Oppenheimer Review: सिनेमा के एवरेस्ट पर पहुंचे क्रिस्टोफर नोलन, ध्रुवतारा बने सिलियन और रॉबर्ट डाउनी जूनियर
गिनती के लोग ही हैं अब इस दुनिया में जिनकी अपनी यादों में हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम के दिनों की बातें शामिल होंगी। 78 साल पहले द्वितीय विश्व युद्ध को निर्णायक मुकाम तक लाने और इसके बाद पूरी दुनिया की तस्वीर बदल देने वाली इस घटना से पहले के कालखंड को सिनेमा के विशालतम परदे (आईमैक्स) पर उतारने का जीवट उन क्रिस्टोफर नोलन ने दिखाया है जिनके प्रशंसकों की तादाद जितनी अमेरिका में हैं उससे कहीं अधिक दुनिया के दूसरे देशों में हैं। नोलन इस दौर के सबसे महान फिल्मकारों में कब के शामिल हो चुके हैं। वह उन चुनिंदा निर्देशकों में हैं जिनके प्रशंसकों की तादाद संभवत: विश्व सिनेमा में इस दौर में सबसे ज्यादा है। वह अपने आप में किवदंती बन चुके हैं और उनका सिनेमा हर बार रुपहले परदे पर एक ऐसा अध्याय लिखता है जिसकी प्रतिध्वनि अगले साल भर चलने वाले पुरस्कारों में सुनाई देती है। अगले साल के ऑस्कर पुरस्कारों में उनकी नई फिल्म ‘ओपनहाइमर’ कितनी श्रेणियों में नामांकित होगी, इस पर चर्चा फिल्म की रिलीज के पहले ही शुरू हो चुकी है।
नाभिकीय हथियारों के जनक की कहानी
फिल्म ‘ओपनहाइमर’ नाभिकीय हथियारों के जनक कहे जाने वाले जे आर ओपनहाइमर के जीवन की उन घटनाओं को दर्शाती है जिसमें एक इंसान अपने दिल और अपने दिमाग के बीच संतुलन साधने की कोशिश में कुछ ऐसा कर बैठता है जिसकी आत्मग्लानि उसे बरसों तक सालती रहती है। डायनामाइट के आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल के साथ भी यही हुआ। उनके आविष्कार का पश्चाताप नोबेल पुरस्कार हैं और उनमें भी सबसे अहम रहता रहा है नोबेल शांति पुरस्कार। ओपनहाइमर अमेरिका में शरण लेने वाले यहूदी परिवार में जन्मे। जर्मनी से उनका खून का और पढ़ाई का दोनों का रिश्ता रहा और जर्मनी के तानाशाह हिटलर के छेड़े द्वितीय युद्ध को इसके अंजाम तक पहुंचाने में ओपनहाइमर की अगुआई में बने नाभिकीय बम की सबसे बड़ी भूमिका रही। फिल्म ‘ओपनहाइमर’ इसी नाभिकीय बम या परमाणु बम के बनने की कहानी है।
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नोलन के सिनेमा का एवरेस्ट
52 साल के क्रिस्टोफर नोलन ब्रिटेन में जन्मे। कर्मभूमि उनकी हॉलीवुड रही। अब तक पांच ऑस्कर पुरस्कारों, इतने ही बाफ्टा पुरस्कारों और छह गोल्डन ग्लोब पुरस्कारों के लिए नामित हो चुके नोलन की फिल्म ‘ओपनहाइमर’ बॉक्स ऑफिस और ऑस्कर के दरवाजों पर अब तक की सबसे तगड़ी दस्तक कही जा सकती है। फिल्म जे रॉबर्ट ओपनहाइमर के उन दिनों को कैमरे में कैद करती है जब उन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दरम्यान 1942 में मैनहट्टन प्रोजेक्ट के लिए चुना गया। अगले साल वह इसके मुखिया बने और न्यू मेक्सिको स्थित लॉस एलामोस प्रयोगशाला में उन हथियारों का विकास शुरू हुआ जिसके अब तक के इकलौते प्रयोग ने ही दुनिया की शक्ल बदल दी। इस प्रयोग ने नाभिकीय हथियारों का ऐसा डर बनाया कि इनकी सुगबुगाहट भर से दुनिया में हलचल मचने लगती है। सैकड़ों फिल्में ऐसे हथियारों की चोरी या उनकी तलाश पर बनी है। बीते हफ्ते रिलीज हुई फिल्म ‘मिशन इंपॉसिबल 7’ भी ऐसे ही एक नाभिकीय हथियारों की तलाश पर बनी कहानी है।
नोलन, नोलन और नोलन...
