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BSF: बीएसएफ के 9 युवा कमांडरों ने छोड़ दी नौकरी, गृह मंत्रालय ने दी वीआरएस को मंजूरी, कहीं ये कारण तो नहीं?

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 03 Feb 2025 07:03 PM IST
सार

BSF: गत सप्ताह बीएसएफ के सहायक कमांडेंट पंकज कुमार राणा, सहायक कमांडेंट कमलेश मीणा, सहायक कमांडेंट परमा नंद, सैकेंड इन कमांड 'टूआईसी' विपिन कुमार, डिप्टी कमांडेंट भूपेश जोशी, कमांडेंट/सीएमओ डॉ. प्रवीण कुमार झा, सहायक कमांडेंट शिव मोहन सिंह, सहायक कमांडेंट अजय पाल सिंह और टूआईसी अभिमन्यु कुमार सिंह की वीआरएस फाइल को मंजूरी मिली है।

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9 young BSF commanders left their jobs, Home Ministry approved VRS
बीएसएफ - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सीमा सुरक्षा बल 'बीएसएफ' के नौ कैडर अधिकारियों ने एक झटके में नौकरी छोड़ दी है। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 'वीआरएस' लेने वाले अफसरों में एक कमांडेंट, दो टूआईसी, एक डीसी और पांच सहायक कमांडेंट शामिल हैं। एक साथ नौ अफसरों का फोर्स को अलविदा कहना, न केवल बीएसएफ, अपितु दूसरे केंद्रीय बलों के अफसरों के बीच भी चर्चा का विषय बना हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले सप्ताह उक्त नौ अफसरों की वीआरएस स्वीकार कर ली है। बीएसएफ के पूर्व अफसर कहते हैं, इसके पीछे कोई तो वजह रही है। ऐसे तो कोई अपनी जॉब को यूं बीच राह में नहीं छोड़ता। पदोन्नति में स्थिरता, वित्तीय स्थिति और बेहतर करियर का विकल्प, वीआरएस के पीछे कुछ ऐसे ही कारण रहे होंगे।  
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गत सप्ताह बीएसएफ के सहायक कमांडेंट पंकज कुमार राणा, सहायक कमांडेंट कमलेश मीणा, सहायक कमांडेंट परमा नंद, सैकेंड इन कमांड 'टूआईसी' विपिन कुमार, डिप्टी कमांडेंट भूपेश जोशी, कमांडेंट/सीएमओ डॉ. प्रवीण कुमार झा, सहायक कमांडेंट शिव मोहन सिंह, सहायक कमांडेंट अजय पाल सिंह और टूआईसी अभिमन्यु कुमार सिंह की वीआरएस फाइल को मंजूरी मिली है। बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं, देखिये इस तरह से वीआरएस लेने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। बीएसएफ में, खासतौर से जूनियर स्तर पर कैडर अधिकारियों में पदोन्नति को लेकर परेशानी देखी जा रही है। अगर समय पर पदोन्नति मिलती रहे तो कोई भी अफसर नौकरी छोड़ने की नहीं सोचता। किन्हीं कारणों से आर्थिक फायदों में पिछड़ना, यह भी एक वजह हो सकती है। 
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जैसे 2019 में कैडर अधिकारी अपने करियर से जुड़ी लड़ाई, सुप्रीम कोर्ट से जीत गए, लेकिन फिर भी नए सर्विस रूल नहीं बन सके। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद, केंद्र सरकार टालमटोल की नीति पर चलती रही। सूद के मुताबिक, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के हजारों अफसर प्रमोशन एवं वित्तीय फायदों में हुए भेदभाव को लेकर परेशान हैं। जूनियर अफसरों को तो 15 वर्ष में पहली पदोन्नति भी नहीं मिल पा रही। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से एनएफएफयू मिला, मगर उसका लाभ सभी को नहीं मिल सका। विशेषकर, कमांडेंट स्तर तक के अफसरों के हाथ तो लगभग खाली ही रहे। दूसरा, बीएसएफ में कई जगहों पर हार्ड पोस्टिंग रहती है। बॉर्डर गार्डिंग के अलावा दूसरी ड्यूटी भी बीएसएफ से ली जाती हैं। ऐसे में मूल कार्य प्रभावित होता है। 
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बतौर पूर्व एडीजी, चुनावी ड्यूटी का उदाहरण सबके सामने है। जिस तरह से केंद्र सरकार की दूसरी संगठित सेवाओं में एक तय समय के बाद रैंक या फिर उसके समकक्ष वेतन मिलता है, वैसा सभी केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधिकारियों को नहीं मिल पा रहा है। करीब बीस साल की सेवा के बाद आईपीएस अधिकारी आईजी बन जाता है, लेकिन कैडर अफसर उस वक्त कमांडेंट के पद तक भी नहीं पहुंच पा रहा। 



