Joram Review: मनोज बाजपेयी का विचलित कर देने वाला अभिनय उतरा सिनेमा ‘पार’, देव को चाहिए दर्शकों का आशीष
फिल्म ‘जोरम’ देश के उस कालखंड की एक सच्ची तस्वीर है, जिसमें विकास के नाम पर पर्यावरण को हो रहे नुकसान की बात करना भी ‘गुनाह’ है। सुरंगों में फंसे मजदूरों की कहानियां भी लोग कुछ दिन बाद भूल ही जाते हैं। फिर न ‘मिशन रानीगंज’ देखने लोग सिनेमाघरों में आते हैं और न ‘जोरम’। इस साल की सबसे कमाल फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ में की गई गलती को दोहराने से बचने के लिए जी स्टूडियोज ने ‘जोरम’ को सिनेमाघरों तक पहुंचाने की ठानी है। फिल्म के प्रेस शो से पहले इसके मार्केटिंग हेड नीरज जोशी सबको बताते भी हैं कि उनकी कंपनी एक तरफ ‘गदर 2’ बना रही है तो उनकी निगाह में ‘जोरम’ जैसी फिल्में भी रहती हैं। सिनेमा के प्रति उनका समर्पण आगे भी जारी रहे, इसके लिए जरूरी है इस तरह की फिल्मों का चलना। इशारा यही है कि सिर्फ मुनाफे पर चलने वाले सिनेमाई कारोबार में वह जोखिम लेने को तैयार हैं बशर्ते वे दर्शक भी घरों से निकलकर सिनेमाघरों तक आएं जिन्होंने अपने जीवन के बीते छह दिन संदीप रेड्डी वंगा को ‘सबसे वाहियात फिल्म निर्देशक’ बताने में खर्च कर दिए हैं। विदेश का सिनेमा खांचों में बंटा सिनेमा है, वहां फिल्में लक्षित दर्शकवर्ग के लिए बनती हैं। भारत में इन बुद्धजीवी दर्शकों को हर फिल्म अपनी पसंद की चाहिए, जो बदलते दौर में अब मुमकिन नहीं है।
खैर, लौटकर फिल्म ‘जोरम’ पर आते हैं। जल और जंगल की लड़ाई लड़ते दलम् और इलाके के नेताओं को एक तराजू पर तौल देने वाली ये फिल्म हर उस शख्स के दिल को छू जाने वाली है जिसने विकास की राजनीति को अपने गांव, कस्बे और शहर के आसपास महसूस किया है। आदिवासियों को अपनी जमीन इस्पात कंपनी को बेच देने के लिए उकसाते एक युवक को माओवादी सरेआम उल्टा लटकाकर उसकी चमड़ी कील लगे डंडे से उधेड़ देते हैं। वह ‘उदाहरण’ बनाना चाहते हैं। बेटा मरता है तो उसकी मां, माओवादियों से बदला लेने निकलती है। दसरू भी कभी जंगल पार्टी में था। इस घृणित कांड के बाद वह शहर भाग जाता है। लेकिन, बेटे को खोकर संवेदनहीन हो चुकी मां का बदला उसका पीछा करता वहां तक आता है। इसके बाद की फिल्म दसरू के अपनी दुधमुंही बच्ची के साथ भागते रहने, उसके पीछे लगे मुंबई के दरोगा के सिस्टम से जूझते रहने और झारखंड में हुए विकास की असली तस्वीर दिखाने में बीतती है।
फिल्म ‘जोरम’ अगर आप खालिस मनोरंजन के लिए देखना चाहते हैं तो इससे दूर रहिए क्योंकि मनोरंजन के नाम पर लोग ‘एनिमल’ देखते हैं और उसमें सामाजिक प्रतिबद्धता खोजने की कोशिश करते हैं। और, सामाजिक प्रतिबद्धता दिखाने के लिए बनी फिल्म ‘जोरम’ में ऐसे दर्शक मनोरंजन तलाशने चले आएंगे। ये नई सदी के सिनेमा की सबसे बड़ी त्रासदी है। ये जिस इरादे से बनता है, उस इरादे को ही दर्शकों को बताने में चूक जाता है। ‘जोरम’ बनाने वाले देवाशीष मखीजा उन गिने चुने फिल्म निर्देशकों में है जिन्होंने अपनी शुरुआत यशराज फिल्म्स से की और मसाला फिल्मों की इस सबसे बड़ी चक्की से निकलकर ‘ऑर्गेनिक आटा’ बेचने की हिम्मत की है। लेकिन, वह अपनी फसल खुद उगाने में यकीन रखते हैं। इसमें गोबर की खाद भी है और नीम की पत्तियों को उबाल कर बना कीटनाशक भी है। उनके सिनेमा में केमिकल्स नहीं हैं, सो वैसा कोई लोचा भी यहां नहीं है। ‘ऊंगा’ से लेकर ‘भोसले’ होते हुए ‘जोरम’ तक आना देवाशीष के सिनेमा की ऐसी जीत है, जिस पर तालियां बजाने वाले चंद वही लोग हैं जिनमें सिनेमा की कद्र अब भी बाकी है।
