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Kaithal News: आंगनबाड़ी, आशा वर्करों ने किया प्रदर्शन
Mon, 05 Oct 2026 02:59 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Mon, 05 Oct 2026 02:59 AM IST
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आंगनबाड़ी वर्करों को संबोधित करते हुए कर्मचारी नेता शंकुतला। संवाद
कैथल। मांगों के लिए आंगनबाड़ी वर्कर एवं हेल्पर यूनियन, आशा वर्करों और मिड-डे मील वर्करों ने रविवार को हनुमान वाटिका में प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्होंने सांसद नवीन जिंदल के नाम अके प्रतिनिधि को मांगों का ज्ञापन सौंपा। इससे पहले बड़ी संख्या में वर्कर हनुमान वाटिका में एकत्रित हुईं और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।
यूनियन की महासचिव शकुंतला, रानी, सुषमा, सुनीता, आशा और प्रवीन कुमारी ने कहा कि समेकित बाल विकास परियोजना की शुरुआत 2 अक्तूबर 1975 को हुई थी। इस परियोजना को शुरू हुए 51 वर्ष हो चुके हैं और देशभर में करीब 26 लाख आंगनबाड़ी वर्कर एवं हेल्पर इससे जुड़ी हैं। इसी प्रकार मिड-डे मील योजना वर्ष 1998 में शुरू हुई थी।
इसके तहत करीब 25 लाख मिड-डे मील वर्कर काम कर रही हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत वर्ष 2006 में हुई थी और इसके तहत करीब 10 लाख आशा वर्कर कार्यरत हैं। वर्करों ने कहा कि बच्चों और महिलाओं के पोषण, स्वास्थ्य और देखभाल से जुड़ी इन योजनाओं की समाज में महत्वपूर्ण भूमिका है।
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इसके बावजूद इन परियोजनाओं के लिए पर्याप्त बजट आवंटित नहीं किया जा रहा है। इन योजनाओं को स्थायी विभागों में तब्दील करने की दिशा में भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
उन्होंने कहा कि इन योजनाओं में लंबे समय से काम करने वाली महिलाओं को अभी तक मजदूर या कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला है। उन्हें स्वयंसेविका या कार्यकर्ता के रूप में ही माना जाता है।
उन्होंने मांग की कि सभी आंगनबाड़ी वर्कर एवं हेल्पर, आशा वर्कर, मिड-डे मील वर्कर, क्रेच वर्कर एवं हेल्पर सहित सभी स्कीम वर्करों को स्थायी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए। सभी वर्करों के लिए 42 हजार रुपये न्यूनतम मासिक वेतन निर्धारित किया जाए। इसके साथ ही ग्रेच्युटी और सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएं तथा स्कीम वर्करों के लिए 21 हजार रुपये मासिक पेंशन निर्धारित की जाए। वर्करों ने मिड-डे मील वर्करों की छंटनी पर रोक लगाने और पहले से छंटनी की जा चुकी वर्करों को बहाल करने की मांग भी उठाई।
उन्होंने कहा कि संबंधित योजनाओं को मजबूत करने के लिए पर्याप्त बजट आवंटित किया जाना चाहिए, ताकि इनका लाभ बच्चों, महिलाओं और आम लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचता रहे। प्रदर्शन के दौरान वर्करों ने सरकार से मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की। संवाद
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यूनियन की महासचिव शकुंतला, रानी, सुषमा, सुनीता, आशा और प्रवीन कुमारी ने कहा कि समेकित बाल विकास परियोजना की शुरुआत 2 अक्तूबर 1975 को हुई थी। इस परियोजना को शुरू हुए 51 वर्ष हो चुके हैं और देशभर में करीब 26 लाख आंगनबाड़ी वर्कर एवं हेल्पर इससे जुड़ी हैं। इसी प्रकार मिड-डे मील योजना वर्ष 1998 में शुरू हुई थी।
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इसके तहत करीब 25 लाख मिड-डे मील वर्कर काम कर रही हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत वर्ष 2006 में हुई थी और इसके तहत करीब 10 लाख आशा वर्कर कार्यरत हैं। वर्करों ने कहा कि बच्चों और महिलाओं के पोषण, स्वास्थ्य और देखभाल से जुड़ी इन योजनाओं की समाज में महत्वपूर्ण भूमिका है।
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इसके बावजूद इन परियोजनाओं के लिए पर्याप्त बजट आवंटित नहीं किया जा रहा है। इन योजनाओं को स्थायी विभागों में तब्दील करने की दिशा में भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
उन्होंने कहा कि इन योजनाओं में लंबे समय से काम करने वाली महिलाओं को अभी तक मजदूर या कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला है। उन्हें स्वयंसेविका या कार्यकर्ता के रूप में ही माना जाता है।
उन्होंने मांग की कि सभी आंगनबाड़ी वर्कर एवं हेल्पर, आशा वर्कर, मिड-डे मील वर्कर, क्रेच वर्कर एवं हेल्पर सहित सभी स्कीम वर्करों को स्थायी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए। सभी वर्करों के लिए 42 हजार रुपये न्यूनतम मासिक वेतन निर्धारित किया जाए। इसके साथ ही ग्रेच्युटी और सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएं तथा स्कीम वर्करों के लिए 21 हजार रुपये मासिक पेंशन निर्धारित की जाए। वर्करों ने मिड-डे मील वर्करों की छंटनी पर रोक लगाने और पहले से छंटनी की जा चुकी वर्करों को बहाल करने की मांग भी उठाई।
उन्होंने कहा कि संबंधित योजनाओं को मजबूत करने के लिए पर्याप्त बजट आवंटित किया जाना चाहिए, ताकि इनका लाभ बच्चों, महिलाओं और आम लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचता रहे। प्रदर्शन के दौरान वर्करों ने सरकार से मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की। संवाद