Starfish Review: ‘एनिमल’ की रिलीज से पहले टी सीरीज का नजरबट्टू, हर तरफ लोबान सा सब धुआं धुआं
ऐसी उम्मीद की जाती है कि इंसान अपनी गलतियों से सीख कर आगे कुछ और बेहतर काम करने की कोशिश करता रहता है। लेकिन अगर गलतियों में सुधार न दिखे तो यही माना जाता है कि इंसान अपनी गलतियों को सुधार कर बेहतर काम करना ही नहीं चाहता है। अभिनेत्री खुशाली कुमार और निर्देशक अखिलेश जयसवाल के करियर की दूसरी फिल्म 'स्टारफिश' इसका बिल्कुल सटीक उदाहरण है। खुशाली कुमार इस फिल्म से पहले 'धोखा- राउंड ऑफ कॉर्नर' कर चुकी हैं और निर्देशक अखिलेश जायसवाल इससे पहले फिल्म 'मस्तराम' का निर्देशन कर चुके हैं। इन दोनों की पहली फिल्म के मुकाबले 'स्टारफिश' बहुत ज्यादा कमजोर फिल्म है। कहानी ऐसी उलझी हुई है कि शायद फिल्म बनाने वालों ने भी इसे देखने के बाद इससे उम्मीद छोड़ दी और रही सही कसर इसका प्रचार देख रही कंपनी ने पूरी कर दी।
फिल्म 'स्टारफिश' की कहानी के केंद्र में स्कूबा ड्राइवर तारा है। तारा की बीती जिंदगी में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिसकी वजह से उसे पैनिक अटैक्स आते रहते हैं। वह हमेशा ही ड्रग्स और शराब के लत में डूबी रहती है। इस फिल्म में तारा का अमन और नील के साथ लव ट्राएंगल दिखाया गया है। शुरू से अंत तक तारा इस कंफ्यूजन में रहती है कि किसे वह अपना जीवन साथी चुने। अपनी शादी से पहले वह अपनी मां सुकन्या के अतीत को जानना चाहती है जिसने तारा की प्रेगनेंसी की खबर सुनने के बाद आत्महत्या कर ली थी। तारा अपने पिता और दादी के साथ रहती है, उसका पूरा परिवार मुंबई से सब कुछ बेचकर माल्टा पहुंच गया है।
फिल्म की कहानी शुरुआत से अंत तक भटकी हुई है। इस फिल्म को फिल्म के निर्देशक अखिलेश जायसवाल ने बीना नायक और आदित्य भटनागर के साथ मिलकर रचा है। फिल्म की कहानी बीना नायक के उपन्यास 'स्टारफिश पिकल' पर आधरित है। तारा की मां शादी से तीस साल पहले गोवा घूमने गई थी और वहां से प्रेग्नेंट होकर लौटती है। तारा गोवा यह पता लगाने जाती है कि गोवा में किसके साथ उनकी मां का संबंध रहा होगा और तारा का असली पिता कौन है? फिल्म की कहानी माल्टा से कब गोवा पहुंच जाती है और गोवा से कब माल्टा पहुंच जाती है। पता ही नहीं चलता है।
फिल्म का क्लाइमेक्स तो और भी हास्यपद लगता है जब गोवा में अपनी मां के अतीत को तलाशती तारा एक ऐसे शख्स के पास पहुंचती है। जिसके साथ वह पहले ही शांति और आध्यात्म की खोज के दौरान अंतरंग संबंध स्थापित करने की कोशिश करती है, वहीं तारा का असली पिता निकलता है। मिलिंद सोमन ने आध्यात्मिक गुरु और म्यूजिक टीचर की भूमिका निभाई है। जवानी के दिनों में उनका किरदार कैलाश का दिखाया गया है, जिसके साथ तारा की मां के अंतरंग संबंध स्थापित हुए थे। मिलिंद सोमन का किरदार कैलाश और आध्यात्मिक गुरु का एक ही है या फिर दोनों अलग है, इसे निर्देशक ने दर्शकों पर छोड़ दिया। फिल्म में ड्रग्स, शराब और सेक्स वाले दृश्यों की भरमार के बदले अगर कहानी सहज तरीके से कहीं गई होती तो यह फिल्म अपना असर छोड़ने में जरूर कामयाब होती।
अभिनय के लिहाज से देखा जाए तो किसी का भी अभिनय प्रभावित नहीं करता है। अपनी पहली फिल्म 'धोखा- राउंड ऑफ कॉर्नर' से ज्यादा खुशाली कुमार ने इस फिल्म में निराश किया है। एक्टिंग के नाम पर वह लाउड एक्टिंग करती हैं। अमन की भूमिका में तुषार कपूर और नील की भूमिका में एहान भट्ट ने काफी निराश किया। मिलिंद सोमन इस फिल्म में सिर्फ तीन -चार सीन में ही नजर आए और वह इस बार भी उस पुरानी कहावत को खरा करने की पूरी कोशिश करते नजर आए कि मॉडल अच्छे एक्टर नहीं बन सकते। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है खास करके अंडरवाटर वाले दृश्य की । लगता है इस फिल्म को एडिट करने के बाद फिल्म के एडिटर ने दोबारा फिल्म देखी नहीं होगी। बीच में कौन सा सीन कब आकर टपक पड़ता है, पता ही नहीं चलता है। टी सीरीज की फिल्मों से थोड़ी सी उम्मीद यह होती है कि फिल्म कैसी भी हो गाने तो अच्छे ही होंगे, लेकिन इस फिल्म में ऐसा कोई एक गाना नहीं, जो फिल्म देखने के बाद याद रहे। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक भी औसत दर्जे का है। कुल मिलाकर, फिल्म टी सीरीज के लिए एक नजरबट्टू का काम करती है, जिसे कंपनी ने अपनी मेगा बजट फिल्म ‘एनिमल’ की नजर उतारने के लिए हफ्ता भर पहले रिलीज कर दिया है।