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बात बनाने में नाकामयाब है 'बात बन गई'
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
Updated Wed, 16 Oct 2013 11:55 AM IST
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बॉलीवुड के लोग शेक्सपीयर बाबा के भूत का पीछा नहीं छोड़ रहे। बाबा के प्रेम और कॉमेडी के फार्मूले माल-ए-मुफ्त की तरह यहां लेखकों-निर्देशकों की जेब में हैं।
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सोलहवीं सदी में हुए इस महान लेखक की किस्सागोई इक्कीसवी सदी में पर्दे पर खूब उतारी जा रही है। परंतु ज्यादातर सस्ते ढंग से। फिल्म ‘बात बन गई’ का मालमला भी कुछ ऐसा ही है।
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शेक्सपीयर के कालजयी नाटक द कॉमेडी ऑफ एरर्स से प्रेरित यह फिल्म हमशक्लों की कहानी है, जिन्हें निर्देशक शुजा अली ने आज के जमाने का जामा पहनाने की कोशिश की है। जिसमें वे नाकाम हैं। शुजा की यह पहली फिल्म है।
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रचना (अनीसा बट) के प्यार में पड़ कर कबीर (अली फजल) उसके प्रोफेसर भाई लक्ष्मी निवास (गुलशन ग्रोवर) के घर में एंट्री करता है। उन्हें इंप्रेस करता है। जब राज खुलता है तो लक्ष्मी बनावटी गुस्सा दिखाते हुए दोनों की शादी करने को राजी हो जाते हैं। यहां कहानी में ट्विस्ट आता है और कबीर के डुप्लीकेट रसिया का प्रवेश होता है।
रसिया भू-माफिया डॉन कार्लोस रहबर पाशा (रज्जाक खान) के लिए मकान/बंगले खाली कराने का काम करता है। पाशा की नजर लक्ष्मी के निवास पर है। लेकिन लक्ष्मी के घर में घुसते ही रसिया का दिल रचना पर आ जाता है। वह सपने देखने लगता है। पाशा रसिया को एक और बंगला खाली कराने का काम भी देता है, जो देबू का है।
देबू एक डांस टीचर और लक्ष्मी का डुप्लीकेट है। अब रसिया का दिमाग चल पड़ता है कि किसी तरह कबीर और लक्ष्मी को काबू में करके रचना से शादी कर ली जाए। बात बनाने की वह अपनी ओर से हर संभव कोशिश करता है। मगर नाकाम रहता है।
सच कहिए तो सिनेमा में आज जिंदगी की इतनी जटिलताएं उतारी जा चुकी हैं कि शेक्सपीयर की किस्सागोई की आड़ में रची गई फिल्में समय से पिछड़ी मालूम पड़ती हैं। बीते कुछ समय में बनी फिल्मों की नाकामी से यह साबित हुआ है। विफलता का एक पक्ष यह भी है कि बनाने वाले उन्नीस साबित हुए।
बात बन गई निराश करती है। इसकी स्क्रिप्ट बहुत शिथिल है। परिस्थितियां और संवाद कहीं गुदगुदाते भी नहीं। हंसाना दूर की बात है। 'थ्री इडियट्स' 'फुकरे' की सीमित भूमिकाओं में अली फजल ने जितना प्रभावित किया था, वह परिश्रम यहां मिली दोहरी भूमिका में व्यर्थ चला गया है।
रसिया की भूमिका में तो वह बहुत ही बनावटी मालूम पड़ते हैं। अनीसा बट और अमृता रायचंद का काम उल्लेखनीय नहीं हैं। गुलशन ग्रोवर जरूर अपनी दोहरी भूमिकाओं से न्याय करते हैं।
फिल्म का गीत-संगीत निरर्थक है। १९८२ में लेखक-निर्देशक गुलजार ने शेक्सपीयर की इस महान कॉमेडी पर महान फिल्म बनाई थी अंगूर। वह आपको आज भी कॉमेडी का डबल मजा देगी। निःसंदेह 'बात बन गई' खट्टे अंगूर है।