Hit The First Case Review: समलैंगिकता के हादसे से मर्डर मिस्ट्री का मजा खराब, असल से कमतर निकली तेलुगू की रीमेक
इंसान कमजोरियों का पुतला है, ये बात दक्षिण भारतीय फिल्मकारों ने शायद कुछ ज्यादा ही मान ली है। उनके हीरो इन दिनों अवसाद से गुजर रहे हैं। कोई न कोई लत पाले रहते हैं। अतीत की कड़वी यादें उनके वर्तमान को ऐसा बना देती हैं कि अच्छा खासा कामकाजी इंसान भी ‘अनफिट’ लगता है। सिनेमा के इन नए नायकों के लिए कर्म ही पूजा है और बाकी सब इसके बाद और इतना सब होने के बाद भी जब दिल पर चोट लगती है तो वे बिलबिला जाते हैं, बिखर जाते हैं। ‘कबीर सिंह’ इसी के चलते शायद युवाओं को पसंद आया हो, फिल्म ‘हिट द फर्स्ट केस’ का विक्रम उसी की फोटोकॉपी सा दिखता है। वह बाजी हाथ से निकलते देख गुस्सा होता है। टेबल पर रखा सामान फेंकता है। लगातार ताने कसने वाले सहयोगी पर हाथ उठाता है। सारा काम अपने अधीनस्थ से कराता है और खुद को एक ऐसे ‘जेम्स बॉन्ड’ की तरह पेश करता है जो घास फूस में भी इशारे ढूंढ लेता है। सिर्फ हवा सूंघ कर वह कातिल का पता लगाने निकल पड़ता है।
जमा नहीं कहानी का फेरबदल
दो साल पहले तेलुगू में रिलीज हुई फिल्म ‘हिट द फर्स्ट केस’ की हिंदी रीमेक की कहानी में इसके लेखक निर्देशक शैलेश कोलानू ने फेरबदल किया है। फिल्म शुरू होते ही जैसे ही इसके ओटीटी पार्टनर का नाम नेटफ्लिक्स आता है तो आशंका वहीं से शुरू हो जाती है और फिल्म के क्लाइमेक्स तक पहुंचते पहुंचते समलैंगिक रिश्तों का जिक्र आ ही जाता है। कहानी इस बार तेलंगाना से निकलकर राजस्थान आई है। निर्देशक को लगता है कि शायद फिल्म का वातावरण देखकर दर्शक घटनाओं की भौगोलिक स्थिति समझ न पाए तो किरदारों से मारवाड़ी में संवाद भी बुलवा लिए हैं। कहानी वही है इसकी ओरिजिनल जैसी। मानसिक आघात से गुजर रहे पुलिस अफसर विक्रम की वह महिला मित्र एकाएक लापता हो जाती है जिसके बार बार कहने पर वो दो महीने की छुट्टी लेकर एकांतवास कर रहा था। एक किशोरी पहले से गायब है। दोनों हादसों के तार जुड़ते दिखते हैं और सस्पेंस ड्रामा का एक अच्छा आधार तैयार करने में शैलेश कामयाब रहते हैं।
मर्डर मिस्ट्री में मर्डर ही नहीं
शैलेश कोलानू का दावा रहा है कि हिंदी रीमेक में उन्होंने तेलुगू की गड़बड़ियों को दूर किया है, लेकिन फिल्म देखकर ऐसा लगता नहीं है। नेटफ्लिक्स वाले फिल्म खरीद लें, इसके चक्कर में उन्होंने फिल्म के क्लाइमेक्स का कबाड़ा कर दिया है। जो फिल्म मर्डर मिस्ट्री होनी चाहिए थी, उसमें कत्ल तो किसी का होता ही नहीं है। और, फिल्म ‘हिट द फर्स्ट केस’ यहीं आकर बैठ जाती है। मूल फिल्म में जो चौंकाने वाला कातिल है, वह यहां पूछताछ में ही सामने आ जाता है। साथी मूल फिल्म में वीडियो संदेश छोड़ता है, यहां वह अपने मन की बात डायरी में लिखकर जाता है। हादसे में हुई एक मौत को एक पुलिस अफसर क्यों छिपाना चाहेगा? इसका स्पष्टीकरण भी फिल्म का हिंदी संस्करण सलीके से पेश नहीं कर पाता है। मूल तेलुगू फिल्म की सीक्वल भी अगले हफ्ते रिलीज होने को है और जहां फिल्म ‘हिट द फर्स्ट केस’ की हिंदी रीमेक खत्म होती है, वहां भी इसके सीक्वल की गुंजाइश छोड़ी गई है।
कमजोर पटकथा और सुस्त निर्देशन
फिल्म ‘हिट द फर्स्ट केस’ के हिंदी संस्करण को अगर तेलुगू से बेहतर बनाने के लिए ही इसे बनाया गया था तो इसके निर्देशक शैलेश कोलानू इसमें विफल रहे हैं। शुरू में फिल्म फ्रेम दर फ्रेम मूल फिल्म की नकल की तरह आगे बढ़ती है। क्लाइमेक्स की मारधाड़ वाला सीन भी हू ब हू कॉपी है। इसका अच्छा असर ये हुआ है कि फिल्म में मुस्लिम पुलिस अफसर इब्राहिम का किरदार भी मूल फिल्म जैसा ही यहां भी आ गया है। किरदार मुस्लिम है तो उसे सिनेमा के तयशुदा खांचे के हिसाब से शक के निशाने पर तो होना ही था। वह कहता भी है, ‘भरोसा करके तो देखिए।’ शक के घेरे में बाकी जो किरदार है, उनके खिलाफ मिलने वाले सबूत सिर्फ कहानी को लंबा करते रहते हैं। फिल्म ‘हिट द फर्स्ट केस’ की कमजोर कड़ी इसकी पटकथा है। मूल फिल्म में तो फिर भी कत्ल का उद्देश्य समझ आता है। यहां तो निर्देशक ने कत्ल की कहानी ही बदल दी है।
कब तक बिकेगा राजकुमार का नाम?
