भारतीय धारावाहिकों से कितने अलग हैं पाकिस्तानी धारावाहिक?
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भारतीय सिनेमा की तरह भारतीय धावाहिकों की पहुंच भी लोगों तक अच्छी खासी है। मनोरंजन के नाम पर वे हर दिन फिल्म तो नहीं देख सकते लेकिन कोई न कोई सीरियल जरूर देख सकते हैं।
घर में ज्यादातर अकेले वक्त बिताने वाली महिलाओं से लेकर कॉलेज से थक कर आईं लड़कियों तक के लिए टीवी पर सास-बहू या प्यार-मोहब्ब्त के सीरियल देखने के सिवा कोई विकल्प नहीं होता।
अफसोस कि भारतीय सीरियलों की कहानी असल जिंदगी और सच्चाई से बहुत परे होती है। खासकर पाकिस्तानी धारावाहिकों के मुकाबले। दोनों की तुलना की जाए तो काफी अंतर दिखता है।
असल जिंदगी में कभी कोई चुड़ैल, इच्छाधारी नागिन या डायन आपको मिलती है क्या? या मरने के बाद भी कोई इंसान सालों बाद जिंदा हो कर उठता है?
असल जिंदगी में तो नहीं, लेकिन भारतीय धारावाहिकों में ऐसा जरूर होता है। कभी प्लास्टिक सर्जरी के नाम पर तो कभी याद्दाश्त भूलने के नाम पर, मर चुके किरदारों को वापस लाया जाता है। वहीं इस मामले में पाकिस्तानी धारावाहिक असलियत से वास्ता रखते हैं।
'जिंदगी' चैनल पर आने वाले किसी भी पाकिस्तानी सीरियल में आप नहीं देखेंगे कि कोई मरने के बाद भी अपनी मौत का बदला लेने फिर से जिंदा हो उठा या सीरियल की खलनायिका हीरोइन के परिवार से बदला लेने के लिए डायन का रूप धर कर आई। उनकी कहानियां इंसानों और असलियत पर आधारित होती हैं।
कम एपिसोड में पूरी कहानी
भारतीय धारावाहिक रबड़ की तरह खींचे जाते हैं जबकि पाकिस्तानी सीरियल 20-15 एपिसोड में खत्म हो जाते हैं, उतने में ही वे 10-15 सालों की कहानी दिखा देते हैं जैसे कि 'दास्तान', 'फिराक', 'शक'। खास बात ये है कि पाकिस्तानी सीरियल जो आज कर रहे हैं, वो हम पहले कर चुके हैं लेकिन अब ये सब कहीं गायब हो चुका है।
जैसे कि एक वक्त था जब 1988 में दूरदर्शन पर 'प्रेमचंद', 'मिरजा गालिब' जैसे धारावाहिक आते थे। महान लेखक गुलजार ने 13 एपिसोड के ये धारावाहिक बनाए थे और बखूबी उनकी कहानियों को दर्शाया था। दर्शकों को कम वक्त के ये धारावाहिक भी पसंद आए और सितारों की एक्टिंग भी।
फिर एक वक्त आया जब 'हम लोग' और 'बुनियाद' जैसे सीरियलों ने 13 एपिसोड से ज्यादा का प्रसारण किया लेकिन इनकी कहानी दमदार रही। फिर समय आया 'रामायण', 'महाभारत' जैसे पौराणिक धारावाहिकों का। इनमें एपिसोड भले ही ज्यादा होते थे लेकिन पहली बार दर्शकों को कुछ नया परोसा गया था इसलिए उनकी दिलचस्पी बनी रही।
अब जो वक्त चल रहा है वहां इस बात की होड़ लगी रहती है कि कौन सा सीरियल ज्यादा लंबा चलता है। यहां 1000 एपिसोड तक सीरियल चलते हैं। पाकिस्तान में उपन्यासों पर आधारित सीरियल भी बनते हैं जैसे कि 'जिंदगी गुलजार है', 'हमसफर'।
