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9/11 पर बनी एक औसत फिल्म है 'द रिलेक्टेंट फंडामेंटलिस्ट'

Sat, 18 May 2013 11:18 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Sat, 18 May 2013 11:18 AM IST
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film review of the reluctant fundamentalist

न्यूयॉर्क में 9/11 की घटना के बाद पश्चिमी देशों में एशियाई मूल के मुसलमानो के प्रति एक संदेह की प्रवृति विकसित हुई थी। थोड़े से बदले स्वरूप में यह आज भी जारी है। 9/11 की इस घटना के कुसूरवार कौन थे, उन्हें उनके इस कृत्य की सजा मिली या नहीं इन सब बातों से अलग हटकर इस बात पर भी चर्चा होती रही है कि इस घटना के बाद बेकसूर मुसलमानों पर जुल्म किए गए।

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यह जुल्म शारीरिक और मानसिक दोनों ही थे। उस घटना के बाद न्यूयॉर्क या अमेरिका के बाकी शहरों में रह रहे मुसलमानों की जिंदगी सिर्फ इसलिए तबाह हो गयी क्योंकि वह मुसलमान थे। 9/11 की घटना और उसके बाद हुई प्रतिक्रिया पर लगभग हर देश में फिल्में बन चुकी हैं। कुछ फिल्में बदले में हुई अमेरिकी कारवाई को जस्टीफाई करती हैं तो कुछ फिल्में इस कारवाई में बर्बरता देखती हैं।
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विषय पुराना, अंदाज उबाऊ


हिंदी में भी 'माई नेम इज खान' और 'न्यूयॉर्क' जैसी सफल फिल्में इसी विषय के इर्द-गिर्द बुनी गयी हैं। मीरा नायर की फिल्म 'द रिलेक्टेंट फंडामेनटेलिस्ट' इसी विषय पर फिर से अपनी बात कहने की कोशिश करती है। मीरा की यह फिल्म किसी एक पक्ष लेने के बजाय इस बात पर ज्यादा फोकस्ड है कि कोई एक पूरी तरह से सही या गलत नहीं था। सब ने वही किया जो उन्हीं उस समय सही लगा।
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मीरा की इस फिल्म की दिक्कत यह है कि वे न तो घटना और उसकी प्रतिक्रिया को सही तरीके से दिखा पाती है। जब आप ऐसी फिल्म बना रहे होते हैं तो जाहिर है कि आपके पास प्रयोग करने की भी खुली छूट होती है। दर्शक उसी छूट के दायरे को ही देखने के लिए आते हैं। लेकिन मीरा इस छूट का दुरुपयोग करती हैं। उन्होंने इस पुराने विषय को एक पुराने अंदाज में ही पहले की तुलना में जरा सुस्त तरीके से परोस दिया है।

हॉलीवुड पैटर्न की फिल्मों से उलट यह फिल्म लंबी और उबाऊ है। इंटरवल के बाद दम तोड़ चुकी इस फिल्म से दर्शक सिर्फ इतनी उम्मीद करने लगते हैं कि कब यह फिल्म बाइंड अप हो। कैमरे से कुछ कमाल दिखाने के अलावा यह फिल्म कुछ और नहीं कर पाती है। ओम पुरी और शबाना आजमी जैसे मंझे हुए कलाकारों का सही इस्तेमाल भी नहीं।

कहानी कन्फ्यूज्ड चंगेज़ की

मोहसीन हमीद के इसी नाम पर लिखे उपन्यास पर आधारित यह फिल्म एक पाकिस्तानी युवक चंगेज खान की कहानी कहती है। चंगेज एक बड़ा लिखा युवा है और वह अमेरिका में एक फाइनेंशियल एडवाइजर के रूप में काम कर रहा है। सब कुछ बढ़िया चल रहा है। उसके पास एक अच्छी नौकरी के साथ उसे चाहने वाली एक प्रेमिका भी है।

अचानक 9 सितंबर 2001 को अचानक हुयी इस घटना के बाद सब कुछ बदल जाता है। लोगों का चंगेज के प्रति नजरिया, चंगेज का अमेरिका को देखने का दृष्टिकोण, चंगेज के अपने सपने और योजनाएं भी। चंगेज की प्रेमिका इस बात पर एक फिल्म बना देती है कि उसका ब्वॉयफ्रेंड एक पाकिस्तानी मुसलमान था। चंगेज पाकिस्तान लौटता है और प्रतिक्रिया स्वरूप अपने कॉलेज के बच्चों को पाकिस्तानी स्वाभिमान का पाठ पढ़ाने लगता है।

पाकिस्तान के जासूस चंगेज को आतंकी समझने लगते हैं। चंगेज वाकई खुद भी कन्फ्यूज्ड है। वह कभी खुद को अमेरिकियों का सताया हुआ मुसलमान मानता है कभी खुले दिल वाला एक इंसान। वह दोनों ही चीजों को जस्टीफाई करता है। फिल्म के अंत में उसे लोगों को प्रतिक्रियावादी न बनने का उपदेश देता हुआ सुनाया जाता है।


तो क्यों बनायी गयी है यह फिल्म?

इस फिल्म की पटकथा मोहसीन हमीद के साथ विलयम व्हीलर ने लिखी है। यह फिल्म जब न्यूयॉर्क में होती है तो कुछ सुधरी सी लगती है लेकिन पाकिस्तान आते ही बिखर जाती है। पाकिस्तान के आंतरिक हालातों को बड़े बचकाने और सतही अंदाज में दिखाया गया है। यह दरअसल पटकथा ही नहीं बल्कि मीरा नायर की चूक थी। पूरी फिल्म देखने के बाद दर्शक यह समझ नहीं पाते कि उन्होंने यह फिल्म बनायी क्यों।

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