Mere Husband Ki Biwi Review: जैकी और रकुल का साथ पाकर अर्जुन का सधा निशाना, भूमि और हर्ष बने कमजोर कड़ियां
फिल्म ‘मेरे हसबैंड की बीवी’ उस दौर की कॉमेडी फिल्म है, जिस दौर में हर स्टैंड अप कॉमेडियन खुद को दूसरे से ज्यादा ‘कूल’ दिखाने के चक्कर में भर भर के अपने कार्यक्रमों में गालियां दे रहा है। एक स्टैंडअप कॉमेडियन इस फिल्म में भी है। अपने खुद के ‘एस्केप रूम’ के वीडियो ये डिलीट मार चुका है। यहां बड़े परदे पर उसे उम्मीद है कि लोग उसकी नई बोहनी करा देंगे। लेकिन, फिल्म ‘मेरे हसबैंड की बीवी’ की सबसे कमजोर कड़ी अगर कोई है तो ये स्टैंडअप कॉमेडियन हर्ष गुजराल ही हैं। वैसे तो शेक्सपियर ने कहा है कि नाम में क्या रखा है? लेकिन, मेरा ये पक्का मानना है कि नाम में बहुत कुछ रखा है। खासतौर से नाम अगर किसी फिल्म का हो। ‘छावा’ नाम महाराष्ट्र के घर घर में प्रचलित है और उसकी लोकप्रियता को एक औसत फिल्म को कितना फायदा मिल सकता है, फिल्म ‘छावा’ की सफलता इसका सबूत है। फिल्म का कथानक कितना असली है, कितना बनावटी, इस पर बहस अब भी जारी है और जिस थियेटर में ‘छावा’ के एक ही दिन में 18 शोज चल रहे हो, उसी सिनेमाघर में ‘मेरे हसबैंड की बीवी’की स्पेशल स्क्रीनिंग देखने पहुंचे अधिकतर दर्शकों का ये मानना रहा कि इस फिल्म की दो ही सबसे बड़ी कमियां हैं, एक इसका नाम और दूसरा अर्जुन कपूर के दोस्त बने स्टैंड अप कॉमेडियन हर्ष गुजराल।
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को फिल्मों में रोल देने का ये चलन वैसा ही है जैसा कभी दलेर मेहंदी के म्यूजिक वीडियो हिट होने पर लोग उन्हें भी फिल्मों में घसीट लाए थे। ये अपने तरह के अनोखे आइटम अक्सर फिल्म के फ्लो में बाधा ही डालते हैं। फिल्म ‘तू झूठी मैं मक्कार’ में ये काम अनुभव सिंह बस्सी ने किया था। यहां हर्ष गुजराल का किरदार दाल भात में मूसरचंद हैं। कहानी फुटबॉल खेलने वाली अंतरा पर स्कूल के समय से मर मिटे अंकुर चड्ढा की है जो शादी एक टीवी जर्नलिस्ट से कर लेता है। पत्रकारों के अपने अलग ही रायते होते हैं, और आमतौर पर सामान्य दुनिया के लोगों को समझ नहीं आते। हसबैंड नामी बिल्डर हो तो दिल्ली एनसीआर के किसी चैनल के दफ्तर जाकर बीवी का सामान समेट ला सकता है, ये दिखाने के साथ फिल्म का सियापा शुरू होता है। चूंकि फिल्म का पोस्टर खुद कहता है कि कहानी त्रिकोण नहीं सर्किल है, तो थोड़ा गोल गोल घूमकर फिल्म दर्शकों को उस दौर में ले जाने की कोशिश करती है, जब जीतेंद्र और रेखा की ‘मांग भरो सजना’, ‘जुदाई’, ‘अपना बना लो’ जैसी फिल्मों में कभी नाजनीन तो कभी मौसमी चटर्जी जन्म जन्म के बंधन को सौ साल की लीज समझने की भूल कर बैठती थीं।
फिल्म ‘मेरे हसबैंड की बीवी’ की कहानी ठीक है। अपनी पहली मोहब्बत से, दूसरी लड़की से शादी और तलाक के बाद, फिर से टकरा जाने और इस बार मोहब्बत दूसरी तरफ से भी जाग जाने का ये मसला है। सरप्राइज एलिमेंट इस फिल्म का ये है कि हालात के चलते लड़के को अपनी तलाकशुदा बीवी के साथ फिर से रहना पड़ जाता है। ये खिचड़ी इतनी खिली खिली सी पकती है कि इसका असल किस्सा बताकर आपका फिल्म देखने का मजा खराब करना ठीक नहीं। मुदस्सर अजीज फिल्म के निर्देशक हैं। फिल्म लिखी भी उन्होंने ही है। 20 साल पीछे की बातें जिनको याद होंगी, उनको पता ही होगा कि मुदस्सर की बोहनी सिनेमा में बतौर राइटर ही हुई। साल 2010 में वह डायरेक्टर बने और ‘हैप्पी भाग जाएगी’ व ‘पति पत्नी और वो’ के जरिये इतना खूंटा तो मुंबई में गाड़ चुके हैं कि ‘खेल खेल में’ जैसी मल्टीस्टारर फिल्में भी उन्हें निर्देशन के लिए मिल जाती हैं।