फिल्म ‘जोरम’ दर्शकों को सफलतापूर्वक शीर्षासन कराने में कामयाब रहती है। ये फिल्म कमर्शियल सिनेमा देखकर सिनेज्ञानी बनने वालों के खून का दौड़ान भी दिल की बजाय दिमाग तक ले जाने में भी शायद सफल रहे और ऐसा हो सके तो ये फिल्म भी सुपरहिट हो सकती है। लोहे की खदानों के बीच खड़ा विशालकाय वृक्ष का एक ठूंठ इस फिल्म का सबसे बड़ा बिम्ब है। देखने में यह वही पेड़ लगता है जिस पर माडवी को उल्टा लटकाया गया था। इसी के आसपास कहानी अपने उपसंहार को हासिल होती है लेकिन दसरू की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। वह अब भी भाग रहा है। वैसे ही जैसे इस देश का एक बड़ा तबका भाग रहा है। वह गांव से भागकर शहर आता है रोजी रोटी कमाने। फिर उसे मिलती 500 आईक्यू वाली ऑक्सीजन तो वह फिर गांव की तरफ भागता है। इस बार गांववाले घात लगाए बैठे हैं। उनके लिए शहर से आने वाला हर कोई बस एक ‘शिकार’ है, क्योंकि ‘जोरम’ के सैमसन की तरह उसे भी अपना परिवार पालना है और जिंदा भी रहना है। इस देश के करोड़ों दसरू लौटकर गांव जाना चाहते हैं। वहां की ‘सरकार’ से खुद को बख्श देने की गुहार भी लगाने को तैयार हैं। रत्नाकल बागुल जैसे ईमानदार लेकिन काम के बोझ के तले दबे सरकारी कर्मचारी उनके मददगार भी बनने को तैयार हैं, लेकिन हर बदलाव ‘ऊपर’ कहीं अटका है। और, ऊपर तो वैसे ही लोग हैं जैसी ‘जोरम’ की फूलो करमा है।
मनोज बाजपेयी इस दौर के नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी बन चुके हैं। ‘जोरम’ देखते हुए मुझे बार बार 1984 में रिलीज हुई फिल्म ‘पार’ याद आती रही। वहां नसीर और शबाना का जो संघर्ष है, उसे मनोज बाजपेयी ने अकेले इस फिल्म में जिया है। वहां शबाना के पेट मे बच्चा था, यहां मनोज की पीठ उसके बोझ से झुकी झुकी रहती है। झारखंड के आदिवासी दसरू की ये भूमिका मनोज बाजपेयी के दमदार किरदारों में एक अलग ही आभामंडल के लिए याद की जाएगी। दसरू की जिजीविषा को अपने अभिनय से उन्होंने अमर कर दिया है। अगर देवाशीष की इस फिल्म मे काम करने से मनोज मना करते तो उनका ऑप्शन बी क्या रहा होगा, ये तो पता नहीं, लेकिन फिल्म देखने के बाद ये तो तय दिखता है कि ऐसा कोई ऑप्शन बी फिलहाल हिंदी सिनेमा में नहीं है। ये किरदार बना ही मनोज बाजपेयी के लिए है। ऐसी फिल्में कभी कभार ही बनती हैं जो सिर्फ इसके मुख्य कलाकार का अभिनय देखते रहने के लिए दर्शक को शुरू से अंत तक बांधे रहती हैं। फिल्म ‘जोरम’ एक पाठशाला है, अभिनय की, निर्देशन की, कथा कहन की और सामाजिक प्रतिबद्धताओं वाले सिनेमा की।
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ये हीरो ‘टॉक्सिक’ नहीं है, लेकिन...!
मनोज बाजपेयी और देवाशीष इस फिल्म को लेकर दुनिया के तमाम फिल्म समारोहों में घूम आए हैं। तारीफें बटोर लाए हैं। मामी जैसे दिखावटी फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म का प्रीमियर हो चुका है, लेकिन इसे इस देश के दर्शकों तक पहुंचना अभी बाकी है। सिनेमाघरों में फिल्म का भविष्य क्या होगा, ये ‘एनिमल’ को कोसने वाले दर्शक तय करेंगे। लेकिन, जी स्टूडियोज ने भी फिल्म के बारे में दूर दराज के दर्शकों का ज्ञानवर्धन करने के लिए ज्यादा कुछ किया नहीं है। फिल्म की तस्वीरें तक मुहैया कराने की उनकी पीआर टीम को फिक्र नहीं है। ‘जोरम’ जैसी फिल्में देखने तक दर्शक अक्सर इसलिए भी नहीं पहुंच पाते हैं क्योंकि ऐसी फिल्मों के तमाम दर्शकों की भाषा अंग्रेजी नहीं है और फिल्म बनाने वालों की नजर में अंग्रेजीदां दर्शक की तारीफ के आगे उनकी तारीफ की कोई अहमियत भी नहीं हैं। सो, ‘जोहार’! और, करते रहिए बहस ‘टॉक्सिक’ हीरो और ‘वायलेंट’ सिनेमा पर क्योंकि ‘जोरम’ जैसी फिल्में तो आप ओटीटी पर भी देख सकते हैं।