Match Fixing Review: मनमोहन सिंह सरकार ने की पाकिस्तान से ‘मैच फिक्सिंग’? साल की पहली हिंदी फिल्म का बड़ा सवाल
नया साल नई उम्मीदें लेकर आता है। लेकिन, हिंदी सिनेमा अब अजब प्रेम की गजब कहानी बनता जा रहा है। साल की पहली ही हिंदी फिल्म ऐसी है, तो भगवान जाने पूरा साल कैसा होगा? बीते साल ‘द साबरमती रिपोर्ट’, ‘बस्तर ए नक्सल स्टोरी’ जैसी फिल्मों का टिकट खिड़की पर जो हाल हुआ, वह सिनेमा को सॉफ्ट पॉवर मानकर देश दुनिया को भारतीय राजनीति की एक अलग ही तस्वीर दिखाने की कोशिश में लगे लोगों के लिए एक सबक होना चाहिए। ऐसी फिल्मों की ताजा कड़ी बनकर आई है फिल्म, ‘मैच फिक्सिंग’। फिल्म के बारे में प्रचार इतना ढीला है कि पहली बार में किसी भी दर्शक को लग सकता है कि ये किसी क्रिकेट मैच के नतीजों की फिक्सिंग पर बनी फिल्म है। ये तो सिनेमाहॉल जाकर पता चलता है कि मामला मालेगांव ब्लास्ट, कर्नल पुरोहित, अभिनव भारत, साध्वी प्रज्ञा और मुंबई हमले का है।
खबर जैसा सच नहीं, कहानी जैसा झूठ भी नहीं
मुंबई पर आतंकी हमला अमेरिका के न्यूयॉर्क में ट्विन टॉवर्स पर हुए आतंकी हमले से बड़ा था, फिल्म ‘मैच फिक्सिंग’ देखने का ये लब्बोलुआब है। और, दूसरी बात ये कि फिल्म ये भी बताती है कि अगर कर्नल पुरोहित को केंद्र में बैठे कांग्रेस नेताओं के इशारे पर गिरफ्तार न किया गया होता तो उन्होंने पाकिस्तान की इस पूरी साजिश की फाइल तैयार कर ली थी और हो सकता है समय रहते इस साजिश का भंडाफोड़ हो जाने से मुंबई हमला न होता। कांग्रेस पार्टी का नाम फिल्म में बदल दिया गया है। किसी तरह की कानूनी अड़चन से बचने की जुगत फिल्म बनाने वालों ने यही निकाली है। लेकिन जिस बात पर ये फिल्म बनी है, अगर ये बात सच है तो ये बहुत बड़ी बात है। और, अगर इसके प्रमाण हैं तो फिर परदे पर दिख रहे नेताओं पर तो देशद्रोह का मुकदमा आसानी से चल सकता है।
ऐसे कैसे बनेगा सिनेमा सॉफ्ट पॉवर?
लेकिन, फिल्म बनाना और जिस कहानी को सच्ची कहानी मानकर उसे फिल्म बनाने वाले दर्शकों को दिखाना चाहते हैं, उस पर खुद फिल्म बनाने वाले ही कहां टिके रहते हैं? फिल्म शुरू होने से पहले ही एक लंबा चौड़ा अस्वीकरण (डिस्क्लेमर) दिखाने-सुनाने की भारतीय सिनेमा में नई परंपरा बनी है। इसके अनुसार फिल्म ‘मैच फिक्सिंग’ भी पूरी तरह से काल्पनिक फिल्म है। तो फिर भैया, फिल्म बनाई ही क्यों? और क्यों दर्शकों का ढाई घंटा इतनी वाहियात काल्पनिक कहानी दिखाने में जाया किया? पल्लवी गुर्जर नामक निर्माता ने केदार प्रभाकर गायकवाड़ नामक निर्देशक के साथ मिलकर फिल्म ‘मैच फिक्सिंग’ बनाई है। दोनों का नाम शायद ही सिनेमा के किसी सुधी दर्शक ने इससे पहले सुना हो।
जो कुछ है, बस विनीत ही हैं
फिल्म ‘मैच फिक्सिंग’ देखने का अपना चाव इसके हीरो विनीत कुमार सिंह को लेकर रहा। विनीत 23 साल से बड़े परदे पर अपनी छाप छोड़ने में लगे हैं। लोग उनको पहचानने भी लगे हैं। काम भी वह अच्छा ही करते हैं, लेकिन खराब फिल्मों में। हीरो वाली एक सुपरहिट फिल्म की तलाश करते करते विनीत अब 46 साल के हो चुके हैं। उनके अभिनय पर इस उम्र का असर भी दिखने लगा है लेकिन फौज की वर्दी पहनकर, मराठी के संवाद बोलकर, एटीएस की पिटाई के समय बिल्कुल असली जैसी कराह निकालकर विनीत ही हैं जो इस पूरी फिल्म को आखिर तक देखने की वजह बने रहते हैं। विनीत का अभिनय अच्छा है। किरदार में ढलने का उनका पूरा ब्रेकअप भी अच्छा है। बस कहीं कहीं उनको युवा हीरो दिखाने के चक्कर में जो अतरंगी कपड़े उनको पहनाए गए हैं, वे ठीक नहीं हैं।
मनमोहन सिंह के कपड़े उतारती फिल्म
फिल्म ‘मैच फिक्सिंग’ में दिखाए गए बाकी सारे कलाकार उन किरदारों के कार्टून जैसे लगते हैं जिनकी असल जिंदगी से लिए किस्सों पर ये फिल्म बनी है। मोहन जोशी को परवेज मुशर्रफ के किरदार में सोचने वाली टीम ने फिल्म कैसी बनाई होगी, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। सोनिया गांधी, पी चिदंबरम, ए के एंटनी, करकरे, ओंबले सब किसी कॉमिक स्ट्रिप से निकले किरदार नजर आते हैं। फिल्म का केंद्र मनमोहन सिंह सरकार की नाकामी को उजागर करना ज्यादा दिखता है। अभी उनके निधन को समय ही कितना बीता है। उनके स्मारक को लेकर चल रही खींचतान भी देश भूला नहीं है और उसी प्रधानमंत्री के कपड़े उतारने को ये देश ऐसा सिनेमा बना रहा है।
एक फीसदी आबादी तक भी पहुंचना मुश्किल
सियासी संवाद एक दूसरे की प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाए बिना भी हो सकता है। लेकिन, फिल्म ‘मैच फिक्सिंग’ जैसा सिनेमा, जिस तरह का संवाद बनाने की कोशिश कर रहा है, उसमें वह सफल हो पाएगा, इसमें संदेह है। सिनेमा देखने वाले और सियासत में रुचि रखने वालों का तबका देश में पूरी तरह अलग है। किसी फिल्म को हिट कराने के लिए 150 करोड़ की आबादी वाले देश में सिर्फ दो करोड़ लोगों को इसकी टिकट खरीदना काफी है। इतनी ही टिकटें बेचकर ‘पुष्पा 2’ ने 1200 करोड़ कमा लिए हैं, लेकिन इतने बड़े देश में क्या इस तरह का सिनेमा देखने वाले दो फीसदी लोग भी हैं? और, अगर नहीं है तो फिर ये सॉफ्ट पॉवर विकसित करने का मकसद क्या है?
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