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गुड्डू रंगीला: पुराने फार्मूले-पुराना ड्रामा, समीक्षा पढ़कर ही देखें फिल्म

Fri, 03 Jul 2015 07:27 PM IST
Updated Fri, 03 Jul 2015 07:27 PM IST
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Guddu Rangila film review

निर्माताः संगीता अहीर

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निर्देशक-लेखकः सुभाष कपूर
सितारेः अरशद वारसी, अमित साध, अदिति राव हैदरी, रोनित राय
रेटिंग **

जूतों की जोड़ी-सा एक जोड़ा है, गुड्डू-रंगीला। जैसे सफर की सफर की शुरुआत में जूते चमकते हैं और बढ़ते सफर के साथ धूल-मिट्टी उन्हें गंदा करती है, यही इस फिल्म में होता है। सधे हुए स्टार्ट के साथ लगता है कि फिल्म मनोरंजक मुकाम तक ले लाएगी, लेकिन कुछ ही देर में आप पाते हैं कि वही पुराने रास्ते हैं। वही फार्मूले हैं। वही ड्रामा है। वही सस्तापन है।

फंस गए रे ओबामा और जॉली एलएलबी जैसी फिल्में देने वाले सुभाष कपूर निराश करते हैं। फिल्म में देश-काल बंदर की तरह छलांगें मारता है और आप सिनेमाई छूट का बेढंगा इस्तेमाल देख कर हैरान रह जाते हैं।

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क्या है गुड्डू रंगीला की कहानी

Guddu Rangila film review

कहानी माता की मॉडर्न भेंटें गा कर गुजर-बरस करने वाले गुड्डू (अमित साध) और रंगीला (अरशद वारसी) की है। दोनों जिन घरों में जगराते करते हैं, वहां के माल-अलबाब की मुखबिरी गैंगस्टरों से करते हैं। नतीजा यह कि माता के भक्तों के घर में दो-तीन दिन बाद डाके पड़ जाते हैं। धीरे-धीरे मीरपुर नाम की जगह सामने आती है। जहां खाप पंचायत का राज है।

यहां बिल्लू पहलवान (रोनित रॉय) पंचायत के फैसलों पर प्यार करने वालों को मौत की सजा देता रहता है। इस क्रूर और अय्याश आदमी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी है। फिर एंट्री होती है बेबी (अदिती राव हैदरी) की, जिसके अपहरण का ठेका गुड्डू-रंगीला लेते हैं क्योंकि फिरौती में मोटी रकम मिल सकती है!

यह सब स्थापित होने के बाद कहानी बढ़ती है और एक-एक कर कुछ राज खुलते हैं। खाप पंचायत ठेठ खलनायक की तरह उभरती है।

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क्या है क्लाइमेक्स, जान लीजिए

Guddu Rangila film review

निर्देशक ने सब कॉमिक अंदाज में कहने की कोशिश की है। परंतु कई जगह बुरी तरह उलझ गए हैं। उनकी उलझन दर्शक को उलझाती है। रंगीला एक सीन में शिमला से सैकड़ों मील दूर सीधे मीरपुर में बिल्लू पहलवान के घर में दिखता है और दूसरे सीन में फिर शिमला पहुंच जाता है!

अंत में हीरोइन गोली से घायल गुड्डू को संभाल रही है और पल भर में बिल्लू पहलवान पर गोली बरसाती दिखती है! ऐसे ही कुछ और भी दृश्य हैं। जो सिनेमाई छूट के नाम पर सिनेमा का मजाक उड़ाते हैं। अरशद फिल्म को अपने दम पर खींचते हैं क्योंकि अमित साध के पास कॉमिक टाइमिंग नहीं है। रोनित की खलनायकी प्रभावित करती है।

जबकि अदिति अपने काम सही ढंग से निभा गई हैं। माता का ई-मेल गीत के अलावा कोई गीत ध्यानाकर्षित नहीं करता। कुल मिला कर मामला गड्डमड्ड है। किसी सुलझी हुई फिल्म का इंतजार बेहतर रहेगा।

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