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Movie Review: सनी और बॉबी के फैन हैं, तो ही देखें 'पोस्टर ब्वॉयज'

Fri, 08 Sep 2017 12:12 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Fri, 08 Sep 2017 12:12 PM IST
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sunny deol and bobby deol film poster boys review
पोस्टर ब्वॉयज
-निर्माताः सोनी पिक्चर्स
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-निर्देशकः श्रेयस तलपडे
-सितारेः सनी देओल, बॉबी देओल, श्रेयस तलपडे
रेटिंग **

पोस्टर बॉयज इसी नाम से बनी मराठी फिल्म का रीमेक है। निर्माता-निर्देशक के अनुसार यह एक सच्ची घटना पर आधारित है। जिसमें सरकार द्वारा प्रकाशित पुरुष नसबंदी प्रचार पोस्टरों पर एक गांव के ऐसे तीन युवकों के फोटो छप गए, जिन्होंने यह कराई ही नहीं थी। इसके बाद उन्हें गांव में बड़ी जलालत झेलनी पड़ी।

सरकार तथा चिकित्सक लगातार इस भ्रांति को मिटाने की कोशिश करते रहे हैं कि स्त्री-पुरुष नसबंदी के मूल में जनसंख्या नियंत्रण का लक्ष्य है। परंतु इस चिकित्सकीय प्रक्रिया को पौरुष/यौनशक्ति से जोड़ने के कारण पुरुष प्रधान भारतीय समाज में इसे महिलाओं के हिस्से में डाल दिया गया है। अतः नसंबदी के आंकड़ों में ज्यादा संख्या उनकी की होती है।
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sunny deol and bobby deol film poster boys review
पोस्टर ब्वॉयज

पोस्टर बॉयज में जन-जागरण के लिए कहानी को कॉमेडी बनाया गया है। नसबंदी प्रचार पोस्टर पर तस्वीर आने के बाद कैसे जमगेठी गांव के पूर्व फौजी जगावर सिंह (सनी देओल), स्कूल अध्यापक विनय शर्मा (बॉबी देओल) और बैंकों के लिए कर्ज वसूली करने वाले अर्जुन सिंह (श्रेयस तलपडे) के जीवन में भूचाल आता है। जगावर की बहन की सगाई टूट जाती है। शर्मा की पत्नी छोड़ जाती है। अर्जुन की प्रेमिका के पिता बेटी की शादी उससे करने से इंकार कर देते हैं।

काफी दृश्य जग-हंसाई में निकल जाते हैं और इसके बाद तीनों को मिलकर न्याय की शरण में जाते हैं। अंत में उन्हें सरकार के विरुद्ध ‘नंगा आंदोलन’ छेड़ते दिखाया गया है। अंत में तीनों यह बताने में सफल होते हैं कि पोस्टर पर उनकी तस्वीरें सरकारी कर्मचारियों की गलती से छपी और तभी लगे हाथ दर्शकों को संदेश दे दिया जाता है कि नसबंदी को पौरुष या यौन शक्ति से जोड़ना सही नहीं है। जनसंख्या नियंत्रण सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है। अब ‘मर्द’ आगे आएं।

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पोस्टर ब्वॉयज

फिल्म का निर्देशन श्रेयस तलपडे ने किया है। उन्होंने कहानी को टीवी सीरियल की तरह दिखाया तथा शूट किया है। वह भविष्य के लिए उम्मीद नहीं जगाते। यह बात निराश करती है। कॉमिक टोन के बावजूद फिल्म कुछेक संवादों में ही हंसा पाती है। सनी देओल की छवि से जुड़े कॉमिक संवादों का काफी इस्तेमाल है। मगर यह तात्कालिक असर छोड़ते हैं। इसी तरह बॉबी की भूमिका एक टीचर की है, जो बच्चों को गणित-भूगोल सब पढ़ाता है, मगर पता नहीं क्यों बेहद कठिन हिंदी बोलता है!

श्रेयस का रोल ऐसे ग्रामीण/कस्बाई युवा का है जिसकी गर्लफ्रेंड प्रेग्नेंट है और अदालती लड़ाई जीतते-जीतते वह पिता बन जाता है। फिल्म की स्क्रिप्ट ढीली है। कसावट गायब है। बात खिंचती ही चली जाती है। अगर बीच में चुटकुलेनुमा संवाद न आएं तो आप बुरी तरह ऊब सकते हैं। गीत-संगीत में दम नहीं है। तीनों एक्टर्स का अभिनय काम-चलाऊ है। फिर भी सनी-बॉबी के फैन्स चाहें तो इस फिल्म को देख सकते हैं।

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