Khichdi 2 Review: खिचड़ी से दर्शकों का हाजमा खराब, कमजोर कहानी ने बिगाड़ा मिशन पांथुकिस्तान
सीरियल 'खिचड़ी' छोटे पर्दे का काफी लोकप्रिय शो रहा हैं। इसी शो से प्रेरित होकर शो के मेकर्स ने साल 2010 में फिल्म 'खिचड़ी' का निर्माण किया था, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया था। अब 13 साल के बाद 'खिचड़ी 2-मिशन पांथुकिस्तान' रिलीज हो चुकी हैं, लेकिन यह फिल्म 'खिचड़ी' के मुकाबले काफी कमजोर फिल्म है। जब टेलीविजन पर ऐसे शो की बात आती है तो दर्शक ऐसी हास्यास्पद कहानियों को खुशी-खुशी स्वीकार कर लेते हैं, वहीं जब फिल्म की बात आती है तो दर्शकों की अपेक्षाएं थोड़ी सी बढ़ जाती है। ऐसी कहानियों को फिल्म देखने वाले दर्शक तभी स्वीकार करेंगे,जब फिल्म अच्छी तरह से लिखी गई हो, लेकिन इस मामले में फिल्म की कहानी इतनी हल्की है कि दर्शक एक मोड़ पर आकर बोर होने लगते हैं। यह फिल्म कम, बल्कि स्टैंडप कॉमेडी शो ज्यादा लगता है, जिसे छोटे पर्दे पर ही देखना अच्छा लग सकता है।
फिल्म 'खिचड़ी 2' की कहानी एक काल्पनिक देश पांथुकिस्तान पर आधरित हैजिसे भारत और पाकिस्तान को आजादी मिलने के बाद 16 अगस्त को आजादी मिली है। इस देश का एक तानाशाह शासक वहां की लड़कियों को कोई आजादी नहीं देता। पांथुकिस्तान के अंदर कोई भी अपनी मर्जी से कोई काम नहीं कर सकता है, वहां के लोग सिर्फ तानाशाह की ही तारीफ करते हैं। उस तानाशाह ने भारत के एक वैज्ञानिक को बंदी लिया है, जिसे छुड़वाने के लिए 'थोड़ी इंटेलीजेंस एजेंसी' पारेख परिवार को पांथुकिस्तान भेजती है। पारेख परिवार के एक सदस्य प्रफुल्ल की शक्ल उस तानाशाह से मिलती है। पारेख परिवार उस तानाशाह को अगवाह करके, प्रफुल्ल को उस तानाशाह की गद्दी पर बिठाकर उस वैज्ञानिक को छुड़ाना चाहते हैं। अब इस पूरे मिशन में क्या खिचड़ी पकती है, यही इस फिल्म की कहानी है।
फिल्म के निर्देशक आतिश कपाड़िया ने ही फिल्म की पटकथा और डायलॉग लिखे हैं। इस बार खिचड़ी के मिशन पर वह ऐसी कमजोर कहानी लेकर निकले हैं जो दर्शकों को बांध नहीं पाती है। फिल्म में जोक्स की भरमार है,ऐसा लगता है कि हम फिल्म नहीं बल्कि कोई स्टैंडअप कॉमेडी शो टेलीविजन के स्क्रीन पर देख रहे हैं। फिल्म के शुरुआत के तीस मिनट तक तो जोक्स अच्छे लगते हैं, लेकिन बाद में जोक्स सुनकर बोरियत महसूस होने लगती है। तीस मिनट के बाद फिल्म की कहानी अपनी रफ्तार खोने लगती है और यह सिलसिला इंटरवल के बाद भी कायम रहता है।
फिल्म के मेकर्स ने रिलीज से पहले ही इस बात का एलान कर दिया था कि 'खिचड़ी 2' को देखने के लिए दिमाग घर पर रख कर आइये। इस फिल्म को बड़े ही भव्य स्तर पर शूट किया गया। भव्यता के साथ -साथ अगर फिल्म की कहानी और पटकथा पर थोड़ा सा ध्यान दिया गया होता तो यह एक अच्छी फिल्म बन सकती थी। लेकिन यह फिल्म नहीं बल्कि जोक्स की चित्रावली लगती है।
फिल्म की कहानी कमजोर होने के बावजूद फिल्म के कलाकारों ने अपने अभिनय से फिल्म को संभालने की कोशिश बहुत की है। हंसा की भूमिका में सुप्रिया पाठक कपूर का काम उम्दा है। हिमांशु की भूमिका निभा रहे जमनादास मजेठिया की हंसा के साथ जुगलबंदी मजेदार है। इस बार राजीव मेहरा ने प्रफुल्ल की भूमिका के साथ पांथुकिस्तान के तानाशाह की भूमिका निभाई है। दोनों किरदार में उनका परफॉर्मेंस ठीक रहा। बाबूजी की भूमिका में अनंग देसाई, जयश्री की भूमिका में वंदना पाठक का काम सराहनीय है। परमिंदर की भूमिका में कीर्ति कुल्हारी पहली फिल्म 'खिचड़ी' से बेहतर लगी हैं। प्रतीक गांधी पायलट और कीकू शारदा रोबोट बने हैं। इनकी प्रतिभा का सही इस्तेमाल करने से निर्देशक चूक गए। सबसे ज्यादा निराशा इस फिल्म में फराह खान को देखकर हुई।
फिल्म में विजय जीआर सोनी की सिनेमैटोग्राफी अच्छी है, शहरों की हलचल से लेकर वर्फ से ढके पहाड़ और झुलसते हुए रेगिस्तान के दृश्य को बहुत ही खूबसूरती के साथ फिल्माया है लेकिन अजय ए. कुमार का संपादन सुस्त है। राज शिंदे के एक्शन और स्टंट दृश्य प्रभावशाली हैं। चिरंतन भट्ट के संगीत निर्देशन में बने दो गाने 'वंदे राका' और 'नाच नाच' कर्णप्रिय हैं। इन गानों को गणेश आचार्य ने बहुत ही खूबसूरती के साथ फिल्माया है। राजू सिंह का बैकग्राउंड स्कोर ठीक ठाक है। लेकिन सवाल सौ करोड़ का वही है कि इसे सिनेमाघर में देखने कोई क्यों आएगा?