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Missing From The House: लोकसभा में अब तक सिर्फ 18 मुस्लिम महिलाएं पहुंचीं, 13 वंशवाद की देन- किताब में दावा
Sun, 20 Jul 2025 03:43 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Sun, 20 Jul 2025 03:43 PM IST
सार
'Missing from the House - Muslim women in the Lok Sabha': इन महिला सांसदों में कोई रानी घराने से थीं, तो कोई एक्टर, कोई चाय बेचने वाले की पत्नी, और एक तो देश की पहली महिला राष्ट्रपति की पत्नी भी थीं। सभी की जिंदगी संघर्षों से भरी थी, लेकिन उन्होंने लोकसभा तक का सफर तय किया।
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लोकसभा (फाइल फोटो)
- फोटो : संसद टीवी वीडियो ग्रैब
विस्तार
भारत की संसद में महिलाओं की कम भागीदारी कोई नई बात नहीं है, लेकिन मुस्लिम महिलाओं की मौजूदगी इससे भी ज्यादा कम रही है। स्वतंत्रता के बाद से अब तक केवल 18 मुस्लिम महिलाएं ही लोकसभा पहुंच पाई हैं। इस दिलचस्प और चिंताजनक जानकारी को एक नई किताब 'सदन से गायब - लोकसभा में मुस्लिम महिलाएं' ('मिसिंग फ्रॉम द हाउस- मुस्लिम वीमेन इन द लोक सभा') में सामने लाया गया है। इस किताब को पत्रकार रशीद किदवई और राजनीतिक विश्लेषक अंबर कुमार घोष ने मिलकर लिखा है।
वंशवाद बना सहारा
किताब में बताया गया है कि इन 18 मुस्लिम महिला सांसदों में से 13 महिलाएं राजनीतिक परिवारों से थीं। यानी, चाहे वंशवाद लोकतंत्र के लिए बाधा हो, लेकिन मुस्लिम महिलाओं को राजनीति में आने का मौका इसी रास्ते से ज्यादा मिला।
लोकसभा में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति
अब तक कुल 18 लोकसभाएं बनी हैं, लेकिन 5 बार लोकसभा में एक भी मुस्लिम महिला नहीं थी। 543 सदस्यों वाली लोकसभा में कभी भी एक समय में 4 से ज्यादा मुस्लिम महिलाएं नहीं पहुंच पाईं। हैरानी की बात ये भी है कि दक्षिण भारत के पांच राज्यों, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से अब तक कोई मुस्लिम महिला लोकसभा में नहीं पहुंच सकी, जबकि इन राज्यों को राजनीति और शिक्षा के लिहाज से बेहतर माना जाता है।
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वंशवाद बना सहारा
किताब में बताया गया है कि इन 18 मुस्लिम महिला सांसदों में से 13 महिलाएं राजनीतिक परिवारों से थीं। यानी, चाहे वंशवाद लोकतंत्र के लिए बाधा हो, लेकिन मुस्लिम महिलाओं को राजनीति में आने का मौका इसी रास्ते से ज्यादा मिला।
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लोकसभा में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति
अब तक कुल 18 लोकसभाएं बनी हैं, लेकिन 5 बार लोकसभा में एक भी मुस्लिम महिला नहीं थी। 543 सदस्यों वाली लोकसभा में कभी भी एक समय में 4 से ज्यादा मुस्लिम महिलाएं नहीं पहुंच पाईं। हैरानी की बात ये भी है कि दक्षिण भारत के पांच राज्यों, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से अब तक कोई मुस्लिम महिला लोकसभा में नहीं पहुंच सकी, जबकि इन राज्यों को राजनीति और शिक्षा के लिहाज से बेहतर माना जाता है।
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18 मुस्लिम महिला सांसदों की सूची
- मोफिदा अहमद (1957, कांग्रेस), जोहराबेन चावड़ा (1962-67, कांग्रेस), मैमुना सुल्तान (1957-67, कांग्रेस)
- बेगम अकबर जहां अब्दुल्ला (1977-79, 1984-89, नेशनल कॉन्फ्रेंस), रशीदा हक (1977-79, कांग्रेस)
