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Movie Review: सलमान ने दिए हिंदी सिनेमा को दो नए चेहरे, दोनों ने लिख दी कामयाबी की नोटबुक!
Thu, 28 Mar 2019 11:43 PM IST
शाहरुख खान
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: शाहरुख खान
Updated Thu, 28 Mar 2019 11:43 PM IST
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notebook
- फोटो : self
फिल्मिस्तान जैसी फिल्म के लिए नेशनल अवॉर्ड जीत चुके नितिन कक्कड ने अपनी नई फिल्म नोटबुक में कश्मीर की वादियों को कहानी कहने का जरिया बनाया है। थाईलैंड की फिल्म टीचर्स डायरी की इस ऑफिशियल रीमेक में नितिन के सामने चुनौती रही दो नए कलाकारों का करियर शुरू करने की और नितिन इस पर खरे उतरे हैं।
फिल्म नोटबुक से डेब्यू कर रहे हैं जहीर और प्रनूतन, जिनके फिल्म में किरदारों के नाम हैं कबीर और फिरदौस। कबीर कश्मीरी पंडित है, जो घर छोड़ चुका है। फिरदौस एक टीचर है और कश्मीर की एक गुमनाम सी जगह में बने स्कूल में बच्चों को पढ़ाया करती थीं। कबीर सेना की नौकरी छोड़ चुका है और इसी स्कूल में पढ़ाने आता है।
यहां उसे एक डायरी मिलती है जो फिरदौस ने लिखी है। डायरी से शुरू ये प्रेम कहानी डायरी पर आकर ही खत्म होती है। कैसे? ये जानने के लिए तो आपको फिल्म ही देखनी चाहिए।
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किसी दूसरी भाषा में पहले ही बन चुकी फिल्म में ज्यादा कुछ प्रयोग करने की गुंजाइश होती नहीं क्योंकि ऐसे में कहानी के तार उलझ जाने का खतरा रहता है। फिल्म रीमेक है फिर भी इसकी लेखन टीम में शब्बीर हाशमी, दाराब फारूकी और पायल अशर के नाम हैं। पायल अशर ने फिल्म के संवाद लिखे हैं और नए कलाकारों को देखते हुए इनके लिए उनकी तारीफ बनती है।
नितिन कक्कड़ की फिल्म में कुदरत का कोई करिश्मा होता है और जिसे नितिन अपनी कहानी का सूत्रधार बनाकर फिल्म आगे बढ़ाते हैं। इस काम में इस बार नितिन की मदद की है सिनेमैटोग्राफर मनोज खतोई ने, जिनका कैमरा कश्मीर की वादियों के कैनवास पर कूंची की तरह चलता है।
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फिल्म नोटबुक से डेब्यू कर रहे हैं जहीर और प्रनूतन, जिनके फिल्म में किरदारों के नाम हैं कबीर और फिरदौस। कबीर कश्मीरी पंडित है, जो घर छोड़ चुका है। फिरदौस एक टीचर है और कश्मीर की एक गुमनाम सी जगह में बने स्कूल में बच्चों को पढ़ाया करती थीं। कबीर सेना की नौकरी छोड़ चुका है और इसी स्कूल में पढ़ाने आता है।
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यहां उसे एक डायरी मिलती है जो फिरदौस ने लिखी है। डायरी से शुरू ये प्रेम कहानी डायरी पर आकर ही खत्म होती है। कैसे? ये जानने के लिए तो आपको फिल्म ही देखनी चाहिए।
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किसी दूसरी भाषा में पहले ही बन चुकी फिल्म में ज्यादा कुछ प्रयोग करने की गुंजाइश होती नहीं क्योंकि ऐसे में कहानी के तार उलझ जाने का खतरा रहता है। फिल्म रीमेक है फिर भी इसकी लेखन टीम में शब्बीर हाशमी, दाराब फारूकी और पायल अशर के नाम हैं। पायल अशर ने फिल्म के संवाद लिखे हैं और नए कलाकारों को देखते हुए इनके लिए उनकी तारीफ बनती है।
नितिन कक्कड़ की फिल्म में कुदरत का कोई करिश्मा होता है और जिसे नितिन अपनी कहानी का सूत्रधार बनाकर फिल्म आगे बढ़ाते हैं। इस काम में इस बार नितिन की मदद की है सिनेमैटोग्राफर मनोज खतोई ने, जिनका कैमरा कश्मीर की वादियों के कैनवास पर कूंची की तरह चलता है।
अदाकारी के मामले में जहीर इकबाल औऱ प्रनूतन बहल दोनों ने अच्छा काम किया है। कहानी चूंकि एक लव स्टोरी है और दोनों के चेहरे पर ताजगी है तो मामला जम जाता है। जहीर काफी तैयार दिखते हैं। संवाद अदायगी से लेकर चेहरे के भाव और पैरों की थिरकन पर उनकी मेहनत फिल्म में दिखती है। प्रनूतन बहल की अदाकारी देख उनकी दादी नूतन की याद आती है।
संजय लीला भंसाली अपनी हर हीरोइन को नूतन की सीमा, सुजाता और बंदिनी फिल्में देखने को जरूर कहते हैं। प्रनूतन ने भी अदाकारी के सबक लगता है इन्हीं फिल्मों से सीखे हैं। फिरदौस का किरदार ग्लैमर से दूर है और प्रनूतन ने इसी में अपनी मेहनत दिखाई है। इन दोनों के अलावा फिल्म रौनक इसमें काम कर रहे बच्चे भी हैं। अरसे बाद किसी हिंदी फिल्म में बच्चों की उछलकूद देखना भी अच्छा लगता है।
गीत संगीत के लिहाज से फिल्म में और मेहनत की जा सकती थी। कश्मीर की लोकधुन पर बना गाना बूमरो बिल्कुल सटीक बैठता है। नईं लगदा भी लोग फिल्म की कहानी के साथ चला ले जाते हैं। लेकिन बाकी गानों में वह असर नहीं है जो सलमान खान की पहली फिल्म मैंने प्यार किया के गानों में था। सलमान खान अदाकारी का टैलेंट पहचानते हैं।
प्रोड्यूसर के तौर पर उन्हें हिंदी फिल्मों के संगीत को थोड़ा और समझना बाकी है। खुद सिंगर बनकर यूट्यूब पर तो वह व्यूज ला सकते हैं लेकिन फिल्म में गानों के साथ प्रयोग करना ठीक नहीं और नए चेहरों की लव स्टोरी में जमता भी नहीं है। अमर उजाला डॉट कॉम के मूवी रिव्यू में फिल्म नोटबुक को मिलते हैं तीन स्टार।
संजय लीला भंसाली अपनी हर हीरोइन को नूतन की सीमा, सुजाता और बंदिनी फिल्में देखने को जरूर कहते हैं। प्रनूतन ने भी अदाकारी के सबक लगता है इन्हीं फिल्मों से सीखे हैं। फिरदौस का किरदार ग्लैमर से दूर है और प्रनूतन ने इसी में अपनी मेहनत दिखाई है। इन दोनों के अलावा फिल्म रौनक इसमें काम कर रहे बच्चे भी हैं। अरसे बाद किसी हिंदी फिल्म में बच्चों की उछलकूद देखना भी अच्छा लगता है।
गीत संगीत के लिहाज से फिल्म में और मेहनत की जा सकती थी। कश्मीर की लोकधुन पर बना गाना बूमरो बिल्कुल सटीक बैठता है। नईं लगदा भी लोग फिल्म की कहानी के साथ चला ले जाते हैं। लेकिन बाकी गानों में वह असर नहीं है जो सलमान खान की पहली फिल्म मैंने प्यार किया के गानों में था। सलमान खान अदाकारी का टैलेंट पहचानते हैं।
प्रोड्यूसर के तौर पर उन्हें हिंदी फिल्मों के संगीत को थोड़ा और समझना बाकी है। खुद सिंगर बनकर यूट्यूब पर तो वह व्यूज ला सकते हैं लेकिन फिल्म में गानों के साथ प्रयोग करना ठीक नहीं और नए चेहरों की लव स्टोरी में जमता भी नहीं है। अमर उजाला डॉट कॉम के मूवी रिव्यू में फिल्म नोटबुक को मिलते हैं तीन स्टार।