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साला खड़ूस समीक्षा: माधवन की छवि बदलने के लिए बनाई गई है फिल्म

Fri, 29 Jan 2016 04:21 PM IST
Updated Fri, 29 Jan 2016 04:21 PM IST
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saala khadoos movie review
-निर्माताः राजकुमार हिरानी/आर. माधवन
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-निर्देशकः सुधा कोंगरा
-सितारेः आर.माधवन, ऋतिका सिंह, मुमताज सरकार, जाकिर हुसैन
रेटिंगः **

- रवि बुले
-कुछ मैरी कॉम की प्रियंका चोपड़ा लें और कुछ चक दे इंडिया का शाहरुख खान। फिर खेलों में राजनीति का मुद्दा और कोच/फेडरेशन के अधिकारियों द्वारा लड़कियों के यौन शोषण का मामला। इन सबको मिक्स करके अंतरराष्ट्रीय मंच पर खिलाड़ी के चैंपियन बनने का चमकदार वरक लगा दें। खेल के मैदान की फिल्मी कहानी तैयार। साला खड़ूस यही है। खेल है, बॉक्सिंग का रिंग।

फिल्म की समस्या यह है कि इसमें पहले ही सीन से आप जानते हैं कि आगे क्या होने वाला है। चक दे इंडिया की छाया इस पर साफ नजर आती है। अतः कहानी में बांधने वाले तत्व गायब हैं। एक काबिल बॉक्सिंग कोच से छुटकारा पाने के लिए फेडरेशन के अधिकारी उस पर बॉक्सर लड़कियों से दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हैं।
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सजा के तौर पर उसे हरियाणा से तमिलनाडु भेज दिया जाता है कि रैंकिंग में नीचे रहने वाले राज्य में चैंपियन तैयार करे! होता भी यही है। कोच को एक तूफानी लड़की मिलती है और वह देखते-देखते उसे चैंपियन में तब्दील कर देता है। हालांकि कोच और ट्रेनी में बाप-बेटी की उम्र का फासला है, लेकिन प्यार के कोमल अंकुर यहां फूटते आप देख सकते हैं!
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इमेज बदलने में माधवन की मदद नहीं कर पाएगी 'साला खड़ूस'

saala khadoos movie review

फिल्म पूरी तरह आर.माधवन की रोमांटिक छवि को एंग्री मैन में बदलने के लिए बनाई गई है। फोकस उसी पर है। माधवन ने अपनी तरफ से अच्छी कोशिश की है। उनकी गुस्सैल छवि अभिनय से ज्यादा जिम जाकर तैयार किए गए भारी-भरकम शरीर और लंबे-बिखरे बालों की वजह से थोड़ी उभर पाती है। लेकिन शिष्या का उनके प्रति आकर्षण उनकी रोमांटिक छवि को फिर नीचे से ऊपर ले आता है। अतः यह फिल्म इमेज बदल पाने में माधवन की कोई खास मदद कर पाएगी इसमें संदेह है।

ऋतिका सिंह असल जिंदगी में बॉक्सर हैं और उन्होंने पर्दे पर अपना काम बखूबी किया है। लंबी फिल्मी पारी खेलने के लिए उन्हें अभी काफी तैयारी करनी होगी। जबकि मुमताज सरकार सीमित दृश्यों में जगह बनाने में सफल हैं। जाकिर हुसैन लंबे समय बाद किसी भूमिका में प्रभाव छोड़ सके हैं। निर्देशक सुधा कोंगरा ने फिल्म पर पकड़ रखी है और सीमित बजट के बावजूद आर्ट डायरेक्शन तथा कैमरावर्क अच्छा है।

लेकिन बॉक्सिंग जैसे खेल में बहने वाला खून-पसीना यहां ऐसा नहीं दिखता कि दिल छू ले। यहां मदी (ऋतिका) का संघर्ष तो लंबा है लेकिन उसका चैंपियन बनना दो मुकाबलों में समेट दिया गया है। सच्चाई के धरातल पर कदम-कदम बढ़ती कहानी अंत आते-आते बिल्कुल फिल्मी हो जाती है। बॉक्सिंग और उससे जुड़े कई तकनीकी पहलू यहां छूट गए है। जिन्हें शाहरुख और प्रियंका की स्पोर्ट्स फिल्में पसंद आई थीं वे साला खड़ूस से संतुष्ट नहीं हो पाएंगे।

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