Fly Me To The Moon Review: स्कारलेट जोहानसन की ऑस्कर विनिंग अदाकारी, सिनेमा के सॉफ्ट पॉवर का यही है असली सबक
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अपोलो इलेवन की लॉन्चिंग हो रही है। नासा स्टेशन डायरेक्टर का तनाव समझ आ रहा। पूरे अमेरिका से आए पांच लाख के करीब पुर्जों को उनकी पूरी टीम ने जांचा-परखा और उनके सही होने की पुष्टि की है। काउंटडाउन शुरू होने से पहले स्टेशन डायरेक्टर इसके बावजूद अपनी हर टीम से ‘गो’ (हां) या ‘नो गो’ (ना) की हामी भरवा रहे हैं। पीछे दर्शक दीर्घा में फिल्म के दो अहम किरदार बातें कर रहे हैं और इस बहाने दर्शकों को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत में लोकतंत्र की ताकत समझा रहे हैं, “इस वक्त कोई भी तकनीशियन ‘नो गो’ कहकर ये लॉन्च रोक सकता है।” फिल्म ‘फ्लाई मी टू द मून’ में इंसानियत के मासूम पहलू को सामने लाते ऐसे तमाम लम्हें हैं जिन्हें देखकर लगता है जैसे कहानी कहीं हमारे आसपास ही घट रही है।
रूस और अमेरिका की स्पेस रेस
कहानी उस दौर की है जब रूस का उपग्रह स्पुतनिक अंतरिक्ष में जा चुका है। रूस इंसान को भी अंतरिक्ष में भेज चुका है। अमेरिका दबाव में है। वह उसी दशक में चांद पर पहुंचने का बड़ा एलान करता है। लेकिन, अपोलो वन धरती छोड़ने से पहले ही दग जाता है। उसके तीनों अंतरिक्ष यात्री मारे जाते हैं। अब अपोलो एलेवन तक तैयारी आ चुकी है। स्टेशन डायरेक्टर कोल डेविस जबर्दस्त दबाव में काम कर रहा है। एक शाम उसे एक खूबसूरत महिला मिलती है। दोनों के बीच कुछ ‘स्पार्क’ होता है। लेकिन, इस आग को वही दबाकर वह नासा लौट आता है। नासा में उसे वही स्त्री फिर दिखती है। वह हक्का बक्का है। पता चलता है कि देश के सबसे ताकतवर इंसान का उसे संरक्षण हासिल है और वह नासा में एक खास मकसद से है।
ईमानदार कोशिश, छलावे का कारोबार
अपना काम पूरी ईमानदारी से कर रहे नासा के स्टेशन डायरेक्टर कोल डेविस के जीवन में एकाएक आसमान से जो ये महिला आ गिरी है, उसका नाम फिलहाल केली जोन्स है। बचपन उसका तंग हालात में बीता और रास्तों पर लोगों को बुद्धू बनाते बनाते जब वह न्यूयॉर्क पहुंची तो उसे लगा कि यही काम बड़े लोग थोड़ा सज धजकर करते हैं और सेल्स के दिग्गज कहलाते हैं। उसे यही धंधा भाता है। वह मीडिया में नैरेटिव गढ़ने की उस्ताद है। पत्रकारों को लॉलीपॉप देकर खबर बनाना उसे आता है। अमेरिकी संसद में मून मिशन के लिए पैसा पास होना है। इसके लिए नासा की इमेज जनता के बीच सुधारी जानी है। ये सब कैसे होता है, फिल्म ‘फ्लाई मी टू द मून’ नेता, पीआर मशीनरी, मीडिया और नैरेटिव बनाकर जनता को बुद्धू बनाने की सारी पोल खोलती जाती है।
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कैसे सिनेमा बनता है सॉफ्ट पॉवर?
