फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Entertainment ›   Movie Review ›   film review of inkaar

इंकारः महात्वाकांक्षा और खुदगर्जी में लिपटी प्रेम कहानी

Fri, 18 Jan 2013 03:20 PM IST
रोहित मिश्र
रोहित मिश्र Updated Fri, 18 Jan 2013 03:20 PM IST
विज्ञापन
film review of inkaar

किसी भी इंडस्ट्री में हम आगे बढ़ने के लिए पहले गॉड फादर बनाते हैं फिर उसी से छुटकारा पाने के तरकीबें सोचनी शुरू कर देते हैं। शायद यह सोचकर अब मेरी प्रगति से वो बंदा खुश नहीं होगा। यह मनोवृति सुधीर मिश्र की फिल्म 'खोया खोया चांद में' डॉयलाग के तौर पर सामने आती है। 'इंकार' में उन्होंने उसी बात को एक्सप्लोर करने का प्रयास किया है।

विज्ञापन


सुधीर मिश्र व्यक्ति की मनोवृति के अंदर तक जाकर पोस्ट-मार्टम करने वाले फिल्मकार माने जाते हैं। 'इंकार' फिल्म कुछ वैसी ही दिमागी गंथ्रियों की तफशीश करती है जिनके साथ हम जीवन के छोटे-बड़े फैसले कर रहे होते हैं। घोषित तौर पर 'इंकार' का विषय सेक्सुअल हैरसमेंट हैं पर इससे आगे बढ़कर देखने पर यह एक किस्म की प्रेम कहानी नजर आती है। महात्वाकांक्षाओं और खुदगर्जी के इर्द-गिर्द लिपटी एक प्रेम कहानी।
विज्ञापन


फिल्म इस मनोविज्ञान को भी परिभाषित करती है कि यदि एक बार हम किसी से प्रेम कर बैठते हैं तो ताउम्र हम उसके प्रति उदासीन नहीं हो पाते। उसके प्रति पनपने वाली नफरत भी एक किस्म उदासी या चिंता होती है। इंकार फिल्म के दोनों मुख्य किरदार इन्हीं मनोवृतियों के शिकार पाए जाते हैँ। वह एक-दूसरे से प्यार तो करते हैं पर उनकी महात्वाकांक्षाओं की दीवारें उनके प्रेम से कम ऊंची नहीं होती हैं। फिल्म इंकार इन्हीं के बीच कुछ कहने का और कहीं पर बचकर निकलने का प्रयास करती है। फिल्म मनोरंजन करती है या नहीं यह इस बात पर तय करता है कि दर्शक का मनोरंजन किस बात से होता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


कहानी
एक मल्टीनेशनल विज्ञापन कंपनी की क्रिएटिव हेड माया लूथरा (चित्रांगदा सिंह) उसी कंपनी के सीईओ राहुल वर्मा (अर्जुन रामपाल) पर सेक्सुअल हैरेसमेंट (यौन शोषण) का आरोप लगाती हैं। इस बात की जांच के लिए कंपनी एक कमेटी बैठाती है। उस कमेटी के हेड के साथ कंपनी के कुछ कर्मचारी इस बात का फैसला देने के लिए बैठते हैं कि कौन सही है और कौन गलत। फिल्म उस कंपनी के कांफ्रेंस रूम से शुरू होती है। माया और राहुल यहां बारी-बारी अपना पक्ष रखते हैँ।

फिल्म जितना वर्तमान में चलती है उतना ही फ्लैशबैक में। कमेटी को लीड कर रहीं दीप्ती नवल को कुछ बातें राहुल से पता चलती हैं और कुछ बातें माया से। जो बातें यह छिपा रहे होते हैं कुछ वैसी बातें भी उनके कुलीग से मालूम होती हैं। फ्लैशबैक में यह फिल्म बताती है कि किस तरह से हकला-हकला प्रजेंटेशन देने वाली एक नॉन प्रोफशनल लड़की माया को राहुल कैसे मांजते और संवारते हैं। कैसे देखते-देखते दोनों के बीच एक स्वाभाविक प्यार आ जाता है। फ्लैशबैक यह भी बताते हैँ कि इन दोनों का प्यार इतना बड़ा भी नहीं होता कि यह अपने संवर और सज रहे प्रोफेशलन कॅरियर से समझौते कर लें। खासकार एक-दूसरे के प्यार की कीमत पर।

