फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Entertainment ›   Movie Review ›   movie review global baba

फिल्म समीक्षा/ग्लोबल बाबा:रोचक कहानी का निराश अंत

Fri, 11 Mar 2016 03:00 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला, दिल्ली
रवि बुले/अमर उजाला, दिल्ली Updated Fri, 11 Mar 2016 03:00 PM IST
सार

  • बाबाओं के आभामंडल को चुनौती देने और खंडित करने की कोशिश करती है फिल्म।
  • कहानी को अच्छा बुना गया है।
  • फिल्म की ज्यादा चर्चा नहीं है।

विज्ञापन
movie review global baba

विस्तार

निर्माताः विजय बंसल

विज्ञापन

निर्देशकः मनोज तिवारी
सितारेः अभिमन्यु सिंह, पंकज त्रिपाठी, रवि किशन, संदीपा धर, संजय मिश्रा, अखिलेंद्र मिश्रा
रेटिंग **

हर बाबा का एक बैकडेट रिकॉर्ड होता है। कई बार उसे सिर्फ वह स्वयं जाता है। कई बार वह समाज या पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज होता है। मगर बाबाओं को छेड़ने ही हिम्मत कभी कभार ही दिखती है। राजनीति, प्रशासन और कई बार मीडिया भी उसकी लोकप्रियता तथा अर्थतंत्र के जाल में उलझ जाते हैं। ऐसे में बाबा अपनी तरफ से ही कोई ब्लंडर कर दे तो बात अलग, वर्ना उनकी पूजा अनपढ़-गंवार-गरीबों से लेकर पढ़े-लिखे-अमीर तक सब करते हैं।

जिस बाबा का सिक्का जितना चलता है उसका संसार उतना फूलता-फलता है। निर्देशक मनोज तिवारी की पहली फिल्म ग्लोबल बाबा इन्हीं बातों की न केवल पोल खोलने के प्रयास करती है बल्कि पूरे माहौल की चुटकी तक लेती है।
विज्ञापन


एक पुलिस अधिकारी राजनेता के इशारे पर अपराधी (अभिमन्यु सिंह) को एनकाउंटर के वास्ते ले जाता है मगर वह पुलिसवाले को चकमा देकर फरार हो जाता है। भागने से पहले एक गोली उसे लगती है लेकिन बाबाओं का झुंड उसे बचा लेता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


अपराधी को एक पुराना साथी (पंकज त्रिपाठी) मिलता है जो मौनी बाबा बन कर जिंदगी गुजार रहा है। वह समझाता है कि बाबा बनने के बाद न केवल वह पुलिस से बच जाएगा बल्कि जिंदगी भी चमक जाएगी।

Trending Videos

फिल्म में आखिर तक रोचकता बनीं रहती है

movie review global baba

फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे देखते-देखते तस्वीर बदलती है और पुलिस से बचते-फिरने वाला अपराधी ग्लोबल बाबा बन जाता है। अब नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री लेकर रक्षामंत्री तक उसके क्लाइंट हैं। इन्हीं के बीच एक मीडियावाली लड़की और एनकाउंटर में नाकाम पुलिसवाला है, जो बाबा की पोल खोलने के सारे जतन करते हैं। कहानी में बाबाओं के बारे में कोई नई जानकारी है लेकिन लेखक-निर्देशक ने उसे सलीके से बांधा और कसा है। इसलिए फिल्म में रोचकता रहती है।

हालांकि यहां किरदार बहुत सारे हैं और अधिकतर के हिस्से थोड़ा-थोड़ा काम ही आया है। ऐसे में कहीं-कहीं फिल्म टीवी धारावाहिकों के एपिसोड जैसा आभास देती है। मगर इसका अंत चौंकाता है, जो कि बहुत ही गैर-पारंपरिक और कला फिल्म जैसा मालूम पड़ता है। यही फिल्म को कमजोर बनाता और आम दर्शक से दूर करता है। आप पाते हैं कि एक कहानी बीच में ही खत्म हो गई।

अभिमन्यु सिंह ग्लोबल बाबा हैं लेकिन पंकज त्रिपाठी तोतले बाबा की भूमिका में ज्यादा रोचक लगते हैं। संदीपा धर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल हैं। कई दृश्यों में वह यामी गौतम की याद दिलाती हैं। रवि किशन, अखिलेंद्र मिश्रा और संजय मिश्रा की भूमिकाओं में विशेष उल्लेखनीय कुछ नहीं है। इन कलाकारों ने भी अपनी तरफ से रोल को मांजने का काम नहीं किया।

निराशाजनक यह है कि पूरी फिल्म में बाबाओं के आभामंडल को चुनौती देने और खंडित करने की कोशिश करते निर्देशक-कहानीकार अंतः में मौका आने पर पूरा मजमा समेट लेते हैं। आप सोचते रह जाते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया?

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें Entertainment News से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। मनोरंजन जगत की अन्य खबरें जैसे Bollywood News, लाइव टीवी न्यूज़, लेटेस्ट Hollywood News और Movie Reviews आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed