आयुष्मान की 'हवाईजादा' हवा में उड़ जाएगी या..
अगर आप जानते हैं कि दुनिया का पहला हवाई जहाज अमेरिका के राइट बंधुओं ने उड़ाया था तो अपकी जानकारी बिल्कुल दुरुस्त है। इसे ही बनाए रखें और किसी क्विज में हिस्सा लेते हुए यही जवाब दें।
निर्देशक विभु पुरी फिल्म हवाईजादा में 1895 के मुंबई की कहानी कहते हुए बताते हैं कि दुनिया का पहला विमान एक हिंदुस्तानी शिवकर तलपडे ने जुहू चौपाटी पर उड़ाया था। मगर अंग्रेज खलनायक थे जो नहीं चाहते थे कि किसी भारतीय के नाम ऐसा रिकॉर्ड दर्ज हो। अतः दुनिया को उन्होंने इसकी खबर नहीं लगने दी। फिल्म में आयुष्मान खुराना के अलावा पल्लवी शारदा और मिथुन चक्रवर्ती मुख्य भूमिकाओं में हैं।
हवाईजहाज के आविष्कार से जुड़ी है फिल्म
विभु की फिल्म बुरी तरह से निराश करती है। कारण यह कि अगर तलपडे को लेकर ऐसा कोई ऐसा तथ्य दर्ज भी है तो वह इसके साथ रत्ती भर न्याय नहीं कर पाते। फिल्म में आपको कहीं महसूस नहीं होता कि आप हवाईजहाज के आविष्कार को देख रहे हैं।
कहीं से पुरी यह नहीं समझा पाते कि तलपडे में हवाई जहाज को बनाने के लिए कैसा जुनून है। कौन से वे कारण हैं जो उन्हें हवाई जहाज बनाने के लिए प्रेरित करते हैं। उलट आप तलपडे को आशिक मिजाज, शराबी युवक के रूप में देखते हैं, जो चौथी कक्षा में आठ बार फेल हो चुका है और एक नाचने वाली पर फिदा है।
रोमांटिक नजरिए से बनी है फिल्म 'हवाईजादा'
हवाईजादा किसी आविष्कारक की कहानी नहीं बल्कि एक दोयम दर्जे के युवक का रोमांटिक सिनेमा बनकर उभरती है ...और इस रोमांस में न कुछ नया, न रोमांटिक। विभु बरसों तक निर्माता-निर्देशक संजय लीला भंसाली के सहायक रहे हैं। उन्होंने भंसाली से किस्सागोई तो सीखी, बल्कि रंग-बिरंगे भव्य सैट बनाने पर ध्यान केंद्रित रखा।
सिनेमा सिर्फ सैट डिजाइनिंग नहीं है। हवाईजादा की रंगीनियत भंसाली की फिल्मों की सस्ती फोटोकॉपी जैसी दिखती है। लेखक-निर्देशक शुरू से अंत तक भ्रम में है कि आखिर क्या दिखाना चाहता है। तलपडे का रोमांस या फिर हवाईजहाज का आविष्कार।
पुरी ने बेहद चलताऊ ढंग से इतिहास को चुनौती देने की कोशिश की है और औंधे मुंह गिरे हैं। फिल्म में बचकाने ढंग से कॉमिक दृश्य पिरोए गए हैं। जिन पर बिल्कुल हंसी नहीं आती, बल्कि खीझ पैदा होती है।
बॉक्स ऑफिस पर क्या कमाल कर पाएगी आयुष्मान की फिल्म?
विक्की डोनर वाले आयुष्मान खुराना के लिए फिल्म खतरे की घंटी है। उनकी पिछली फिल्म बेवकूफियां भी बुरी तरह से पिटी थी। अगर वे ऐसी ही फिल्में चुनते रहे तो बोरिया-बिस्तर बंधने में समय नहीं लगेगा।
नाचने वाली के रूप में पल्लवी शारदा प्रभावित नहीं कर पाती। मिथुन भी मेक-अप लगाए एक नकली किरदार को जीते हुए नजर आते हैं। फिल्म पर रंगमंच का असर दिखता है और इसलिए यह कहीं ज्यादा नकली हो जाती है।
थोड़ी-थोड़ी देर में आने वाला गीत-संगीत कहनी को नहीं बढ़ाता और कुछ जगहों पर यह मंच के म्यूजिकल ड्रामे सरीखा प्रभाव छोड़ता है। असल में कलाकारों का दोष इस फिल्म में कम है क्योंकि हवाईजादा अपने कथानक और ऐतिहासिकता में बेहद लचर है।
यह न तो किसी तरह का ज्ञानवर्द्धन करती है और न ही मनोरंजन। अगर आप कहीं बोर होकर हवाईजादा देखने की योजना बना रहे हैं तो तय मानिए कि आपकी बोरियत दूर नहीं होगी।