1962 की जुलाई में भी गलवां से पीछे हटा था चीन - क्या थी पूरी घटना जानें अमर उजाला के संग्रह से
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भारत और चीन के बीच मई से जारी गतिरोध के बीच सोमवार 6 जुलाई को चीनी सेना गलवां घाटी में कुछ किलोमीटर पीछे हट गई है। ऐसे में एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प संयोग ये है कि 58 साल पहले 1962 में भी वो जुलाई का ही महीना था जब ठीक इसी तरह की घटना हुई थी। और जगह भी वो ही थी - लद्दाख की गलवां घाटी।
इस घटना की गहराई में जाने के लिए हमने अमर उजाला के संदर्भ खंगाले। तब भी गर्मियों के ठीक बाद मई-जून में चीन ने अपनी हरकतें पूर्वी लद्दाख में शुरू की। जुलाई के पहले सप्ताह में गलवां में चीनी सेना काफी आगे बढ़ गई थी। बातचीत और भारत सरकार से पत्राचार के बाद वो कुछ पीछे हटी। 15 जुलाई 1962 को प्रकाशित अमर उजाला के अंक में पहले पन्ने के शीर्षक से सब स्पष्ट हो जाता है।
15 जुलाई 1962 को रविवार का दिन था और अमर उजाला के पहले पेज का शीर्षक था 'चौकी से 15 गज आने के बाद चीनी 200 गज पीछे हटे'। साथ ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का वह वक्तव्य भी प्रकाशित किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'गलवान क्षेत्र में संघर्ष का खतरा बना हुआ है और हमें तैयार रहना है'।
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दिलचस्प बात ये भी है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने वक्तव्य में आगे कहा था कि - 'हमें संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए।' पर किसी व्यापक संघर्ष की सभावना से उन्होंने उस समय इंकार किया था। हालांकि इसके ठीक 96 दिन 20 अक्तूबर 1962 को चीन ने हमला कर दिया था।
तो क्या इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है? उम्मीद तो यही की जानी चाहिए कि ऐसा ना हो पर चीन से हमें कितना सतर्क रहना है ये बताने के लिए इतिहास का ये सबक काफी है।
ऐसे में उस समय के अन्य अखबारों के शीर्षक देखना भी दिलचस्प होगा। 15 जुलाई 1962 के ही एक अंग्रेजी अखबार का शीर्षक है ‘Chinese Troops Withdraw from Galwan Post’ यानी चीनी सेना गलवां पोस्ट से पीछे हट गई है।
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पीछे हटने की इस घटना के ठीक 96 दिन बाद 20 अक्तूबर 1962 को चीनी फौज ने भारत पर हमला कर दिया था। इस वजह से यह कहा जाता रहा है कि चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। इस बार भी चीन की फौज गलवां घाटी में कुछ किलोमीटर पीछे हटी है, लेकिन कोई भी चीन पर भरोसा करने की स्थिति में नहीं है। इसी वजह से 1962 के अखबारों के शीर्षक सोशल मीडिया पर वायरल भी हो रहे हैं, जो यह संदश दे रहे हैं कि चीन पर भरोसा मत करना।
क्या हुआ था
1962 में गर्मियों के मौसम में भारत ने गलवां घाटी की किलेबंदी करके यहां गोरखाओं की तैनाती कर दी थी। छह जुलाई को चीनी सैन्य पलटन ने गोरखाओं को इलाके में घुसते हुए देखा और वापस जाकर मुख्यालय में इसकी सूचना दी। चार दिन बाद, 300 चीनी सैनिकों ने 1/8 गोरखा रेजिमेंट को घेर लिया था।
15 जुलाई को अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चीनी गलवां पोस्ट से 200 मीटर पीछे हट गए हैं। हालांकि कदम पीछे खींचने की समयावधि काफी छोटी थी और वे वापस आ गए। अगले तीन महीनों तक भारत और चीन ने एक दूसरे को विरोध पत्र सौंपे। नायक सूबेदार जंग बहादुर के नेतृत्व में गोरखाओं ने अपनी जमीन नहीं छोड़ी और भारत के सैन्य इतिहास में किंवदंती बन गए।
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अक्तूबर की शुरुआत में जब तापमान शून्य पर पहुंच गया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गोरखाओं के स्थान पर मेजर एसएस हसबनिस के नेतृत्व में 5 जाट अल्फा कंपनी को गलवां भेज दिया। चार अक्तूबर से एमआई-4 हेलिकॉप्टर उड़ान भरने लगे और अगले कुछ दिनों में यह प्रक्रिया पूरी हो गई। 20 अक्तूबर, 1962 को चीनी सेना ने गलवां पोस्ट पर गोलीबारी शुरू कर दी। इसमें 36 भारतीय जवान शहीद हो गए। मेजर हसबनिस को पकड़ लिया गया।
इसके बाद आधिकारिक तौर पर 1962 की लड़ाई शुरू हो गई थी। मेजर हसबनिस ने पीओडब्ल्यू में सात महीने बिताए और युद्ध खत्म होने के बाद ही वे वापस आ पाए। संयोग से, उनके बेटे लेफ्टिनेंट जनरल हसबनिस वर्तमान में उप सेना प्रमुख हैं। सेना के अधिकारी 1962 की हेडलाइन की ओर इशारा करके यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि वे चीनी सेना के पीछे हटने को लेकर सावधान क्यों हैं।
97 days after this banner headline, the 1962 war happened. pic.twitter.com/66vNl5HWWL
— Shiv Aroor (@ShivAroor) July 6, 2020
This happened in July 1962. pic.twitter.com/LKqrhADHi8
— Nirupama Menon Rao, निरुपमा राउ, بینظیر (@NMenonRao) July 6, 2020