मुदस्सर अजीज ने फिल्म की कहानी, इसकी पटकथा और इसका निर्देशन सब कुछ बहुत सोचा समझा रखा है। पटकथा लेखन के इसमें सारे फॉर्मूले आजमाए गए हैं। एक एक टेंट पोल बहुत करीने से ताना गया है। जहां फिल्म कमजोर पड़ने लगती है, वहीं कभी शक्ति कपूर आ जाते हैं तो कभी कंवलजीत और कभी अनीता राज नमूदार हो जाते हैं। बेहद सीरियस सीन में भी टीकू तलसानिया को लाकर वह कहानी का तंबू संभाले रहते हैं। बस फिल्म की कास्टिंग में उनसे दो गलतियां हुईं। एक हर्ष गुजराल की और दूसरी भूमि पेडनेकर की। भूमि पेडनेकर का प्राकृतिक सौंदर्य जबसे शल्य चिकित्सा शास्त्र से मिलकर आया है, उनके मुखमंडल का भूगोल बदल चुका है। उनका हंसना, उनका रोना सब अब एक जैसा हो चुका है। मासूमियत कब की मेकअप में घुल चुकी है। अभिनय उनका अब एक जैसा होने लगा है।
दूसरी तरफ, रकुल प्रीत सिंह बेहद सहज और सरल अभिनेत्री दिखती हैं। अब तक के करियर में वह बार बार खुद को साबित करती रही हैं, लेकिन उनके अभिनय की बात आमतौर पर बड़े सितारों के बीच ज्यादा होती नहीं है। फिल्म ‘मेरे हसबैंड की बीवी’ की बीवी वह ही हैं यानी फिल्म का टाइटल रोल वह ही कर रही हैं। अर्जुन कपूर के साथ मिलकर रकुल प्रीत ने चंद बेहद मर्मस्पर्शी सीन इस फिल्म में रचे हैं। उम्र के साथ साथ शरीर से भी बढ़ते जा रहे अर्जुन कपूर का करीब करीब डूब चुका करियर इस फिल्म में रकुल प्रीत, जैकी भगनानी और मुदस्सर अजीज ने बचाया है। अर्जुन को लाखों में सिमट गई अपनी पिछली फिल्म ‘लेडी किलर’ सपने में डराती रहती है और इसीलिए मेहनत भी उन्होंने फिल्म में काफी की है। शायद ये पहली फिल्म होगी जिसमें अर्जुन कपूर को परदे पर देखकर लगता नहीं कि वह एक्टिंग कर रहे हैं। अंकुर चड्ढा बनने में कामयाब रहे अर्जुन की जोड़ी बस हर्ष गुजराल के साथ नहीं बनानी चाहिए थी।
हर्ष गुजराल को इस फिल्म में ‘इंट्रोड्यूस’ किया गया है। परदे पर वह ऐसा दिखाते हैं जैसे एक्टिंग उनका पुश्तैनी पेशा रहा है। फैमिली ऑडियंस के बीच हिंदी का एक भी स्टैंड अप कॉमेडियन अपनी जगह अब तक नहीं बना पाया है। जाकिर हुसैन कुछ हद तक इसमे कभी कभी कामयाब हो जाते हैं लेकिन उनको देखते हुए खतरा बना ही रहता है कि पता नहीं कब ये लड़का (या आदमी) एकदम से सख्त हो जाए। फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट अच्छी है। शक्ति कपूर की तीसरी या चौथी पारी जो भी हो फिल्म ‘एनिमल’ के बाद जमने लगी है। बस ये ‘आऊ’ वाला बैकग्राउंड म्यूजिक अब उन पर सूट नही करता। स्टुअर्ट इदुरी को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। फिल्म के सारे गाने, सब धान 22 पसेरी वाले हैं। एक भी महकने वाला नहीं। लंबाई फिल्म की थोड़ी ज्यादा है। दो घंटे पांच मिनट की ये फिल्म परफेक्ट होती। इसके बावजूद फिल्म मनोरंजक है और वीकएंड में अपने साथी के साथ टाइमपास के लिए देखी जा सकती है।