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विचार: मंदिर मॉडल और आस्था का अर्थशास्त्र
Thu, 22 Oct 2026 09:42 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 22 Oct 2026 09:42 AM IST
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अयोध्या में दीपोत्सव पर सीएम योगी आदित्यनाथ।
- फोटो : amar ujala
आम तौर पर मनुष्य को हिसाब लगाने वाला प्राणी माना जाता रहा है, जो लाभ और हानि के तराजू पर अपना हर निर्णय तौलता है। परन्तु, भारतीय समाज ने सदियों से इस धारणा को चुपचाप झुठलाया है। यहां मंदिर के आंगन में बाजार पनपे, मेलों-तीर्थों की छाया में व्यापार परवान चढ़ा और नदियों के किनारे धर्म के साथ अर्थव्यवस्था भी फली-फूली। काशी का घाट, मथुरा की कुंज गली और अयोध्या का सरयू तट केवल पूजा स्थल नहीं थे, वे अपने समय के आर्थिक केंद्र भी थे। उत्तर प्रदेश आज उसी भूली हुई परंपरा को नई भाषा में दोहरा रहा है। इसके पीछे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यह सोच है कि श्रद्धा कोई आर्थिक बोझ नहीं, बल्कि एक पूंजी है और उसे पहचान कर संवारा जाए तो वह रोजगार, निवेश और आत्मविश्वास का स्रोत बन सकती है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2021 से अब तक यूपी में 950 से अधिक मंदिरों और तीर्थस्थलों का जीर्णोद्धार, विस्तार या पुनर्निर्माण हुआ है। 650 से ज्यादा परियोजनाएं 2025 तक पूरी हो चुकी हैं और करीब 300 अग्रिम चरण में हैं। घरेलू पर्यटकों की संख्या 2017 में 23 करोड़ थी, जो 2025 के अंत तक 156 करोड़ हो गई है तो यह अनायास नहीं है।
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सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2021 से अब तक यूपी में 950 से अधिक मंदिरों और तीर्थस्थलों का जीर्णोद्धार, विस्तार या पुनर्निर्माण हुआ है। 650 से ज्यादा परियोजनाएं 2025 तक पूरी हो चुकी हैं और करीब 300 अग्रिम चरण में हैं। घरेलू पर्यटकों की संख्या 2017 में 23 करोड़ थी, जो 2025 के अंत तक 156 करोड़ हो गई है तो यह अनायास नहीं है।
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अब प्रश्न यह कि धार्मिक पर्यटन की इस अवधारणा का वैचारिक केंद्र क्या है? विकास का आयातित मॉडल प्रायः यह मानकर चलता है कि आधुनिकता का अर्थ परंपरा से दूरी है। कारखाने और कॉरिडोर, शहर और तीर्थ, अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं। उत्तर प्रदेश का प्रयोग इस द्वैत को नकारता है। वह कहता है कि जिस समाज की सबसे गहरी पूंजी उसकी आस्था है, वहां विकास की योजना उस पूंजी को छोड़कर नहीं बन सकती। इस दृष्टि से गांव का मंदिर सामूहिक स्मृति का वह केंद्र है जहां लोग मिलते हैं, त्योहार मनाते हैं और अपनी साझा पहचान महसूस करते हैं। ग्रामीण और अर्ध-शहरी उत्तर प्रदेश में मंदिर सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र हैं और उन्हें मजबूत करने से लोगों से जुड़ाव गहरा होता है। अर्थशास्त्री इसे सामाजिक पूंजी कहते हैं।
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गांव के मंदिर में चालीस लाख से डेढ़ करोड़ रुपये के खर्च से बनी चहारदीवारी, पेयजल, शौचालय और सोलर लाइट का मतलब है कि सार्वजनिक सुविधा श्रद्धा के बहाने गांव की दहलीज तक पहुंची। इस संरचना के आधार में जिला स्तरीय धर्मशालाओं, कुंडों व पार्किंग स्थलों का निर्माण या पुनरुद्धार है तो इसके शीर्ष पर काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या और विंध्यवासिनी कॉरिडोर आदि स्थानों पर हजारों-लाखों करोड़ का निवेश है। इसमें आस्था केवल भावना नहीं, बल्कि निर्माण, परिवहन, आतिथ्य और हस्तशिल्प की पूरी मूल्य-श्रृंखला का आधार बन जाती है। नाविक, फूल बेचने वाला, गाइड, प्रसाद बनाने वाला कारीगर, ये सब उस अर्थव्यवस्था के भागीदार हैं जो श्रद्धा की गति से चलती है।
