हमारी नदियों पर निर्भर है पाकिस्तान की 2.6 करोड़ एकड़ जमीन की सिंचाई
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विशेषज्ञों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में भारत को हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर की जरूरत को पूरा करने के लिए पानी की आवश्यकता है, लेकिन सिंधु जल संधि को तोड़ देना एक विवादित विषय है। दरअसल पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत-पाकिस्तान के बीच जितनी बार विवाद बढ़ा है, उतनी बार सिंधु जल समझौते को तोड़ने की बात उठती रही है। जब कश्मीर के उड़ी में सेना मुख्यालय पर हमले के बाद भारत ने जल विवाद पर दिल्ली में होने वाली बैठक को भी रद्द कर दिया था।
विशेषज्ञों का यह कहना है कि भारत ने 1960 में यह सोचकर पाकिस्तान से संधि पर हस्ताक्षर किए कि उसे जल के बदले शांति मिलेगी, लेकिन संधि के अमल में आने के पांच साल बाद ही पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर पर 1965 में हमला कर दिया था। पड़ोसी देश की 2.6 करोड़ एकड़ कृषि भूमि सिंचाई के लिए इन नदियों के जल पर निर्भर है। यदि भारत इनका पानी अवरुद्ध कर दे तो पाकिस्तान की कमर टूट जाएगी।
क्या है सिंधु जल समझौता?
भारत और पाकिस्तान के मध्य 1960 की सिंधु जल संधि के तहत स्थायी सिंधु आयोग की स्थापना की गई थी। इस संधि के तहत आयोग को संधि के क्रियान्वयन सिंधु जल तंत्र के विकास के लिए दोनों पक्षों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने को सहयोगी व्यवस्था स्थापित करने और बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई। आयोग में दोनों देशों का प्रतिनिधित्व उनके आयुक्त करते हैं।
आजादी के समय से जारी है यह विवाद
1947 में पंजाब के विभाजन के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच नहर के पानी को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। नहरें आर्थिक नजरिए से उस वक्त बनाई गई थीं जब विभाजन का विचार किसी के मन में नहीं था, लेकिन विभाजन के कारण नहरों के पानी का बंटवारा असंतुलित हो गया। पंजाब की पांचों नदियों में से सतलुज और रावी दोनों देशों के मध्य से बहती हैं। वहीं झेलम और चिनाब पाकिस्तान के मध्य से और व्यास पूर्णतया भारत में बहती हैं।
लेकिन भारत के नियंत्रण में वे तीनों मुख्यालय आ गए जहां से दोनों देशों के लिए इन नहरों को पानी की आपूर्ति की जाती थी। पाकिस्तान का पंजाब और सिंध प्रांत सिंचाई के लिए इन नहरों पर ही निर्भर है। पाकिस्तान को लगने लगा कि भारत जब चाहे तब पानी बंद करके उसकी जनता को भूखा मार सकता है। इसीलिए विभाजन के बाद पानी विवाद शुरू हो गया। 1947 में कश्मीर को लेकर जंग लड़ चुके दोनों देशों के बीच एक बार फिर से तनाव बढ़ने लगा।
विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुआ था एग्रीमेंट
1949 में एक अमेरिकी विशेषज्ञ डेविड लिलियेंथल ने इस समस्या को राजनीतिक स्तर से हटाकर टेक्निकल और व्यापारिक स्तर पर सुलझाने की सलाह दी। लिलियेंथल ने विश्व बैंक से मदद लेने की सिफारिश भी की। सितंबर 1951 में विश्व बैंक के अध्यक्ष यूजीन रॉबर्ट ब्लेक ने मध्यस्थता करना स्वीकार किया। सालों तक बातचीत चलने के बाद 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच जल पर समझौता हुआ। संधि के मुताबिक इस आयोग की साल में कम से कम एक बैठक भारत-पाकिस्तान में होनी चाहिए। आयोग की 113वीं बैठक पिछले वर्ष 20 से 21 मार्च तक पाकिस्तान में हुई थी।
क्या रद्द हो सकती है संधि?
सिंधु के पानी को लेकर दोनों के बीच खींचतान भी चलती रही है। पाकिस्तान भारत की बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं पाकल (1,000 मेगावाट), रातले (850 मेगावाट), किशनगंगा (330 मेगावाट), मियार (120 मेगावाट) और लोअर कलनाई (48 मेगावाट) पर आपत्ति उठाता रहा है। हालांकि जानकार यह भी कहते हैं कि कश्मीर अपने जलसंसाधनों का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है। जब महबूबा मुफ्ती जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री थीं, तो उन्होंने कहा था कि सिंधु जल संधि से राज्य को 20 हजार करोड़ का नुकसान हो रहा है। इसके लिए केंद्र को कुछ करना चाहिए।
विशेषज्ञ यह कह चुके हैं कि भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज की धारा 62 के अंतर्गत यह कहकर पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान चरमपंथी गुटों का उसके खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है।
ये हैं सिंधु समझौते से जुड़ी खास बातें
- समझौते के अंतर्गत सिंधु नदी की सहायक नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में विभाजित किया गया। सतलज, व्यास और रावी नदियों को पूर्वी नदी बताया गया, जबकि झेलम, चेनाब और सिंधु को पश्चिमी नदी बताया गया।
- समझौते के अंतर्गत एक स्थायी सिंधु आयोग की स्थापना की गई। इसमें दोनों देशों के कमिश्नर हर कुछ वक्त में एक दूसरे से मिलेंगे और किसी भी परेशानी पर बात करेंगे।
- समझौते के मुताबिक पूर्वी नदियों का पानी (कुछ अपवादों को छोड़े दें) भारत बिना रोकटोक के इस्तेमाल कर सकता है। पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए होगा। लेकिन समझौते के भीतर इन नदियों के पानी का कुछ सीमित इस्तेमाल का अधिकार भारत को दिया गया।
- अगर कोई देश किसी प्रोजेक्ट पर काम करता है और दूसरे देश को उसकी डिजाइन पर आपत्ति है तो दूसरा देश उसका जवाब देगा। समस्या हो तो बैठकें होंगी।