राजकुमार राव के नाम पर लोग अब भी फिल्में देखने सिनेमाघरों में आने को तैयार हैं। उनकी फिल्म ‘रूही’ की ओपनिंग इसका सबूत रही है। वह खुद भी मानते हैं कि अगर उनके नाम पर आने वाले दर्शकों को सही फिल्म नहीं मिली तो वह उनकी फिल्में देखना बंद कर देंगे। इतने समझदार कलाकार को करियर के सबसे नाजुक मोड़ पर सचेत होने की जरूरत है। नाम बहुत दिनों तक काम आता नहीं है। आधा दर्जन के करीब लगातार फ्लॉप फिल्में दे चुके राजकुमार राव हिंदी सिनेमा के व्यस्त कलाकार हैं। लेकिन, उन्हें समझना होगा कि आजमाए मोहरों पर ही दांव लगाने की हिंदी सिनेमा की आदत ही इसके कारोबारी पतन का मुख्य कारण बन रही है। राजकुमार भी अपने अभिनय में बदलाव नहीं ला रहे हैं। दर्शक सीन शुरू होते ही बता सकता है कि उनका किरदार अब कैसे भाव चेहरे पर लाएगा। हाथों के कांपने, जुबान सूखने और गले में कुछ अटकने के भाव लाने की उनकी कोशिशें अब असर नहीं करतीं।
जतिन और मिलिंद की बेहतर अदाकारी
फिल्म ‘हिट द फर्स्ट केस’ में जतिन गोस्वामी और मिलिंद गुणाजी को छोड़ दें तो बाकी सहायक कलाकार फिल्म को खास सहारा देते नहीं दिखते। जतिन गोस्वामी ने ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’ में एक पहचान बनाई है। लोग उन्हें अब चेहरा देखकर पहचान भी जाते हैं। कुछ कुछ नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसी उनकी हरकतें परदे पर रहती हैं। वह खांचे में फिट न होने पाएं, इसी में उनकी जीत होगी। सान्या मल्होत्रा के लिए फिल्म में करने को कुछ खास है नहीं। शिल्पा शुक्ला का किरदार यहां एक तलाकशुदा बीवी का है। अपने से कम उम्र के लोगों से दोस्ती गांठने की उसकी कसक यहां ठीक से उभर नहीं पाई हैं। दलीप ताहिल और राजकुमार राव के बीच जो सबसे बेहतरीन सीन हो सकता था, वह निर्देशक ने यहां उनकी छायाओं के सहारे निपटा दिया है।
देखें कि न देखें
टी सीरीज की फिल्म होने के बावजूद फिल्म ‘हिट द फर्स्ट केस’ के संगीत पर खास मेहनत दिखती नहीं है। भूषण कुमार को इस मामले में अपने पिता गुलशन कुमार के दौर की फिल्मों का संगीत फिर से सुनना चाहिए। रीमिक्स करने के लिए नहीं बल्कि ये समझने के लिए कि हिंदीभाषी क्षेत्रों के दर्शक और श्रोता जो मधुर संगीत सुनते आए हैं, उसे बनाने में वह कहां चूक रहे हैं। मणिकंदन की सिनेमैटोग्राफी फिल्म की पृष्ठभूमि राजस्थान की झलकियां तो दिखाने की कोशिश करती है लेकिन राजस्थान इससे कहीं अधिक खूबसूरत है। फिल्म संपादन में गैरी बीएच ने भी इस बार हाथ ढीला रखा है। सिनेमाघरों में जाकर फिल्म ‘हिट द फर्स्ट केस’ इसके हीरो राजकुमार राव के लिए तो देखी जा सकती है, लेकिन इसका क्लाइमेक्स ऐसा नहीं है जो दर्शकों को हिलाकर रख दे।