोली, (महाराष्ट्र)
महाराष्ट्र के गडचिरोली में गोंड जनजाति के लोग रहते हैं, जो आज भी रावण और उनके पुत्र मेघनाद को भगवान के तौर पर पूजते हैं। अगर गोंड जनजातियों की मान्यताओं को मानें तो उनके अनुसार, रावण को वाल्मीकि की रामायण में कभी भी खलनायक नहीं दिखाया गया था और वाल्मीकि ऋषि ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था कि रावण ने कुछ भी गलत नहीं किया था। वहीं दूसरी तरफ तुलसीदास की रामायण में रावण को दुष्ट राक्षस के रूप में दिखाया गया था. यहाँ पर रावण की बहुत विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है|
कोलार जिला, (कर्नाटक)
फसल महोत्सव के दौरान कोलार जिले के लोग रावण की पूजा करते हैं और इस मौके पर भव्य जुलूस भी निकालते हैं| ये लोग रावण की पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि वह भगवान शिव का परम भक्त था और लंकेश्वर महोत्सव में भगवान शिव के साथ रावण की प्रतिमा भी जुलूस में निकाली जाती है| इसी राज्य के मंडया जिले के मालवल्ली तहसील में रावण का एक मंदिर भी है, जहाँ पर उसे अपना मुख्य देवता भी माना जाता है|
कानपुर, (उत्तर प्रदेश)
कानपुर एक ऐसी जगह है, जहां पर दशहरा के दिन रावण की पूजा की जाती है। इतना ही नहीं, यहां रावण का मंदिर भी मौजूद है, जिसके पट केवल साल में दो दिन के लिए दशहरा के मौके पर ही खोले जाते हैं। इस दिन यहां पूरे विधि-विधान से रावण का दुग्ध स्नान किया जाता है और अभिषेक कर श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद रावण की स्तुति कर आरती की जाती है।
जसवंत नगर, (उत्तर प्रदेश)
यहाँ पर विधि विधान के साथ रावण की पूजा आरती की जाती है और फिर उसके बाद रावण के टुकड़े कर दिए जाते हैं |
रावण आयुर्वेद, तंत्र और ज्योतिष का ज्ञाता रावण अपने युग का प्रकांड पंडित ही नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक भी था। आयुर्वेद, तंत्र और ज्योतिष के क्षेत्र में उसका योगदान था| इंद्रजाल जैसी अथर्ववेदमूलक विद्या का रावण ने ही अनुसंधान किया था। मगर अपने अहंकार और दुराचार के कारण उसकी यह गति हुई, जो त्रेता युग से लेकर आजतक सबके लिए एक सबक है कि बुराई कितनी भी मजबूत क्यों न हो, मगर उसका अंत सच्चाई से ही होता है |