आईआईएम लखनऊ की विस्तृत केस स्टडी के अनुसार अयोध्या में पर्यटन, निवेश, रोजगार और राजस्व में व्यापक वृद्धि देखी गई। प्रतिदिन औसतन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन से आतिथ्य उद्योग को नई गति मिली, 150 से अधिक नए होटल और होमस्टे स्थापित हुए तथा ऑनलाइन ट्रैवल बुकिंग चार गुना तक बढ़ी। हस्तशिल्प, स्मृति-चिह्न और मूर्तियों की मांग से कारीगरों को सीधा लाभ मिला। लगभग 6,000 एमएसएमई खुले और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों की दैनिक आय 2,500 रुपये तक पहुंची। पर्यटन से कर राजस्व 20,000-25,000 करोड़ तक पहुंचने और अगले 4-5 वर्षों में लगभग 1.2 लाख रोजगार सृजित होने का अनुमान है।
आईआईएम लखनऊ की विस्तृत केस स्टडी के अनुसार अयोध्या में पर्यटन, निवेश, रोजगार और राजस्व में व्यापक वृद्धि देखी गई। प्रतिदिन औसतन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन से आतिथ्य उद्योग को नई गति मिली, 150 से अधिक नए होटल और होमस्टे स्थापित हुए तथा ऑनलाइन ट्रैवल बुकिंग चार गुना तक बढ़ी। हस्तशिल्प, स्मृति-चिह्न और मूर्तियों की मांग से कारीगरों को सीधा लाभ मिला। लगभग 6,000 एमएसएमई खुले और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों की दैनिक आय 2,500 रुपये तक पहुंची। पर्यटन से कर राजस्व 20,000-25,000 करोड़ तक पहुंचने और अगले 4-5 वर्षों में लगभग 1.2 लाख रोजगार सृजित होने का अनुमान है।
अब आस्था से जुड़ी अर्थव्यवस्था का एक और पहलू देखें। 156 करोड़ पर्यटकों की संख्या में बार-बार आने वाले और एक दिवसीय यात्री भी शामिल हैं, इसलिए असली प्रश्न प्रति यात्री खर्च, ठहराव की अवधि और स्थानीय आय का है। पर्यटन के रोजगार प्रायः मौसमी और अनौपचारिक होते हैं। आस्था की अर्थव्यवस्था तभी टिकाऊ होती है, जब वह सम्मानजनक आय और कौशल भी दे। मंदिरों को अलग-थलग परियोजनाओं की जगह तीर्थ-परिपथों में पिरोया जाए, ताकि श्रद्धालु एक की जगह कई दिन ठहरे। होमस्टे, स्थानीय हस्तशिल्प और क्षेत्रीय व्यंजनों को और बढ़ावा मिले ताकि रोजगार और अधिक स्थानीय हाथों तक पहुंचे। यूपी सरकार इस दिशा में काम कर रही है।
पूर्वांचल में काशी और विंध्याचल, अवध में अयोध्या और नैमिषारण्य, पश्चिम में शाकंभरी देवी और औघड़नाथ, बुंदेलखंड में कालिंजर और चित्रकूट, ब्रज में मथुरा और गोवर्धन परिक्रमा। इन तमाम स्थानों पर विकसित की गई आधुनिक सुविधाओं ने आमजन में सरकार की सकारात्मक छवि सुदृढ़ की है।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक प्रो. अनूप मिश्रा अर्थशास्त्री और डीएवी पीजी कॉलेज वाराणसी में कार्यरत हैं।)
पूर्वांचल में काशी और विंध्याचल, अवध में अयोध्या और नैमिषारण्य, पश्चिम में शाकंभरी देवी और औघड़नाथ, बुंदेलखंड में कालिंजर और चित्रकूट, ब्रज में मथुरा और गोवर्धन परिक्रमा। इन तमाम स्थानों पर विकसित की गई आधुनिक सुविधाओं ने आमजन में सरकार की सकारात्मक छवि सुदृढ़ की है।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक प्रो. अनूप मिश्रा अर्थशास्त्री और डीएवी पीजी कॉलेज वाराणसी में कार्यरत हैं।)