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जब संसद में ही हों 43 फीसदी दागी तो ‘विकास दुबे’ पर लगाम कौन लगाए?

Fri, 10 Jul 2020 09:09 PM IST
गौरव पाण्डेय अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Fri, 10 Jul 2020 09:09 PM IST
सार

राजनीति में अपराधीकरण को रोकने की अब तक की गई सभी कोशिशें असफल साबित हुई हैं। एडीआर की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान संसद के 29 फीसदी सांसदों पर हत्या, दुष्कर्म और अपहरण जैसे गंभीर मामले चल रहे हैं।

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43 percent member of parliaments in India are facing criminal cases, here is all you need to knnow
संसद - फोटो : पीटीआई

विस्तार

विकास दुबे के एनकाउंटर ने राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की कड़ी तेज कर दी है। लेकिन इस बहस से एक इशारा अवश्य मिलता है कि विकास दुबे जैसे अपराधियों को किसी न किसी प्रकार का राजनीतिक संरक्षण अवश्य मिलता है जिसके बिना वे इस हद तक कभी नहीं पहुंचते। ऐसे में यह सहज सवाल उठता है कि राजनीतिक दल अपराधियों पर लगाम क्यों नहीं लगाते। इस सवाल का जवाब इसी तथ्य से मिल जाता है कि वर्तमान संसद में ही 43 फीसदी सांसद ऐसे हैं जिन पर किसी न किसी प्रकार के आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें 29 फीसदी सांसद तो ऐसे हैं जिन पर हत्या, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म और अपहरण जैसे गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं। 

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वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि राजनीति से अपराधीकरण को रोकने के लिए उन्होंने साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मांग की थी कि अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए। जनप्रतिनिधि और लोकसेवकों पर केस की सुनवाई के लिए हर जिले में एक विशेष अदालत गठित की जाए और उनके दो साल से अधिक की सजा पाने पर उन्हें आजीवन चुनाव लड़ने, किसी राजनीतिक दल के गठन या उनमें पद धारण करने पर प्रतिबंध लगाया जाए।  
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लेकिन, चुनाव आयोग की सहमति के बाद भी इस मुद्दे पर विशेष कार्रवाई नहीं हुई। किसी राज्य में एक तो किसी में दो-चार अदालतें गठित की गईं। इनमें भी सुनवाई बेहद धीमी गति से हो रही है जिससे इसका पूरा मकसद ही समाप्त हो गया। इसी जनवरी माह में एक आदेश के तहत सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक उम्मीदवार को टिकट देने पर राजनीतिक दलों को सफाई देना अनिवार्य बना दिया है। इसके बाद अभी तक कोई चुनाव नहीं हुआ है। बिहार विधानसभा चुनाव में इस आदेश का क्या असर होता है, यह देखने योग्य रहेगा।

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संसद में दागियों का दखल

एडीआर की मई 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश की वर्तमान 17वीं संसद के 542 सांसदों में से 233 सांसदों (43 फीसदी) पर किसी न किसी प्रकार के आपराधिक केस चल रहे हैं। नवनिर्वाचित 542 सांसदों में से 539 के हलफनामे की जांच के बाद यह तथ्य सामने आया था कि इनमें 159 (कुल का 29 फीसदी) पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें हत्या, दुष्कर्म और अपहरण जैसे गंभीर मामले भी शामिल हैं। 

इनमें भाजपा के 303 सांसदों में से 301 के विश्लेषण से पता चला है कि इनमें 116 सांसद (39 फीसदी) दागी हैं तो कांग्रेस के 52 में से 29 सांसद (57 फीसदी) दागी हैं। बसपा के 10 में से पांच, जेडीयू के 16 में से 13, तृणमूल कांग्रेस के 22 में से नौ और मार्क्सवादी पार्टी के तीन में से दो सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।    

सबसे ज्यादा गंभीर बात यह है कि पिछले दस साल में दागी सांसदों की संख्या 43 फीसदी तक बढ़ गई है। 2009 के लोकसभा चुनाव में आपराधिक छवि वाले सांसदों की संख्या 162 (कुल का 30 फीसदी) थी। 2014 में यह संख्या 185 (कुल का 34 फीसदी) थी। इस बार यह संख्या बढ़कर 233 (43 फीसदी) तक पहुंच गई है। 2009 में गंभीर आपराधिक मामले वाले सांसदों की संख्या 76 (14 फीसदी) थी, जो साल 2014 के चुनाव के बाद बढ़कर 112 (21 फीसदी) हो गई थी।   

छह दलों के सभी सांसदों पर आपराधिक मामले

राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय 25 दलों में से छह ऐसे हैं जिनके सभी सांसदों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। इसमें लोकजनशक्ति पार्टी, ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम भी शामिल हैं। अगर राज्यवार बात करें तो केरल से 90 फीसदी और बिहार से चुनकर आए 82 फीसदी सांसद अपराधिक रिकार्ड वाले हैं। इस मामले में पश्चिम बंगाल से 55 फीसदी, उत्तर प्रदेश से 56 फीसदी, महाराष्ट्र से 58 फीसदी चुने गए सांसद अपराधी हैं। छत्तीसगढ़ के सबसे कम नौ फीसदी सांसद और गुजरात के 15 फीसदी सांसद दागी हैं। 

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