एक तीखी झड़प के बाद माया मुंबई छोड़कर उसी कंपनी के दिल्ली ऑफिस में शिफ्ट हो जाती हैं। मोड़ तब आता है जब वही माया कंपनी की क्रिएटिव हेड और बोर्ड ऑफ मेंबर बनकर मुंबई आ जाती हैं। इसके बाद महात्वाकांक्षाओं और सेल्फ ईगो का खेल शुरू होता है। इन दोनों को लगता है कि यह दोनों ही एक-दूजे के लिए ब्रेकर बनकर खड़े हो गए हैं। यहीं पर माया को लगना शुरू होता है कि राहुल का उसके प्रति व्यवहार सेक्सुअल हैरेसमेंट जैसा है। इसी बात की वह कंप्लेन करती है। फिल्म में फ्लैशबैक के अलावा सिर्फ तीन दिन का प्रजेंट है। तीसरे दिन कमेटी को इस बात का फैसला करना होता है कि कौन सही और कौन गलत। क्लाइमेक्स में कुछ ऐसा होता है जिसे हिंदी फिल्म देखने वाले 'प्यार की जीत' जैसा कुछ समझ कर जस्टीफाई कर सकते हैं। माया और राहुल यह स्वीकार करके कि वह एक-दूसरे से प्यार करते हैं, नौकरी छोड़ देते हैं। आगे कहानी फिल्म नहीं कहती है।

अभिनय
फिल्म का सबसे जबर्दस्त पक्ष अभिनय ही है। यह अर्जुन रामपाल के कॅरियर की शायद सबसे खूबसूरत फिल्म है। आत्मविश्वास से भरे हुए एक एड क्रिएटिव, एक महात्वाकांक्षी व्यक्ति और पजेसिव प्रेमी इन तीनों ही भूमिकाओं को अर्जुन ने अच्छे तरीके से जिया है। फिल्म में अर्जुन के हिस्से संवाद भी अच्छे आए हैं। चित्रांगदा सिंह के बारे में कहा जाता है कि उनसे सुधीर मिश्रा ही बेहतर काम ले सकते हैं यह सही भी लगा है। मूड के अलग-अलग शेड को चित्रांगदा ने बेहतर तरीके प्रजेंट किया है। अगर तुलनात्मक रूप से देखें तो इस भूमिका को शायद करीना कपूर उनसे बेहतर तरीके से कर सकती थीँ। इन दोनों के अलावा बाकी किरदारों के पास अभिनय के बहुत मौके नहीं रहे हैं। विपीन शर्मा, गौरव द्विवेदी और दीप्ती नवल भी अपनी भूमिकाओं को जस्टीफाई करते हैं।

निर्देशन
सुधीर मिश्र ने यह फिल्म एक खास दर्शक वर्ग को ध्यान में रखकर बनाई है। भारत के ए और बी श्रेणी के शहरों के नौकरीपेशा इस फिल्म के टारगेट आडियंस हैं। यह अपने आप में एक खतरा भी है। ऐसे दौर में जब यह नौकरीपेशा वीकेंड में ऑफिस से दूर हटकर एक काल्पनिक दुनिया में खोकर मनोरंजन करना चाहता है हम उसे फिर से ऑफिस में शामिल कर दें। बावजूद इसके यह फिल्म उन दर्शकों को मनोविज्ञान के रूप में बहुत कुछ देती है। वह एक फिलॉसिफी लेकर घर जा सकते हैं। सुधीर मिश्रा सेक्सुअल हैरेसमेंट विषय को लेकर किसी को सही या गलत साबित नहीं करना चाहते थे। वह माया और राहुल दोनों को ही अपनी-अपनी जगह सही ठहराना चाहते थे। इस कशमकश का उन्होंने जो तोड़ निकाला है वह थोड़ा फिल्मी हो गया है। जब हम एक पूरी फिल्म को नॉन फिल्मी होकर देख रहे होते हैं तो उससे फिल्मी क्लाइमेक्स की उम्मीद कम करते हैं। इसे निर्देशक की एक 'इंटलैक्चुअल चूक' कह सकते हैं।


संगीत
फिल्म का संगीत जरूरत के अनुरूप है। फिल्म को संगीत शांतनू मोइत्रा ने दिया है। 'दरमिया' और 'मौला तू मालिक' है जैसे गीत फिल्म की पटकथा का हिस्सा जैसे लगते हैं। फिल्म का पार्श्वसंगीत भी दृश्यों के अनुरूप ही है।

क्यों देखें
अपने आसपास की ऑफिस की दुनिया को फिल्मी पदरे पर देखने के लिए। इस बात को देखने के लिए कि जो आप देखते हैं उसके अलाव 'बिटविन द लाइन' क्या छूट रहा है।

क्यों न देखें
यदि आप वीकेंड पर ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो आपको एक बार भी अपने ऑफिस की याद न दिलाए। आप ऐसी दुनिया चाहते हैं जो वास्तव में अच्छी है पर है नहीं।

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें Entertainment News से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। मनोरंजन जगत की अन्य खबरें जैसे Bollywood News, लाइव टीवी न्यूज़, लेटेस्ट Hollywood News और Movie Reviews आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed