Movie 800 Review: हिंदी में डब फिल्मों के लिए अलग सेंसर बोर्ड जरूरी, मुरलीधरन के नाम पर लगा बायोपिक का बट्टा
फिल्म '800' क्रिकेट के इतिहास में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले क्रिकेटर मुथैया मुरलीधरन के जीवन पर आधरित बायोपिक है। फिल्म में मुथैया मुरलीधरन के संघर्ष और दर्द भरी कहानी को दिखाया गया है जो युवाओं के लिए एक प्रेरणादायक फिल्म साबित हो सकती है। लेकिन, यह फिल्म तकनीकी रूप से बहुत ही कमजोर फिल्म है। इससे पहले क्रिकेट पर आधरित कई फिल्मों का निर्माण हो चुका है। लेकिन महेंद्र सिंह धोनी की जिस फिल्म 'एम एस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी' को मीडिया में सुपरहिट फिल्म बताया जाता है, उसके समेत क्रिकेट पर बनी फिल्मों का बड़े परदे पर करिश्मा कम ही चला है।
फिल्म '800' के कहानी की शुरुआत मुथैया मुरलीधरन के बचपन से होती है और उनके संन्यास लेने की घोषणा पर आकर खत्म होती है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मुथैया मुरलीधरन के क्रिकेट की दुनिया में विश्व स्तर पर अपना नाम बनाया। मुरलीधरन के जीवन में ऐसे कई मोड़ आए कि लोग उनको गलत ही साबित करते रहे। और, ऐसे में जिंदगी में एक ऐसा मोड़ भी आता है कि जब उन्हें लगने लगता है कि जब सब लोग गलत साबित करने पर जुटे हों तो खुद को सही साबित करने से कोई फायदा नहीं है। मुरलीधरन की गेंदबाजी पर उनके पूरे करियर पर लगातार सवाल उठे और उन सवालों का जवाब देने के लिए ही बनी है फिल्म ‘800’।
फिल्म ‘800’ की कहानी में श्रीलंकाई सिंहली और तमिल समुदायों की अदावत की पृष्ठभूमि है। मुरलीधरन तमिल बस्ती में जन्मे लेकिन जब श्रीलंका वर्ल्डकप जीता और मुरलीधरन उसके हीरो बने तो ये वर्गसंघर्ष भूल पूरे देश ने इस विजय का जश्न मनाया। और यहीं से श्रीलंका में सामुदायिक संघर्ष में जुटे लोगों को नजरिया भी बदलना शुरू हुआ। इस बायोपिक का यही उद्देश्य है। दरअसल क्रिकेट खिलाड़ियों पर जो भी बायोपिक बनती रही हैं, जब बायोपिक कम और हैजियोग्राफी ज्यादा होती है। यानी कि स्तुतिगाना। सबको अपना दामन साफ करना होता है। धोनी हों या मोहम्मद अजहरुद्दीन सबकी बायोपिक इसीलिए बनी। लेकिन, नतीजा सबका एक जैसा। यहां तक कि भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी जीत पर बनी फिल्म '83' तक देखने लोग सिनेमाघरों में नहीं गए।
मुथैया मुरलीधरन की बायोपिक '800' की शुरुआत पत्रकार की भूमिका निभा रहे अभिनेता नासर से होती है। वह समाचार पत्र में छपे मुथैया मुरलीधरन के लेख के आधार पर अपने मित्र को कहानी सुनाते हैं, और उसी आधार पर फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है। इस फिल्म में इतने सारे घटनाक्रम हैं कि अगर इनको विस्तार दिया जाए तो कम से कम चार फिल्में बन सकती हैं। फिल्म के निर्देशक एक अच्छी और रोचक कहानी को पर्दे पर ठीक से पेश नहीं कर पाए। इस फिल्म में मधुर मित्तल ने मुथैया मुरलीधरन का किरदार निभाया है, काफी हद तक वह इस किरदार को निभाने में सफल रहे हैं। फिल्म की बाकी कास्टिंग बहुत लचर है।
दक्षिण भारतीय भाषाओं की डब फिल्में जब हिंदी में रिलीज होती है, तो उनमें न व्याकरण की तरफ ध्यान होता है और न ही आवाजों पर। अब तो ऐसा लगने लगा है कि हिंदी में डब फिल्मों का भी एक स्तर तय होना जरूरी है और इसके लिए जरूरत पड़े तो अलग से सेंसर बोर्ड भी बनना चाहिए। ऐसा न हो सके कम से कम इनकी एग्जामिनिंग कमेटी ही अलग होनी चाहिए। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी बहुत खराब है। क्रोमा पर शूट किए गए सीन कोई असर नहीं डाल पाते हैं। फिल्म एडिटिंग टेबल पर संभाली जा सकती थी,लेकिन फिल्म के निर्देशक को शायद इसकी जरूरत ही महसूस नहीं हुई होगी।
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