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जलवायु परिवर्तन: हर साल सूखे की चपेट में आ रहा 50 हजार वर्ग किमी क्षेत्र, 1980 के बाद से बढ़ रही समस्या

Sat, 22 Feb 2025 05:14 AM IST
शिव शुक्ला अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: शिव शुक्ला Updated Sat, 22 Feb 2025 05:14 AM IST
सार

यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र की रिपोर्ट ग्लोबल ड्राउट सितंबर 2024 के अनुसार, 2023-24 के दौरान दुनियाभर में 52 लंबे समय तक चलने वाले सूखे दर्ज किए गए। जुलाई 2024 में वैश्विक औसत तापमान 17.16 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया जो रिकॉर्ड स्तर पर था।

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50 thousand square km area is getting affected by drought every year Due to climate change
सूखा - फोटो : एएनआई

विस्तार

980 के बाद से दुनिया में सूखे की समस्या लगातार बढ़ रही है और जलवायु परिवर्तन के कारण इसकी तीव्रता और बढ़ने की आशंका है। हर साल औसतन 50 हजार वर्ग किमी क्षेत्र सूखे की चपेट में आ रहा है। यह जानकारी स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट फॉर फॉरेस्ट, स्नो एंड लैंडस्केप रिसर्च के नेतृत्व में किए गए शोध में सामने आई है। इसके नतीजे साइंस जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।

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शोधकर्ताओं ने 1980 से 2018 के बीच वैश्विक स्तर पर मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण कर सूखे का एक मॉडल तैयार किया। उन्होंने देखा कि लंबे और अधिक भीषण सूखे की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे अधिक भूमि प्रभावित हो रही है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र, कृषि और ऊर्जा उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। अध्ययन में पिछले 40 वर्षों के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।
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पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा प्रतिकूल प्रभाव
बढ़ते तापमान, दीर्घकालिक सूखा और वाष्पोत्सर्जन की अधिकता की वजह से पारिस्थितिकी तंत्र धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं। इससे वनस्पतियों की हरियाली घटती जा रही है और कई स्थानों पर भारी बारिश भी देखने को मिल रही है। वैज्ञानिकों ने उपग्रह चित्रों के जरिये वनस्पतियों में आए बदलावों पर नजर रखी है, जिससे सूखे के प्रभावों की निगरानी की जा सकती है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि उष्णकटिबंधीय जंगल सूखे के प्रभाव को तब तक सहन कर सकते हैं जब तक कि उनके पास पर्याप्त जल भंडार मौजूद हो।
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खतरे की चेतावनी
शोधकर्ताओं ने सूखे की प्रवृत्ति को उच्च रिजाल्यूशन वाले वैश्विक मानचित्रों में भी दर्ज किया है। हालांकि, इसके दीर्घकालिक प्रभाव अब भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि अगर पानी की लगातार कमी बनी रही तो उष्णकटिबंधीय और बोरियल क्षेत्रों के पेड़ सूख सकते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र को स्थायी क्षति हो सकती है। खास कर बोरियल जंगलों को इस प्रकार की जलवायु आपदाओं से उबरने में सबसे अधिक समय लग सकता है।


52 लंबे समय तक चलने वाले सूखे
यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र की रिपोर्ट ग्लोबल ड्राउट सितंबर 2024 के अनुसार, 2023-24 के दौरान दुनियाभर में 52 लंबे समय तक चलने वाले सूखे दर्ज किए गए। जुलाई 2024 में वैश्विक औसत तापमान 17.16 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया जो रिकॉर्ड स्तर पर था।

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