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पटियाला में देखा था 84 का दंगा, यह उपद्रव उससे भी बुरा
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
Updated Mon, 07 Mar 2016 01:47 AM IST
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जाट आरक्षण
- फोटो : भव्य नरेश
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उपद्रव की आग में जब पूरा शहर जल रहा था, भाईचारे का कत्ल हो रहा था। उस समय जनता कॉलोनी में 36 बिरादरी के करीब 50 हजार लोग भाईचारे की मिसाल पेश कर रहे थे।
यहां उपद्रवी भाईचारे को बिगाड़ने की मंशा से दो बार आए लेकिन लोगों ने उन्हें लौटा दिया। उस मुश्किल घड़ी में तो लोगों ने एक-दूसरे की जान बचा ली लेकिन आज भी दिल में दहशत है। सरकार और प्रशासन को कोसते हुए वे कहते हैं कि पूरे प्रदेश में भाईचारे का कत्ल किया गया है। इससे न केवल देश, बल्कि विश्व में भी हरियाणा की छवि धूमिल हुई।
दंगों के दौरान यहां न बेटी की धूमधाम से शादी हो सकी और न ही कोई अपने रोजगार पर जा सका। उपद्रवियों ने शहर को 50 साल पीछे ले जाकर छोड़ दिया। जिस शहर की खूबसूरती पर हम गर्व करते थे, आज उसी को देखकर रोना आता है।
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देवी चौक की तरफ से करीब 100 उपद्रवी कॉलोनी में घुसने लगे। कालोनी के लोगों ने उन्हें भाईचारे का वास्ता देते हुए लौटा दिया। मैंने बचपन में 1984 के समय पटियाला में जो दंगा देखा था, उससे कहीं बुरा हाल अपने शहर में देखा। आज लुटे शहर को देखकर आंसू रोक नहीं पाते हैं। - उमा गोयल।
आरक्षण को राज्य सरकार ने देना था, आम जनता को किसलिए परेशान किया गया? छह दिन तो हमारी कॉलोनी के लोग अपने घरों में ही कैद रहे। पूरी कॉलोनी के लोगों की सुरक्षा का जिम्मा युवाओं को दिया गया। जिन्होंने ठीकरी पहरा देकर लोगों की रक्षा की।
- लक्ष्मी नारायण गोयल।
22 फरवरी को मुझे बेटी से मिलने के लिए पुणे जाना था। दिल्ली में ट्रेन पकड़नी थी लेकिन दंगे की वजह से यातायात ही ठप हो गया। रेलवे स्टेशन पर गया तो वहां खड़े पुलिस कर्मियों ने कहा कि उपद्रवी कभी भी इसे जलाने के लिए आ सकते हैं, इसलिए वापस चले जाओ।
- कैलाश चंद गुप्ता।
हिंसा के दौरान सरकार और प्रशासन पूरी तरह से विफल नजर आया। प्रदेश में कई सरकारें आईं, लेकिन भाजपा सबसे कमजोर दिखाई दी। कर्फ्यू लगने के बाद भी लोगों को मारा जा रहा था, उनकी रोजी-रोटी जलाई जा रही थी। मैंने अपने 60 साल के जीवन में ऐसा मंजर कभी नहीं देखा। - डॉ. आरपी सिंगल।
मेरे दोनों बेटे बाहर नौकरी करते हैं। वे दंगे की वजह से पूरे छह दिन तक अपने काम पर न जा सके। अभी भी दहशत है, क्योंकि स्कूलों की छुट्टी के समय बाइकों पर तीन से चार युवक बैठकर गलियों में से जाते हैं और हूटिंग करते हैं। इस समय तो पुलिसकर्मी तैनात होने ही चाहिए।
- सत्य नारायण सिंह।
