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अंबकेश्वर में स्थापित हैं स्वयंभू शिवलिंग
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08-कैथल। प्रताप गेट स्थित अंबकेश्वर मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग
- फोटो : Kaithal
कैथल। प्रताप गेट स्थित प्राचीन अंबकेश्वर मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग का इतिहास महाभारत काल के समय से भी पुराना है। इसका निर्माण करीब तीन हजार वर्ष पहले हुआ था। ऐसी मान्यता है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग हजारों वर्ष पहले पाताल से प्रकट हुआ था।
प्राचीन समय में आसपास के श्रद्धालु केवल शिवलिंग की पूजा करते थे, लेकिन मुगलकाल के समय इस स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया गया। तब से लेकर अब तक मंदिर में लगातार पूजा की जा रही है। देश के विभिन्न हिस्सों से आकर श्रद्धालु मंदिर में भगवान शिव व काली माता की पूजा करते हैं। सावन के महीने में यहां पर मेले का माहौल रहता है।
मंदिर के महंत प्रेमानंद पुरी ने बताया कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू प्रकट है। औरंगजेब और अकबर के काल में कुछ लोगों ने मंदिर में स्थापित शिवलिंग को यहां से हटाने का प्रयास किया था। पहले हाथियों को लगाकर इसे हटाने का प्रयास किया। इसके बाद जब कोई चारा नहीं बचा तो वहां पहुंचे लोगों में से एक व्यक्ति ने शिवलिंग पर तेजधार हथियार से प्रहार कर दिया। हथियार का प्रहार होते ही शिवलिंग से रक्तधारा बहने लगी। यह देखकर इसे तोड़ने के लिए आए लोग भाग गए।
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मंदिर में शीशे के टुकड़ों से बनाई गई हैं कलाकृतियां
महंत के मुताबिक मंदिर में शीशे के टुकड़ों को जोड़ कर विशेष प्रकार की कलाकृतियां बनाई गई हैं। देवी-देवताओं की मूर्तियां भी रंगीन शीशे के टुकड़ों से बनी हैं। मंदिर में शनिवार के दिन माता काली की भी पूजा-अर्चना होती है। महंत ने बताया कि सावन में श्रद्धालुओं की भी भारी भीड़ उमड़ती है। वे पिछले करीब 22 वर्षों से मंदिर की देखरेख कर रहे हैं।
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प्राचीन समय में आसपास के श्रद्धालु केवल शिवलिंग की पूजा करते थे, लेकिन मुगलकाल के समय इस स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया गया। तब से लेकर अब तक मंदिर में लगातार पूजा की जा रही है। देश के विभिन्न हिस्सों से आकर श्रद्धालु मंदिर में भगवान शिव व काली माता की पूजा करते हैं। सावन के महीने में यहां पर मेले का माहौल रहता है।
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मंदिर के महंत प्रेमानंद पुरी ने बताया कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू प्रकट है। औरंगजेब और अकबर के काल में कुछ लोगों ने मंदिर में स्थापित शिवलिंग को यहां से हटाने का प्रयास किया था। पहले हाथियों को लगाकर इसे हटाने का प्रयास किया। इसके बाद जब कोई चारा नहीं बचा तो वहां पहुंचे लोगों में से एक व्यक्ति ने शिवलिंग पर तेजधार हथियार से प्रहार कर दिया। हथियार का प्रहार होते ही शिवलिंग से रक्तधारा बहने लगी। यह देखकर इसे तोड़ने के लिए आए लोग भाग गए।
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मंदिर में शीशे के टुकड़ों से बनाई गई हैं कलाकृतियां
महंत के मुताबिक मंदिर में शीशे के टुकड़ों को जोड़ कर विशेष प्रकार की कलाकृतियां बनाई गई हैं। देवी-देवताओं की मूर्तियां भी रंगीन शीशे के टुकड़ों से बनी हैं। मंदिर में शनिवार के दिन माता काली की भी पूजा-अर्चना होती है। महंत ने बताया कि सावन में श्रद्धालुओं की भी भारी भीड़ उमड़ती है। वे पिछले करीब 22 वर्षों से मंदिर की देखरेख कर रहे हैं।