फिल्म ‘ओपनहाइमर’ इसके निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन की पिछली फिल्मों से अपने कथ्य में तो इतर है लेकिन कहानी इसकी भी नोलन ने एक गूढ़ कथ्य की तरह बुनी है। यदि आपको द्वितीय विश्व युद्ध या परमाणु बम के विकास की कहानी ज्यादा पता नहीं है तो फिल्म को समझने में दिक्कत आ सकती है। इस फिल्म में दिमाग को साथ रखने की जरूरत है और इसे लगातार सक्रिय रखने की भी आवश्यकता है। फिल्म की कहानी अतीत और वर्तमान में भटकती हुई अपनी मंजिल की तलाश करती है। श्वेत श्याम चित्रों और रंगीन दृश्यों की इस आगे पीछे की बुनावट में दर्शकों को अटकाने में फिल्म थोड़ा समय जरूर लेती है लेकिन एक बार इसकी डिजाइन समझ में आने के बाद ये किसी विशालकाय संग्रहालय में लटकी ऐसी तस्वीर की तरह बन जाती है, जिसे देखने का कौतुहल एक बार में शांत नहीं हो सकता। सिनेमा की यही जीत है कि वह अपने दर्शक को इसे बार बार देखने के लिए उत्साहित करे।
आंखें खोल देने वाले ओपनहाइमर
नोलन एक विस्मयकारी फिल्मकार रहे हैं। यहां भी वह सिनेमा कम और कौतूहल ज्यादा दिखाते हैं। उनका आईमैक्स कैमरा किरदारों के इतने करीब तक चला जाता है कि आप उनकी धमनियों में हो रही हलचल को समझ सकते हैं। मैनहट्टन प्रोजेक्ट को लेकर अंदर बाहर होने वाली बातें इस फिल्म का आधार बनाती हैं। ओपनहाइमर के कंधे पर जो जिम्मेदारी है वह एक साधारण इंसान के बस की बात नहीं और ओपनहाइमर का चरित्र कितना क्लिष्ट है, इसे समझाने की नोलन पूरी कोशिश करते हैं। ओपनहाइमर का अतीत उनके दामन पर दाग लगाने की कोशिश करता है। उनके वामपंथ की तरफ झुकाव को भी नोलन कहानी की धुरी झुकाने में इस्तेमाल करते हैं। उनकी वंशावली भी उनसे नहीं छूटती। और, इस पूरे नाटकीय घटनाक्रम को करीब तीन घंटे की फिल्म की तरह रचने में नोलन ने फिर एक बार अपने ही पिछले सिनेमा को इस फिल्म के सामने बौना बना दिया है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि इस फिल्म को उनकी अब तक की सर्वश्रेष्ठ कृति कहा जा सकती है और बीते 100 साल की फिल्मों के बारे में जब भी चर्चा होगी, तो ये फिल्म शुरू की फिल्मों में ही शुमार दिखेगी।
सिलियन मर्फी का सातवां आसमान
फिल्म ‘ओपनहाइमर’ का हाड, मांस, रक्त, मज्जा और अस्थियां क्रिस्टोफर नोलन ने अपनी पटकथा में जिस तरह रचीं, उनमें सांसें भरने का काम इसके कलाकारों ने बेहद उम्दा तरीके से किया। नोलन की फिल्मों में से ‘बैटमैन बिगिन्स’, ‘द डार्क नाइट’ और ‘द डार्क नाइट बिगिन्स’ ऐसी फिल्में रही हैं जिन पर दुनिया भर के डीसी फैंस ने अपनी खुद की कहानियां गढ़ रखी हैं। ‘इन्सेप्शन’, ‘इंटरस्टेलर’, ‘डनकिर्क’ और ‘टेनेट’ के बारे में तो वे फिल्म दर्शक भी जानते हैं जिनकी सिर्फ सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों में दिलचस्पी होती है। सिनेमा सीख रहे दुनिया भर के एकलव्यों के द्रोणाचार्य बन चुके क्रिस्टोफर नोलन के साथ इस बार सिलियन मर्फी फिल्म के लीड रोल में हैं। किसी किरदार को कैसे जिया जाता है, ये सिलियन ने करके दिखाया है। वह ओपनहाइमर ही दिखते हैं। परदे पर उन्हें देखकर एक बार भी नहीं लगता कि ये कोई कलाकार है जो इस किरदार को कर रहा है। अपनी पत्नी से उनका तनाव, अपने धुर विरोधी से उनका विवाद और अपने सहयोगियों पर हावी रहने के लिए रचा गया उनका अपना आभामंडल सिलियन मर्फी की अदाकारी का ऐसा उनवान है, जिसका धन्यवाद सिर्फ सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर पुरस्कार ही हो सकता है।
रॉबर्ट, मैट, रामी और एमिली के करिश्मे
लेकिन फिल्म ‘ओपनहाइमर’ को सिर्फ सिलियन मर्फी ने ही सांसें नहीं बख्शी हैं, रॉबर्ट डाउनी जूनियर भी उनकी ही तरह सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के उतने ही दावेदार हैं। ‘आयरनमैन’ की अपनी डेढ़ दशक से चली आ रही छवि से निकलने के लिए उन्हें ऐसे ही किरदार की जरूरत थी। लुईस स्ट्रॉस का उनका किरदार इस फिल्म का वह संतुलन है जिस पर नोलन की ये फिल्म सधी है। और, कैथरीन ओपनहाइमर के किरदार में एमिली ब्लंट को देखना अलग ही अनुभव है। ध्यान रहे कि उनका किरदार कोई आठ दशक पहले की महिला का है और उस समय की एक ऐसी महिला का किरदार करना जिसके जो दिल व दिमाग में है, वही जुबान पर है, एक चुनौती भरा काम है। एमिली ब्लंट ने फिल्म ‘ओपनहाइमर’ को एक अलग रंग से सराबोर किया है। साथ मैं मैट डैमन और रामी मलेक भी हैं जिनको सिर्फ परदे पर देखकर ही दर्शक इस बात का इंतजार करने लगता है कि अब कहानी क्या मोड़ लेने वाली है।
क्रिस्टोफर नोलन का सिनेमा शुरू से समावेशी सिनेमा रहा है। ये कहानी, वातावरण और इसके किरदारों को पूरी तरह विकसित होने का तो मौका देता ही है, उनकी फिल्मों में सिनेमैटोग्राफी, संपादन और संगीत भी सिनेमा का सुर में बजने वाला साज बनता है। होयते वान होयेतमा ने ट्रिनिटी टेस्ट में स्पेशल इफेक्ट्स या वीएफएक्स का इस्तेमाल किया या नहीं किया, इस पर फिल्म की रिलीज से पहले खूब किस्से उछाले गए। हकीकत क्या है, ये फिल्म देखकर आपको समझ आ जाएगा। जेनिफर लेम ने फिल्म का संपादन करते समय ध्यान ये रखा है कि ये इसकी आत्मा को अपने नैसर्गिक प्रवाह से विकसित होने दे। और, लुडविग गोरानसन! अपनी फिल्मों के संगीत के लिए जर्मन मूल के संगीतकार हैंस जिमर पर आश्रित रहे क्रिस्टोफर नोलन ने इस बार एक नया प्रयोग किया है। और, उनके इस प्रयोग ने फिल्म के प्रवाह में एक ऐसा रस घोल दिया है जिसे यदि आपने उम्दा साउंड सिस्टम वाले सिनेमाघर में महसूस किया तो सिनेमा में संगीत की अहमियत आपको खुद ब खुद समझ आ जाएगी, इसे लिखकर नहीं समझाया जा सकता। अगर आपने ने अरसे से बढ़िया सिनेमा नहीं देखा है तो ये मौका आपके लिए ही है।