शहर में सबसे ज्यादा जानमाल की हानि हुई। चुन-चुन कर लोगाें के रोजगार और घरों को खत्म किया गया है। जो लोग यह काम कर रहे थे, उन्हें अभी भी जनता के सामने नहीं लाया गया है। हमारी बिरादरी के एक व्यापारी को बेवजह फंसाया गया है। पुलिस भी पक्षपात कर रही है।
- सुनीता गुप्ता।
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यहां उपद्रवी भाईचारे को बिगाड़ने की मंशा से दो बार आए लेकिन लोगों ने उन्हें लौटा दिया। उस मुश्किल घड़ी में तो लोगों ने एक-दूसरे की जान बचा ली लेकिन आज भी दिल में दहशत है। सरकार और प्रशासन को कोसते हुए वे कहते हैं कि पूरे प्रदेश में भाईचारे का कत्ल किया गया है। इससे न केवल देश, बल्कि विश्व में भी हरियाणा की छवि धूमिल हुई।
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दंगों के दौरान यहां न बेटी की धूमधाम से शादी हो सकी और न ही कोई अपने रोजगार पर जा सका। उपद्रवियों ने शहर को 50 साल पीछे ले जाकर छोड़ दिया। जिस शहर की खूबसूरती पर हम गर्व करते थे, आज उसी को देखकर रोना आता है।
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देवी चौक की तरफ से करीब 100 उपद्रवी कॉलोनी में घुसने लगे। कालोनी के लोगों ने उन्हें भाईचारे का वास्ता देते हुए लौटा दिया। मैंने बचपन में 1984 के समय पटियाला में जो दंगा देखा था, उससे कहीं बुरा हाल अपने शहर में देखा। आज लुटे शहर को देखकर आंसू रोक नहीं पाते हैं। - उमा गोयल।
आरक्षण को राज्य सरकार ने देना था, आम जनता को किसलिए परेशान किया गया? छह दिन तो हमारी कॉलोनी के लोग अपने घरों में ही कैद रहे। पूरी कॉलोनी के लोगों की सुरक्षा का जिम्मा युवाओं को दिया गया। जिन्होंने ठीकरी पहरा देकर लोगों की रक्षा की।
- लक्ष्मी नारायण गोयल।
22 फरवरी को मुझे बेटी से मिलने के लिए पुणे जाना था। दिल्ली में ट्रेन पकड़नी थी लेकिन दंगे की वजह से यातायात ही ठप हो गया। रेलवे स्टेशन पर गया तो वहां खड़े पुलिस कर्मियों ने कहा कि उपद्रवी कभी भी इसे जलाने के लिए आ सकते हैं, इसलिए वापस चले जाओ।
- कैलाश चंद गुप्ता।
हिंसा के दौरान सरकार और प्रशासन पूरी तरह से विफल नजर आया। प्रदेश में कई सरकारें आईं, लेकिन भाजपा सबसे कमजोर दिखाई दी। कर्फ्यू लगने के बाद भी लोगों को मारा जा रहा था, उनकी रोजी-रोटी जलाई जा रही थी। मैंने अपने 60 साल के जीवन में ऐसा मंजर कभी नहीं देखा। - डॉ. आरपी सिंगल।
मेरे दोनों बेटे बाहर नौकरी करते हैं। वे दंगे की वजह से पूरे छह दिन तक अपने काम पर न जा सके। अभी भी दहशत है, क्योंकि स्कूलों की छुट्टी के समय बाइकों पर तीन से चार युवक बैठकर गलियों में से जाते हैं और हूटिंग करते हैं। इस समय तो पुलिसकर्मी तैनात होने ही चाहिए।
- सत्य नारायण सिंह।
शहर में सबसे ज्यादा जानमाल की हानि हुई। चुन-चुन कर लोगाें के रोजगार और घरों को खत्म किया गया है। जो लोग यह काम कर रहे थे, उन्हें अभी भी जनता के सामने नहीं लाया गया है। हमारी बिरादरी के एक व्यापारी को बेवजह फंसाया गया है। पुलिस भी पक्षपात कर रही है।
- सुनीता गुप्ता।