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Kaithal News: मिट्टी से सज रहीं सांझी माता
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कलायत में दीवार पर तैयार की गई सांझी। संवाद
- फोटो : Samvad
संवाद न्यूज एजेंसी
कलायत। आधुनिकता के दौर में जहां त्योहारों को मनाने के तरीके बदल रहे हैं, वहीं कलायत में नवरात्र के दौरान सांझी माता बनाने और उनकी पूजा करने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम है। महिलाएं मिट्टी, गोबर, कपास और रंगों से सांझी माता की आकर्षक कलाकृतियां तैयार कर भारतीय संस्कृति और पारंपरिक लोककला को जीवंत रख रही हैं। घरों की दीवारों पर सजी सांझी माता की आकृतियां नवरात्र में धार्मिक आस्था के साथ महिलाओं के हुनर की झलक भी पेश कर रही हैं।
महिलाएं सांझी माता की मूर्तियां कई सप्ताह पहले से बनानी शुरू कर देती हैं। पहले मिट्टी से माता की मूर्ति और छोटी-छोटी आकृतियां तैयार की जाती हैं। इनके सूखने के बाद विभिन्न रंगों से चित्रकारी की जाती है। हालांकि, समय की कमी के चलते अब बाजार में बनी-बनाई सांझी माता की मूर्तियां और कैलेंडर भी उपलब्ध हैं, लेकिन पारंपरिक तरीके से तैयार सांझी का अलग महत्व है।
सांझी तैयार करने वाली स्वाति और प्रीति ने बताया कि संस्कृति के संरक्षण के लिए परंपराओं को उनके मूल स्वरूप में जीवित रखना जरूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने पारंपरिक सामग्री से सांझी माता की कलाकृति बनाई है। वहीं, बुजुर्ग महिलाओं प्रेमलता, कमलेश और सत्या देवी ने बताया कि नवरात्र के पहले दिन सांझी माता की पूजा कर उनके चरणों में जौ बोए जाते हैं। इसके बाद प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा-अर्चना की जाती है और महिलाएं माता के गीत गाकर मन्नतें मांगती हैं।
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कलायत। आधुनिकता के दौर में जहां त्योहारों को मनाने के तरीके बदल रहे हैं, वहीं कलायत में नवरात्र के दौरान सांझी माता बनाने और उनकी पूजा करने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम है। महिलाएं मिट्टी, गोबर, कपास और रंगों से सांझी माता की आकर्षक कलाकृतियां तैयार कर भारतीय संस्कृति और पारंपरिक लोककला को जीवंत रख रही हैं। घरों की दीवारों पर सजी सांझी माता की आकृतियां नवरात्र में धार्मिक आस्था के साथ महिलाओं के हुनर की झलक भी पेश कर रही हैं।
महिलाएं सांझी माता की मूर्तियां कई सप्ताह पहले से बनानी शुरू कर देती हैं। पहले मिट्टी से माता की मूर्ति और छोटी-छोटी आकृतियां तैयार की जाती हैं। इनके सूखने के बाद विभिन्न रंगों से चित्रकारी की जाती है। हालांकि, समय की कमी के चलते अब बाजार में बनी-बनाई सांझी माता की मूर्तियां और कैलेंडर भी उपलब्ध हैं, लेकिन पारंपरिक तरीके से तैयार सांझी का अलग महत्व है।
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सांझी तैयार करने वाली स्वाति और प्रीति ने बताया कि संस्कृति के संरक्षण के लिए परंपराओं को उनके मूल स्वरूप में जीवित रखना जरूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने पारंपरिक सामग्री से सांझी माता की कलाकृति बनाई है। वहीं, बुजुर्ग महिलाओं प्रेमलता, कमलेश और सत्या देवी ने बताया कि नवरात्र के पहले दिन सांझी माता की पूजा कर उनके चरणों में जौ बोए जाते हैं। इसके बाद प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा-अर्चना की जाती है और महिलाएं माता के गीत गाकर मन्नतें मांगती हैं।
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