- मोसीना किदवई (1977-89, कांग्रेस), आबिदा अहमद (1981-89, कांग्रेस), नूर बानो (1996, 1999-2004, कांग्रेस)
- रुबाब सैयदा (2004-09, समाजवादी पार्टी), महबूबा मुफ्ती (2004-09, 2014-19, पीडीपी)
- तबस्सुम हसन (2009-14, सपा/लोजपा/बसपा), मौसम नूर (2009-19, तृणमूल कांग्रेस), कैसर जहां (2009-14, बसपा)
- ममताज संगमिता (2014-19, तृणमूल कांग्रेस), साजदा अहमद (2014-24, तृणमूल कांग्रेस), रानी नाराह (1998-2004, 2009-14, कांग्रेस)
- नुसरत जहां रूही (2019-24, तृणमूल कांग्रेस), इकरा हसन चौधरी (2024-वर्तमान, समाजवादी पार्टी)
ऐसे लोकसभा में पहुंचीं ये महिलाएं
इनमें से मोसीना किदवई एक बड़ी नेता बनीं और कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। जबकि कैसर जहां, जो एक चायवाले की पत्नी थीं, को 2009 में बसपा प्रमुख मायावती ने टिकट दिया और उन्होंने चुनाव जीता। आबिदा अहमद, देश के पांचवें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की पत्नी थीं, जो चुनाव जीतने वाली पहली और इकलौती प्रथम महिला बनीं। नूर बानो, रामपुर की रानी, ने 1996 और 1999 में चुनाव जीते, लेकिन जया प्रदा के साथ मुकाबले में हार गईं। बंगाली अभिनेत्री नुसरत जहां ने भी 2019 में तृणमूल कांग्रेस से चुनाव जीतकर कई परंपराएं तोड़ीं।
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वर्तमान में केवल एक मुस्लिम महिला सांसद
वर्तमान 18वीं लोकसभा में सिर्फ एक मुस्लिम महिला सांसद हैं- इकरा हसन चौधरी। वे समाजवादी पार्टी से चुनी गई हैं और उन्होंने भाजपा के एक वरिष्ठ नेता को हराकर सुर्खियां बटोरीं। वे लंदन से पढ़ी हुईं, युवा और प्रभावशाली नेता के रूप में उभर रही हैं।
कांग्रेस नेता शशि थरूर की टिप्पणी
किताब की भूमिका में कांग्रेस सांसद शशि थरूर लिखा हैं- 'आजादी के 78 साल बाद भी हम अपने लोकतंत्र पर गर्व तो करते हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि हमने महिलाओं, खासकर मुस्लिम महिलाओं को कभी बराबरी नहीं दी।' उन्होंने कहा कि मीडिया और समाज की चुप्पी ने इस सच्चाई को हमेशा छुपा कर रखा है।
इनमें से मोसीना किदवई एक बड़ी नेता बनीं और कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। जबकि कैसर जहां, जो एक चायवाले की पत्नी थीं, को 2009 में बसपा प्रमुख मायावती ने टिकट दिया और उन्होंने चुनाव जीता। आबिदा अहमद, देश के पांचवें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की पत्नी थीं, जो चुनाव जीतने वाली पहली और इकलौती प्रथम महिला बनीं। नूर बानो, रामपुर की रानी, ने 1996 और 1999 में चुनाव जीते, लेकिन जया प्रदा के साथ मुकाबले में हार गईं। बंगाली अभिनेत्री नुसरत जहां ने भी 2019 में तृणमूल कांग्रेस से चुनाव जीतकर कई परंपराएं तोड़ीं।
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वर्तमान में केवल एक मुस्लिम महिला सांसद
वर्तमान 18वीं लोकसभा में सिर्फ एक मुस्लिम महिला सांसद हैं- इकरा हसन चौधरी। वे समाजवादी पार्टी से चुनी गई हैं और उन्होंने भाजपा के एक वरिष्ठ नेता को हराकर सुर्खियां बटोरीं। वे लंदन से पढ़ी हुईं, युवा और प्रभावशाली नेता के रूप में उभर रही हैं।
कांग्रेस नेता शशि थरूर की टिप्पणी
किताब की भूमिका में कांग्रेस सांसद शशि थरूर लिखा हैं- 'आजादी के 78 साल बाद भी हम अपने लोकतंत्र पर गर्व तो करते हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि हमने महिलाओं, खासकर मुस्लिम महिलाओं को कभी बराबरी नहीं दी।' उन्होंने कहा कि मीडिया और समाज की चुप्पी ने इस सच्चाई को हमेशा छुपा कर रखा है।