B'day special: मौका मिलने पर भी जेल से नहीं भागे थे भगत सिंह, जानिए उनसे जुड़े 11 किस्से
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मैं चाहता हूं मेरी शहादत देश के काम आए और युवाओं में प्रेरणा और जोश भरने का काम करे, जिससे देश को जल्द से जल्द आजादी मिल सके।" वो युवक थे 24 साल के शहीदे आजम भगत सिंह। आज उनका जन्मदिन है, इस अवसर पर जानिए उनके जीवन से जुड़े कुछ ऐसे ही अनसुने किस्से जो शायद ही आपने पहले कहीं सुने हों।
पंजाब के लायलपुर में हुआ था भगत सिंह का जन्म
भगत सिंह का जन्म पंजाब के लायलपुर के बंगा गांव में हुआ था जो आज पाकिस्तान में है। कम लोग ही जानते हैं कि क्रांति की सीख भगत सिंह को परिवार से ही मिली थी उनके चाचा सरदार अजीत सिंह गदर पार्टी के सक्रिय सदस्य थे।
भगत सिंह 12 साल के ही थे, तभी एक घटना ने उनके बाल मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग में हुई सैकड़ों मौतों ने भगत को झकझोर कर रख दिया। कहा जाता है कि बाद में वो अपने परिवार के साथ वहां पहुंचे और जलियांवाला बाग की लहूलुहान मिट्टी को एक बोतल में भरकर घर ले आए।
भगत सिंह लाहौर के नेशनल कालेज में पढ़ते थे और वहां नाटकों और प्ले में खूब बढ़चढ़कर भाग लेते थे। महाराणा प्रताप और सम्राट चंद्रगुप्त पर बने कई प्ले में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई।
भगत बड़े हुए तो दिल में क्रांति के बीज पलने लगे, लेकिन घरवाले इससे अंजान थे। उनकी मां विद्यावती देवी उनकी शादी के लिए लड़की तलाशने लगी। जैसे ही इसकी खबर भगत को लगी तो वह घर से फरार हो गए और कलकत्ता पहुंच गए। यहां से घरवालों को खत लिखा कि उनकी दुल्हन सिर्फ मौत बन सकती है।
सैंडर्स को गोली मारने से पहले देखी थी फिल्म
उन्हें लिखने का बहुत शौक था, जेल में रहने के दौरान उन्होंने कई कविताएं लिखीं। इस दौरान उन्होंने लेनिन और मार्क्स को भी खूब पढ़ा। इसके बाद उन्होंने जेल में ही एक पुस्तक लिखी "मैं नास्तिक क्यों हूं"।
भगत सिंह को फिल्में देखने का भी शौक था। बताया जाता है लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए अंग्रेज अफसर जॉन सैंडर्स को मारने से पहले भी उन्होंने अंग्रेजी फिल्म अंकल टॉम्स केबिन देखी थी जो गुलामी के दिनों पर आधारित एक नॉवल पर बनी थी।
भगत सिंह को नेशनल असेंबली में बम फेंकने के मामले में मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। खास बात ये थी कि जो बम असेंबली में फेंका गया था वो सिर्फ सबका ध्यान खींचने के लिए था किसी की जान लेने के लिए नहीं। बाद में ब्रिटिश सरकार ने भी इस बात को माना।
1930 में जेल जाने के दौरान भगत सिंह ने जेल में ही सत्याग्रह शुरू कर दिया। उन्होंने कैदियों के अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन किया। जिसमें उन्हें मूलभूत सुविधाएं देने की मांग की गई।
वायसराय ने कम कर दी थी भगत सिंह की सजा
भगत सिंह के दोस्त रहे जितेन्द्र नाथ सान्याल ने उनके बारे में अपनी पुस्तक में लिखा था कि वायसराय लार्ड इर्विन ने भगत सिंह की फांसी की सजा को कम करके काला पानी में तब्दील कर दिया था। उन्होंने इसके आदेश भी जारी कर दिए थे।
इससे पहले कि ये आदेश प्रशासन तक पहुंच पाते और इन पर अमल हो पाता पोस्टमास्टर जनरल ने जानबूझकर ये आदेश तब तक रोके रखे जब तक भगत सिंह को फांसी नहीं दे दी गई।
भगत सिंह की फांसी की सजा के खिलाफ देशभर में एक मुहिम शुरू हो गई थी। लगातार अंग्रेज सरकार पर भी दबाव बन रहा था और महात्मा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पर भी। इसी दबाव के बीच अंग्रेज सरकार ने मानवाधिकारों को ताक पर रखते हुए भगत सिंह को निर्धारित तिथि से पहले ही फांसी देने का फैसला कर लिया और 23 मार्च की सुबह 7 बजे के करीब उन्हें फांसी पर लटका दिया गया।