सीआरपीएफ और बीएसएफ में तो डेढ़ दशक में पहली पदोन्नति मिल रही है। कैडर अफसर 35 साल की नौकरी के बाद बड़ी मुश्किल से डीआईजी या आईजी बनता है। डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों में ओजीएएस यानी 'आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' के तहत सेवा नियम बनाने के आदेश जारी किए थे। अभी तक सर्विस रूल नहीं बनाए गए हैं। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बावजूद कैडर अफसरों को कोई राहत नहीं दी। ऐसे में संभव है कि कैडर अफसरों को कोई दूसरा बेहतर विकल्प मिल रहा हो। नतीजा, वे बॉर्डर गार्डिंग फोर्स 'बीएसएफ' को अलविदा कह देते हैं। 

बीएसएफ के पूर्व आईजी भोला नाथ शर्मा ने बताया, मौजूदा समय में तकरीबन हर रैंक पर ठहराव सा है। दूसरी ओर, कैडर अफसरों को वित्तीय फायदे भी पूरे नहीं मिलते। वे बल की नीतियों से संतुष्ट नहीं होते। कैडर अफसरों को एक ही रैंक में लंबे समय तक काम करना पड़ता है। जब उनकी शिकायत दूर नहीं होती तो वे दूसरा विकल्प खोजते हैं। ओपीएस का प्रावधान भी अब नहीं रहा। गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन का फायदा सभी को नहीं मिल रहा। नतीजा, बीएसएफ कैडर अफसर अच्छे विकल्प की तलाश में रहते हैं। 

कुछ बलों में पदोन्नति तेज गति से हो रही है, लेकिन बीएसएफ और सीआरपीएफ में यह रफ्तार बहुत धीमी है। ये दोनों बड़े बल हैं। बड़े बैच आने के कारण पदोन्नति ब्लॉक होती है। सरकार इन बलों में तय समय पर पदोन्नति देने के बारे में गंभीरता से सोचे। 

बता दें कि ग्राउंड कमांडर व दूसरे अधिकारियों को अपने हकों के लिए अदालत में जाना पड़ रहा है। नियमों की गलत व्याख्या के कारण कैडर अधिकारियों को लाभ से वंचित रखा गया है। जब उन्होंने मजबूरी में कोर्ट का रुख किया तो विभाग ने उनका साथ नहीं दिया। इन अफसरों को नियमों के अनुसार, वित्तीय लाभ, मकान भत्ता, राशन मनी, डिटैचमेंट एलाउंस व ओल्ड पेंशन आदि न मिलने के कारण कोर्ट की शरण लेनी पड़ी है। 

अदालत से केस जीतने के बाद भी इन्हें पूरे फायदे नहीं मिल रहे। विभाग अपने ही अधिकारियों के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में रिव्यू पिटीशन एवं सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल कर रहा है। हैरानी की बात तो ये है कि कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट से जीतने के बाद भी उसका लाभ लेने के लिए याचिकाकर्ताओं को अवमानना याचिका तक दाखिल करनी पड़ रही है।

सूत्रों के मुताबिक, पदोन्नति का मुद्दा उठाने वाले कैडर अफसरों को दो टूक जवाब मिलता है कि मामला तो अभी कोर्ट में है। डीपीसी पर स्टे है। अगर ऐसे ही डीपीसी पर स्टे लिया जाता रहा और विभाग, निष्क्रियता दिखाता रहा तो ये एक खतरनाक ट्रेंड बन जाएगा। वरिष्ठता सहित कई मुद्दे अदालत में चलते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि इस प्रक्रिया के दौरान योग्य अधिकारियों को पदोन्नति नहीं मिलती। सब्जेक्ट टू कोर्ट जजमेंट के हिसाब से पदोन्नति दी जा सकती है। सूत्रों ने बताया कि कोर्ट केसों में विभाग का रवैया अभी तक लचर ही रहा है। अधिकारियों को समय पर नोटिस तक सर्व नहीं किया जाता। जब भी ग्राउंड कमांडर इस मुद्दे को बल मुख्यालय के शीर्ष अफसरों के समक्ष उठाते हैं तो यह दिलासा दी जाती है कि लॉ इकाई, इस मामले में सक्रिय है। वरिष्ठता के मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्टे चल रहा है, इसे जल्द खत्म कराने का प्रयास हो रहा है। 

केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत अर्धसैनिक बल, बीएसएफ और सीआरपीएफ की कैडर समीक्षा फाइल, अभी तक कहीं पर अटकी है। गत वर्ष की अंतिम कैडर समीक्षा रिपोर्ट में इन दोनों बलों का नाम नहीं था। डीओपीटी के नियमानुसार, हर 5 साल में कैडर समीक्षा पूरी होना जरुरी है। सीआरपीएफ का पिछला कैडर रिव्यू 2016 में हुआ था। बल के लिए कैडर रिव्यू कमेटी 'सीआरसी' की बैठक 15 दिसंबर 2015 को हुई थी, जबकि उसे 29 जून 2016 को कैबिनेट की मंजूरी मिली थी। इसी तरह बीएसएफ के कैडर रिव्यू को 12 सितंबर 2016 को कैबिनेट की स्वीकृति प्रदान की गई थी। डीओपीटी की तरफ से जारी कैडर समीक्षा रिपोर्ट में सीआरपीएफ और बीएसएफ का नाम ही नहीं है। अब इनके रिव्यू की क्या स्थिति है, फाइल किसकी टेबल पर है, इसकी जानकारी तक नहीं दी गई है। 

सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी एचआर सिंह ने कहा है, कैडर अधिकारी, नेतृत्व की सभी योग्यताएं पूरी करते हैं। वे बल से जुड़ी हर छोटी बड़ी बात से वाकिफ हैं। जनहित में उन्हें शीर्ष पद भी सौंपा जाना चाहिए। सीआरपीएफ के पहले महानिदेशक वीजी कनेत्कर ने कहा था, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। दूसरी तरफ, 1955 के फोर्स एक्ट में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इतना ही नहीं, 1970 में तत्कालीन होम सेक्रेट्री लल्लन प्रसाद सिंह, जेएस, बीएसएफ व सीआरपीएफ के डीजी ने भी लिखा था कि केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। इन बलों में कैडर अधिकारियों को ही नेतृत्व करने का मौका दिया जाए। ऐसे में वे पदोन्नति के जरिए इन बलों में आगे बढ़ते रहेंगे। एक समय के बाद वे टॉप तक पहुंच जाएंगे। 

तब डीजी बीएसएफ केएफ रुस्तम ने कहा था, केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस अफसर के लिए पदों का आरक्षण न किया जाए। इसका 1955 के फोर्स एक्ट में भी प्रावधान नहीं है। हम अपने अफसर तैयार करेंगे, जो कुछ समय बाद फोर्स का नेतृत्व करेंगे। इसके बाद 1968 में सीआरपीएफ के पहले डीजी वीजी कनेत्कर ने कहा था, मुझे आईपीएस की जरूरत नहीं है। 


तत्कालीन गृह सचिव एलपी सिंह ने भी दोनों बलों के डीजी की बात को सही माना। सिंह ने कहा, शुरू में बीस फीसदी अफसर आर्मी व आईपीएस कैडर से ले लो। थोड़े समय बाद डीआईजी, कमांडेंट और सहायक कमांडेंट के पद कैडर को सौंप दिए जाएं, लेकिन आईपीएस के लिए वैधानिक आरक्षण न किया जाए। 1970 में गृह मंत्रालय के डिप्टी डायरेक्टर 'संगठन' जेसी पांडे ने लिखा, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईपीएस के लिए पद फिक्स मत करो। इससे कैडर अफसरों के मौके प्रभावित होंगे। उस वक्त सीआरपीएफ डीजी ने कहा, अब केवल वर्किंग फार्मूला ले लो, जो बाद में नई व्यवस्था के साथ परिवर्तित हो जाएगा।

 
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