'मैं अब डरकर नहीं, सोच-समझकर फैसले लेती हूं', फिल्मों और करियर पर खुलकर बोलीं अभिनेत्री राशी खन्ना
Rashii Khanna Exclusive Interview: '120 बहादुर' फिल्म में नजर आ रहीं अभिनेत्री राशी खन्ना ने हाल ही में अमर उजाला से बातचीत में अपनी जर्नी और प्रोफेशनल जिंदगी को लेकर बातचीत की है। राशी ने क्या कुछ कहा है, चलिए आपको बताते हैं।
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विस्तार
हाल ही में राशी खन्ना फिल्म '120 बहादुर' में फरहान अख्तर के साथ नजर आईं। इस फिल्म में उन्होंने एक राजस्थानी किरदार निभाया, जिसे काफी सराहा गया। अलग-अलग भाषाओं की फिल्मों में काम करने के बाद अब वह लगातार नए और चैलेंजिंग किरदारों की तलाश में हैं। अमर उजाला से बातचीत में राशी ने अपने प्रोफेशनल सफर के बारे में विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि हर भाषा और संस्कृति को अपनाना उनके लिए कितना चुनौतीपूर्ण रहा। इसी बातचीत में उन्होंने टाइपकास्टिंग, स्क्रिप्ट सिलेक्शन और अपने ड्रीम रोल्स पर भी विचार साझा किए।
अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों के किरदार निभाना कितना चैलेंजिंग रहा?
मुझे लगता है कि ये एक ब्लेसिंग है कि मैं अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों में किरदार निभाती हूं। चैलेंजिंग भी रहता है क्योंकि आसान नहीं होता। लेकिन मेरा मानना है कि यही एक्टर होने का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। जब मैं सेट पर पहले दिन जाती हूं तो मुझे थोड़ी नर्वसनेस होती है। क्योंकि आपको पता होता है कि आप पर प्रेशर है...सही एक्सेंट देना है, सही इमोशन देना है और उस भाषा में ऑथेंटिक लगना भी जरूरी है।
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वहीं नर्वस एनर्जी मुझे ग्रो करने में मदद करती है। मैंने '120 बहादुर' में राजस्थानी किरदार निभाया। अपने अगले शो में मैं पंजाबी बनी और मैंने बंगाली लड़की का किरदार भी निभाया। हर बार पहला दिन सबसे चैलेंजिंग होता है। लेकिन धीरे-धीरे मैं किरदार में ढल जाती हूं। आज अगर आप मुझसे पूछें कि मैं कौन हूं तो शायद मैं खुद भी नहीं बता पाऊंगी। मुझे लगता है कि मैं सच्ची इंडियन हूँ क्योंकि मैंने इतने अलग-अलग रूप निभाए हैं। मेरे लिए ये चैलेंज से ज्यादा फिल्मों के जरिए मिली एक ब्लेसिंग है।
जब मुझे 120 बहादुर ऑफर हुई थी तो मेरा पहला रिएक्शन गर्व का था। मुझे खुशी हुई कि मुझे इस फिल्म का हिस्सा बनने का मौका मिल रहा है। मेरे लिए यह जरूरी नहीं था कि किरदार कितना लंबा है। ज्यादा मायने यह रखता है कि उसका इम्पैक्ट कितना गहरा और लंबा चलेगा। कहानी सुनते ही लगा कि ये कहानी लोगों तक पहुंचनी चाहिए। डायरेक्टर के पास आर्मी से जुड़े फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस थे क्योंकि उनके परिवार में कई लोग आर्मी में रहे हैं। उन्हें पता था कि वो क्या चाहते हैं और इससे तैयारी आसान हो गई। एक्सेल एंटरटेनमेंट और फरहान सर जुड़े हुए थे, तो भरोसा और बढ़ गया। मुझे लगा कि ये फिल्म दमदार होगी।
मैंने राजस्थानी एक्सेंट के लिए कोच के साथ काफी मेहनत की। डायरेक्टर ने बताया कि अमीर राजस्थानी परिवारों में बातें अक्सर साइलेंस में होती हैं और इमोशन्स भी छुपाकर रखे जाते हैं। यह सब समझकर मैंने अपनी लाइन्स कई बार प्रैक्टिस कीं ताकि सब कुछ ऑथेंटिक लगे। आज जब मैं लोगों की रिएक्शन्स और रिव्यूज देखती हूं तो मुझे संतोष होता है। लोग वही महसूस कर रहे हैं जो मैंने शूट करते समय महसूस किया था।
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मुझे लगता है कि मेरी सबसे बड़ी ताकत यह है कि मैं दिल से आगे बढ़ती हूं, दिमाग से नहीं। मैं बहुत इमोशनल हूं और मुझे नहीं लगता कि यह नेगेटिव बात है। आज की दुनिया में इमोशन्स फील करना एक बड़ी ताकत हो सकती है। मेरी यही वल्नरेबिलिटी मुझे किरदारों के सच के करीब ले जाती है। मैं सिर्फ लोगों को ऑब्ज़र्व नहीं करती, बल्कि उन्हें अब्जॉर्ब भी करती हूँ। शायद यही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।
जब आप कोई स्क्रिप्ट पढ़ती हैं तो सबसे पहले किस चीज पर ध्यान देती हैं?
जब मैं स्क्रिप्ट पढ़ती हूँ, तो सबसे पहले यह देखती हूँ कि कहानी में सच्चाई कितनी है। इसके बाद किरदार पर ध्यान देती हूँ। क्या उसकी आंखों में दम है? क्या वो मुझे इमोशनली छू रहा है? क्या मैं उसकी जर्नी महसूस कर पा रही हूं? अगर सही जगह मैं हंस रही हूं और सही जगह रो रही हूं तो मेरे लिए वही सही स्क्रिप्ट होती है। मेरे लिए स्क्रिप्ट का इमोशनल ट्रुथ सबसे जरूरी होता है।