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सुपर नानीः अब रेखा को नानी बनते देख लीजिए

Fri, 31 Oct 2014 02:33 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई Updated Fri, 31 Oct 2014 02:33 PM IST
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film review of super nani

वक्त के गुजरने के साथ सब कुछ नहीं बीतता। कुछ चीजें ठहरी रहती हैं या उनके बदलने की रफ्तार बहुत ही धीमी होती है। महिला सशक्तिकरण के दौर में धरातल पर चीजें बदलती दिख रही हैं, लेकिन कई बातें हैं जिन्हें गहराई में बदलने की जरूरत है। निःसंदेह इनमें वक्त लगता है। निर्देशक इंद्र कुमार की फिल्म सुपर नानी कुछ ऐसी बातों की तरफ इशारा करती है।

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बेटियां-बहुएं अगर तेज रफ्तार वक्त के साथ बढ़ रही हैं तो क्या मां, नानी और दादी की भी किसी को फिक्र है? हर सफल पुरुष के पीछे अगर एक स्त्री है तो कहीं वह पीछे ही तो नहीं रह जा रही? मुद्दा यह भी कि पीछे रह जाने के पीछे वह खुद ही जिम्मेदार तो नहीं? सुपर नानी अपनी मेकिंग और कहानी कहने के अंदाज में भले ही थोड़ी पुरानी मालूम पड़े, लेकिन जो सवाल वह उठाती है, वे वाजिब हैं।
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मुंबई में रहते हुए घर, पति और बच्चों की देखभाल में चालीस साल गुजार देने वाली भारती भाटिया (रेखा) आदर्श भारतीय नारी है। लेकिन न पति (रणधीर कपूर) को उसकी कद्र है और न बेटे-बहू को। ऐसे में एक दिन उसका नवासा मन (शरमन जोशी) न्यूयॉर्क से मुंबई आता है। नानी का हाल देख कर वह हैरान। वह नानी को समझाता है कि उसकी बातों और प्यार से कुछ नहीं बदलेगा, सबसे पहले खुद को बदलना होगा।
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फिर शुरू होती है नानी के सुपर नानी बनने की कहानी। नानी खूबसूरत है और डॉक्युमेंट्री बनाने वाला नवासा उनकी तस्वीरें खींच कर विज्ञापन एजेंसियों को भेजता है। नानी कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ने लगती है और एक एक कर ऐसी घटनाएं होती हैं, जो परिवार लोगों को सबक सिखाने के साथ उनकी कद्र करना भी सिखाती हैं। यह पारिवारिक फिल्म है, जो आपको अस्सी के दशक की भी लग सकती है। कई जगह गंभीर दृश्य कॉमिक भी लग सकते हैं।

निर्देशक ने अगर इन बातों का खयाल रखा होता तो सुपर नानी ऐसी न होती, जैसी है। फिल्म का भार रेखा के कंधों पर है। बरसों बाद वह मुख्य भूमिका में लौटी हैं। उनके चाहने वालों को फिल्म पसंद आए न आए, रेखा जरूर पसंद आएंगी। आधुनिक हो चुके पति और बच्चों द्वारा घरेलू स्त्री को कमतर आंकने की कहानी इंग्लिश विंग्लिश अभी लोग भूले नहीं हैं। इंद्र कुमार की इस फिल्म से वह कहीं ज्यादा सटीक थी।

सुपर नानी देख कर आपको रवि चोपड़ा की अमिताभ बच्चन स्टारर बागवां भी याद आएगी। कह सकते हैं कि सुपर नानी रेखा की बागवां है। इन दिनों हम विदेशी मूल की बॉलीवुड हीरोइनों को पर्दे पर गलत-सलत अंदाज वाली हिंदी बोलते देख रहे हैं। निर्देशक ने शरमन जोशी को अमेरिका में पले-बढ़े ऐसे युवक के रूप में पेश किया है जो सदा भ्रष्ट हिंदी बोलता है।


हिंदी की कमाई खाने वाले फिल्मकार मां का सम्मान करने की सीख तो देते हैं लेकिन मातृभाषा के अपराधी हैं। इंद्र कुमार ने अपनी बेटी को इस फिल्म से रीलॉन्च किया है। निश्चित रूप से वह उन्हें खुश नहीं कर सके होंगे। सुपर नानी को मल्टीप्लेक्स दर्शक गंभीरता से नहीं लेंगे। छोटे शहरों और कस्बों में वह संवेदनाएं जरूर बची हैं, जिससे वे इस फिल्म से जुड़ सकें।


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