लेकिन, केली जोन्स बनी स्कारलेट जोहानसन की अदाकारी का असली इम्तिहान वहां होता है जहां उन्हें अपोलो इलेवन के जरिए चांद पर जा रहे तीन अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों जैसी ही एक घटना नासा के ही एक गुप्त स्थान पर टीवी के लिए ‘क्रिएट’ करनी है। वह न सिर्फ नासा का पूरा का पूरा मून मिशन चुरा लेती है और कदम दर कदम ठीक वैसी ही चीजें स्टूडियो में तैयार कर देती है, बल्कि चांद पर नील आर्मस्ट्रॉन्ग के उतरने तक के उसके दाहिने और बायें कदम तक की जानकारी भी यहां रची जा रही है। मून मिशन के चांद पर पूरा होने के समय हकीकत में जो हो रहा होता है, बिल्कुल ठीक वैसा ही ‘नाटक’ नासा के एक हैंगर में फिल्माया जा रहा होता है। फिल्म ‘फ्लाई मी टू द मून’ की एक जबरदस्त अंतर्धारा है और वह ये कि अमेरिका अपने सिनेमा को सॉफ्ट पावर की तरह अब भी बहुत बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल कर रहा है।
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20 जुलाई को नील ने रखा चांद पर कदम
भारत में सिनेमा को सॉफ्ट पॉवर बनाते बनाते अनुराग ठाकुर सूचना मंत्री पद ही खो बैठे। सिनेमा को सॉफ्ट पॉवर बनाने का असल मकसद क्या होता है, ये फिल्म ‘फ्लाई मी टू द मून’ देखकर समझा जा सकता है। यहां एक फिल्म निर्देशक को पूरी दुनिया के सामने एक अलग नैरेटिव गढ़ने के लिए लगाया गया है। और, ये नकली काम इतनी सच्चाई से किया जा रहा है कि रूस यही मान लेता है कि अमेरिका के अंतरिक्ष यात्री चांद पर उतरे ही नहीं, ये तो सब एक स्टेज पर गढ़ा गया ड्रामा है। ये थ्योरी बीते 55 साल से चर्चा का विषय बनी हुई है कि नील आर्मस्ट्रांग चांद पर उतरे भी थे कि नहीं? 20 जुलाई 1969 की उस उपलब्धि को लेकर भ्रम की कहानी कहां से पैदा हुई, फिल्म ‘फ्लाई मी टू द मून’ इसी को दर्शकों के सामने पेश करती है और पूरा फिल्म का लब्बोलुआब इस संवाद में ढाल देती है, “सच तो सच ही रहेगा चाहे उस पर कोई यकीन न करे और झूठ भी झूठ ही रहेगा चाहे उस पर सब यकीन कर लें।”
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चैनिंग टैटम की चमत्कारी शख्सियत
फिल्म ‘फ्लाई मी टू द मून’ नए दौर के सिनेमा को आगे लाने वाली फिल्म है। ये फिल्म स्कारलेट जोहानसन के ‘एवेंजर्स’ वाले साथी क्रिस ईवान्स के साथ शुरू हुई थी। फिल्म के निर्देशक बदले तो शेड्यूल भी बदल गया और फिर क्रिस की जगह चैनिंग टैटम ने ले ली। पता नहीं क्रिस ईवान्स होते तो इस किरदार में क्या ही करते लेकिन चैन्गिंग टैटम ने जिस शिद्दत से ये किरदार निभाया है, उसके लिए वह स्टैंडिग ओवेशन के हकदार हैं। नील आर्मस्ट्रॉन्ग के चांद पर कदम रखते समय जब उसे पता चलता है कि जो वह टीवी पर देख रहा है वह चांद से आ रही असली फीड है, तो उसका उत्साह से उछलना और ये कहना “दे आर अवर्स” उसकी अदाकारी को चरम बिंदु तक ले आता है।
जोहानसन की अवार्ड विनिंग अदाकारी
और, फिल्म ‘फ्लाई मी टू द मून’ की रग रग में जो उत्साह है वह स्कारलेट जोहानसन ही हैं। उनकी अदाकारी के बारे मे पढ़ने से ज्यादा आनंद उनकी अदाकारी देखने में हैं। उनका ये अभिनय अगले साल उन्हें तमाम पुरस्कार दिलाने वाला है और बात ऑस्कर तक जा पहुंचे तो हैरान नहीं होना चाहिए। स्कारलेट के किरदार के कैटलिस्ट (उत्प्रेरक) बने हैं अभिनेता वूडी हैरेलसन एक रहस्यमयी शख्सियत मोए बरकस के किरदार में। फिल्म में छोटे से छोटे कलाकार ने फिल्म के बड़े कैनवस को प्रभावी बनाने में अपना सौ फीसदी योगदान किया है। सोनी पिक्चर्स ने ये फिल्म एपल टीवी के ग्राहकों के लिए बनाई है, लेकिन इस फिल्म में इसके निर्देशक ग्रेग बरलान्टी का काम इतना जबर्दस्त रहा है कि ओटीटी ने इसे सिनेमाघरों में भी रिलीज करने का फैसला किया है। अभिनय के विद्यार्थियों के लिए फिल्म एक पाठशाला है और सुधी फिल्म दर्शकों के लिए एक ऐसी मधुशाला, जिसकी खुमारी फिल्म देखने के बाद कई दिनों तक कायम रहने वाली है।