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Film Review: ‘मातृ’ में न पूरा सच, न पूरी फतांसी
रवि बुले
Updated Fri, 21 Apr 2017 10:33 AM IST
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मातृ
निर्माताः सीडीबी म्यूजिकल/अंजुम रिजवी
निर्देशकः अश्तर सईद
सितारेः रवीना टंडन, दिव्या जगदाले, मधुर मित्तल, रुशद राणा
रेटिंग *1/2
रवि बुले
हाल के समय में स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा के विषय पर जो चर्चित फिल्में आई हैं, उनमें मातृ सबसे कमजोर है। मातृ हालात का सच दिखाने की कोशिश करती शुरू होती है और क्रमशः फिल्म हो जाती है।
इंटरवेल से बढ़ते हुए अंत तक आधा दर्जन से ज्यादा बलात्कारियों और राज्य के मुख्यमंत्री की हत्या होती है। हत्याओं का अंदाज ऐसा कि उन्हें अंजाम देती नायिका पर अंगुली तक नहीं उठती। अपराधी-पुलिस-राजनीति के गठबंधन में यहां पुलिस कमजोर और हताश है। मातृ में न तो कथा की चमक है और न पटकथा का शिल्प। रह जाती हैं रवीना टंडन।
एक दशक पहले पारी समेट चुकीं रवीना दूसरी पारी में अपने अभिनय से न संवेदना जगाती हैं और न ऐक्शन से थ्रिल। फिल्म के बेहद निराशाजनक होने की वजह सेंसर की कैंची को बताया जा सकता है, परंतु जो सामने आता है वह बांधने में नाकाम है।
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अमेरिकी फिल्म निर्माता-लेखक माइकल पैलिको ने मातृ लिखी है लेकिन कथा-पटकथा में नयापन या विशेषता नहीं है। कहानी में प्रतिशोध के दृश्य दोहराते रहते हैं। यह नहीं भूला जा सकता कि बदले की ऐसी कहानियां दर्शकों ने खूब देखी हैं। अश्तर सईद के निर्देशन में कोई अलग अंदाज-ए-बयां नहीं है।
ये भी पढ़ें - सोनू निगम को लेकर लाइव शो में भिड़े अभिजीत भट्टाचार्य और मौलाना कादरी
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निर्देशकः अश्तर सईद
सितारेः रवीना टंडन, दिव्या जगदाले, मधुर मित्तल, रुशद राणा
रेटिंग *1/2
रवि बुले
हाल के समय में स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा के विषय पर जो चर्चित फिल्में आई हैं, उनमें मातृ सबसे कमजोर है। मातृ हालात का सच दिखाने की कोशिश करती शुरू होती है और क्रमशः फिल्म हो जाती है।
इंटरवेल से बढ़ते हुए अंत तक आधा दर्जन से ज्यादा बलात्कारियों और राज्य के मुख्यमंत्री की हत्या होती है। हत्याओं का अंदाज ऐसा कि उन्हें अंजाम देती नायिका पर अंगुली तक नहीं उठती। अपराधी-पुलिस-राजनीति के गठबंधन में यहां पुलिस कमजोर और हताश है। मातृ में न तो कथा की चमक है और न पटकथा का शिल्प। रह जाती हैं रवीना टंडन।
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एक दशक पहले पारी समेट चुकीं रवीना दूसरी पारी में अपने अभिनय से न संवेदना जगाती हैं और न ऐक्शन से थ्रिल। फिल्म के बेहद निराशाजनक होने की वजह सेंसर की कैंची को बताया जा सकता है, परंतु जो सामने आता है वह बांधने में नाकाम है।
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अमेरिकी फिल्म निर्माता-लेखक माइकल पैलिको ने मातृ लिखी है लेकिन कथा-पटकथा में नयापन या विशेषता नहीं है। कहानी में प्रतिशोध के दृश्य दोहराते रहते हैं। यह नहीं भूला जा सकता कि बदले की ऐसी कहानियां दर्शकों ने खूब देखी हैं। अश्तर सईद के निर्देशन में कोई अलग अंदाज-ए-बयां नहीं है।
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मातृ
मातृ दिल्ली में एक स्कूल के वार्षिक समारोह से लौटतीं मां-बेटी, विद्या चौहान-दिव्या (रवीना टंडन-दिव्या जगदाले) से शुरू होती है। देर रात में ट्रेफिक जाम की वजह से दोनों अपनी कार सूनसान रास्ते से निकालने की सोचती हैं और मुख्यमंत्री के बिगडैल बेटे तथा उसके दोस्त अपनी कार से उन्हें टक्कर मारकर उठा लेते हैं। उनका रेप करते हैं और अंत में वापस यह सोच कर फेंक आते हैं कि वे मर चुकी हैं।
परंतु विद्या चौहान जिंदा है। हाई प्रोफाइल नाम जुड़ने से पुलिस मामला रफा-दफा करना चाहती है मगर विद्या चौहान बलात्कारियों और बेटी के हत्यारों से बदला लेने की ठान लेती है। एक के बाद एक हत्याएं और कोई सुराग नहीं। कहानी में विद्या की सहेली, विद्या के पति और दिव्या की एक सहपाठी भी आती है परंतु ये किरदार मुख्य कथा को मजबूती नहीं देते।
मातृ किसी फिल्मी रीमिक्स जैसी लगती है। वह न क्रूरता के खिलाफ गवाही दे पाती है और न प्रतिशोध की फिल्मी फंतासी रचती है। रवीना के लिए मातृ केवल व्यक्तिगत संतोष का सबब है। बेहतर नई पारी की उम्मीद नहीं।
जो दर्शक हार्ड हिटिंग फिल्में देखना पसंद करते हैं, जिन्हें नए स्त्री विमर्श की हालिया फिल्में भाई हैं, वे भी मातृ से निराश होंगे। फिल्म का कैमरा वर्क और रंग इसे किसी प्रकार से निखारने में नाकाम हैं। संगीत भी कमजोर है।
ये भी पढ़ें - मॉडलिंग के दिनों में ऐसी दिखती थीं दिशा पटानी, पहचान नहीं पाएंगे
परंतु विद्या चौहान जिंदा है। हाई प्रोफाइल नाम जुड़ने से पुलिस मामला रफा-दफा करना चाहती है मगर विद्या चौहान बलात्कारियों और बेटी के हत्यारों से बदला लेने की ठान लेती है। एक के बाद एक हत्याएं और कोई सुराग नहीं। कहानी में विद्या की सहेली, विद्या के पति और दिव्या की एक सहपाठी भी आती है परंतु ये किरदार मुख्य कथा को मजबूती नहीं देते।
मातृ किसी फिल्मी रीमिक्स जैसी लगती है। वह न क्रूरता के खिलाफ गवाही दे पाती है और न प्रतिशोध की फिल्मी फंतासी रचती है। रवीना के लिए मातृ केवल व्यक्तिगत संतोष का सबब है। बेहतर नई पारी की उम्मीद नहीं।
जो दर्शक हार्ड हिटिंग फिल्में देखना पसंद करते हैं, जिन्हें नए स्त्री विमर्श की हालिया फिल्में भाई हैं, वे भी मातृ से निराश होंगे। फिल्म का कैमरा वर्क और रंग इसे किसी प्रकार से निखारने में नाकाम हैं। संगीत भी कमजोर है।
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