यहां प्रचलन है 2 मिनट की बात को 20 मिनट तक खींचने का जबकि पाकिस्तानी सीरियलों में जबरन कहानी को नहीं खींचा जाता। सिर्फ एपिसोड की संख्या ही नहीं, सीरियल की कहानी और उसे दर्शाने के तरीके में भी बहुत बदलाव आया है जो पाकिस्तानी सीरियलों से बहुत अलग है। अलगी स्लाइड में जानिए कैसे।
नाटकीयता से दूर रहते हैं पाकिस्तानी सीरियल
आज के वक्त में शायद ही कोई सीरियल होगा जिसमें हीरो-हीरोइन की एक्टिंग पसंद की जाती है। पहले लोग उन्हें सालों तक एक्टिंग के जरिए ही याद रखते थे क्योंकि वो ऐसी छाप छोड़ जाते थे। अब भारतीय धारावाहिकों में रोना धोना, बदला लेना, चेहरे पर हाव-भाव की बाढ़ ला देना ही सब कुछ है।
पाकिस्तानी सीरियलों में ऐसा नहीं है। उनके किरदार असली और जिंदगी से जुड़े लगते हैं। उन्हें देख कर ये नहीं लगता कि एक्टिंग कर रहे हैं बल्कि देखने वाला खुद को उस किरदार से जुड़ा महसूस करता है।
भारतीय सीरियलों में कोई बड़ी घटना हुई नहीं कि चारों तरफ से कैमरे उस किरदार के चेहरे पर आ धमकते हैं। 'धूम ताना ताना', 'लालाला रूरूरू' जैसी गैरजरूरी म्यूजिक बजती लगती है।
लेकिन पाकिस्तानी सीरियलों में इतना बढ़ा-चढ़ा कर नहीं दिखाया जाता। शायद वे जानते हैं कि उनके दर्शक इतने मूर्ख नहीं है और असलियत में विश्वास रखते हैं। खास बात ये है कि भारतीय दर्शकों को भी पाकिस्तानी सीरियलों की ये बातें अच्छी लगती हैं।
संगीत और प्रेम का अलग अंदाज
पाकिस्तानी सीरियलों में फिल्मों से चुराए या उल्टी सीधी धुने बनाए हुए गाने नहीं होते। हर सीरियल का खुद दृश्य और जरूरत के हिसाब से अपना खुद का गाना होता है जबकि भारतीय धारावाहिकों में कोई नई फिल्म आई नहीं कि उसका गाना बैकग्राउंड में बजने लगता है। दिल टूटा तो दुख वाला, हीरो-हीरोइन की आंखे मिलीं तो रोमांटिक वाला।
जबकि पहले के वक्त में ऐसा नहीं था। गुलजार के सीरियल मिरजा गालिब के लिए खुद जगजीत सिंह, चित्रा सिंह और विनोद राठौड़ ने गाने लिखे और गाए। यह एल्बम खूब लोकप्रिय भी हुई थी। इसी तरह सीरियल 'कसौटी जिंदगी की' में भी खुद उनके बनाए कुछ गाने हुआ करते थे।
पाकिस्तानी सीरियलों में हर दूसरे दृश्य में हीरो-हीरोइन टकराते नहीं, उनके बीच जबरदस्ती के रोमांटिक या अंतरंग सीन नहीं होते फिर भी उनका प्यार दिल को छू जाता है। जबकि भारतीय सीरियलों में तो ये सब इतना बढ़ गया है कि परिवार साथ में टीवी देखने से कतराता है। हालांकि ये अपनी अपनी सभ्यता और सोच की बात है कि कौन प्रेम को किस हद तक दिखाना चाहता है।
इसके अलावा महिलाओं के किरदार और स्तर में खासा अंतर देखने को मिलता है।
भारतीय धारावाहिकों से गुम हो गया है आम आदमी
पाकिस्तानी सीरियलों के किरदार आम इंसान ही होते हैं। अगर वो मिडिल क्लास दिखाए जाते हैं तो वैसे ही घर, कपड़े, बर्तन होते हैं। उनका रहन-सहन वैसा ही होता है जैसे कि एक असल मिडिल क्लास आदमी का होगा। जबकि भारतीय सीरियलों में ज्यादातर तो अमीर, बिजनेस मैन परिवार ही दिखाए जाते हैं।
गरीब आदमी दिखाया भी जाता है तो उसके घर, रहन सहन में कोई कमी नहीं होती। वो भी कांच की प्लेट में ही खाना खाता है, टैक्सी से आता-जाता है और साज-सज्जा में कोई कमी नहीं करता।
भारतीय धारावाहिकों की महिलाएं आधी रात को भी मेकअप लगा कर, भारी भरकम गहने लाद कर सोती हैं, उठती हैं तो पूरी सजी हुई। क्या असल जिंदगी में किसी महिला को इस तरह देखा है? वहीं पाकिस्तानी सीरियलों में महिलाएं जरूरत से ज्यादा मेकअप नहीं करतीं, खलनायिकाएं बड़ी बिंदी और आंख मटका कर डायलॉग नहीं बोलती।
महिलाओं की स्थिति को लेकर भी भारतीय सीरियल कमजोर दिखते हैं, अलगी स्लाइड में जानिए कैसे।
मर्दों जितना ही दमदार है वहां की महिलाओं का किरदार
भारतीय सीरियलों में महिलाओं का औचित्य सिर्फ इतना है कि उसे बहू, बेटी या पत्नी होने का फर्ज निभाने के लिए परिवार को मुसीबतों से निकालना है। वे कितनी भी दिल की अच्छी क्यों न हो, खलनायिका के षडयंत्रों में फंस ही जाती है। वे घर के चौके-चूल्हे से बाहर या तो आती नहीं और अगर आती है तो खलनायक का पर्दाफाश करने भर के लिए।
जबकि क्या असल जिंदगी में आज की महिलाएं ऐसी हैं? क्या उन्हें दफ्तर नहीं जाना होता, शॉपिगं नहीं करनी होती, पढ़ाई नहीं करनी होती? पाकिस्तानी सीरियलों में ऐसा नहीं है। वहां की महिलाएं कामकाजी भी होती हैं और घर संभालने वाली भी।
मुस्लिमों में एक से ज्यादा शादी करने की इजाजत है इसलिए सीरियलों में यह दिखाया भी जाता है। वहां महिलाएं तलाक भी लेती हैं लेकिन उसके बावजूद मजबूत इरादें रखती हैं। वे हर वक्त रोती नहीं रहतीं, उनकी पूरी जिंदगी मर्दों के ही इर्द गिर्द नहीं घूमती।
वहीं पुरुषों के किरादारों में भी फर्क दिखता है। भारतीय सीरियल में पुरुष या तो ऑफिस में बड़ी-बड़ी मीटिंग करते या घर में सास-बहू के झगड़े को चुपचाप सहते दिखते हैं। जबकि पाकिस्तानियों में मर्द किचन में काम करते, बच्चों के लिए खाना पकाते, बीवी के लिए नाश्ता बनाते भी दिख जाते हैं।
यकीनन, उनका समाज हमारे समाज से ज्यादा विकसित दिखता है और सामाजिक मुद्दों को पुरजोर तरीकों से उठाता है। ये भी कहा जा सकता है कि कई चीजें हैं जो भारतीय सीरियलों में हुआ करती थीं पर अब नहीं हैं और वहीं चीजें पाकिस्तानी सीरियल में मिल जाती हैं। शायद इसीलिए जो भारतीय पाकिस्तानी सीरियल देखते हैं, वो उसके फैन हो जाते हैं।