गब्बर इज बैक: टिकट का पैसा और जाया वक्त वापस नहीं लौटता
देश और प्रदेशों की सरकारें अच्छा काम करें, अधिकारी ईमानदार हो जाएं और लोग स्वार्थ के बजाय सच्चाई के रास्ते पर चलें तो हम बहुत सारी बेकार फिल्में देखने से बच सकते हैं। अमूमन ऐसा होता नहीं। नतीजा यह कि बरसों से सत्ता, नेताओं और अधिकारियों को ठोकने में इतनी रीलें नष्ट हो चुकी हैं कि फार्मूला दम तोड़ गया है।
परंतु जैसे हर साल जलाने के बाद भी रावण मरता नहीं, वैसे ही ये फार्मूला फिल्में बार-बार पिटने के बावजूद टिकट खिड़की पर लौटती हैं। गब्बर इज बैक इसी का नमूना है। यह २००२ की निर्देशक आर.मुरुगदौस की फिल्म रामन्ना का रीमेक है, जो २००३ में तेलुगु में टैगोर नाम से बनी थी। दस-बारह साल पुराना बासी आइडिया हिंदी दर्शकों को रंग-रोगन करके परोसा गया है।
फगली और उंगली जैसी फिल्मों का एक और संस्करण
वैसे गब्बर इज बैक पिछले कुछ महीने में बॉलीवुड की फगली और उंगली जैसी फिल्मों का एक और संस्करण है। एक लीडर है। उसकी एक टीम है। सब मिल कर भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं को ऊपर पहुंचा रहे हैं। आदित्य बने अक्षय के भीतर का गब्बर तब जागता है, जब वह रिहायशी इमारत ढह जाती है, जिसे दलदल को ठोस जमीन बता कर बनाया गया था। ढही इमारत में आदित्य की नवविवाहिता पत्नी दबकर मर जाती है। तब वह भ्रष्टाचारियों को दुरुस्त करने निकल पड़ता है।
अगर ऐसे फार्मूलों से आप ऊबे नहीं हैं तो जरूर यह फिल्म देखें। वर्ना जहां फिल्म लगी है, वहां से पचास कोस दूर रहें। शोले के गब्बर को क्यों विलेनत्व से नायकत्व दे दिया गया, यह बताने की जहमत न लेखन ने उठाई और न निर्देशक ने। बस, नाम में दम लगा। तब रावण, कंस और दुर्योधन भी क्या बुरे हैं! इस च्अच्छे गब्बरज् के बावजूद मुंबई और रामगढ़ में जो फर्क हो सकता है, वही ओरीजनल गब्बर यानी शोले के अमजद खान और अक्षय कुमार में हैं।
अब तक की सबसे उबाऊ फिल्म
गब्बर इज बैक इस साल अब तक की सबसे उबाऊ फिल्मों में से है। कथा के साथ पटकथा और संवाद भी बेहद लचर हैं। यहां अक्षय न तो रोमांटिक हैं और न गुस्सैल। ऐक्शन भी तूफानी नहीं। अतः फैन्स के लिए भी यह फिल्म देखना चुनौती से कम नहीं है। श्रुति हासन के हिस्से जीरो बटा सन्नाटा जैसा रोल है। करीना कपूर आकर्षित नहीं करतीं। एक अच्छी अभिनेत्री नष्ट होने के बाद कैसे अपनी प्रतिभा का कंकाल मात्र रह जाती है, यह आप यहां आइटम डांस करती चित्रांगदा सिंह में देख सकते हैं। अगर कोई प्रभावित करता है तो कपिल शर्मा की कॉमेडी नाइट्स में गुत्थी बन कर नाम कमाने वाले सुनील ग्रोवर। लेकिन उनका रोल इस च्सावधानीज् से लिखा गया कि वह अक्षय को चुनौती न दे दें।
गीत-संगीत चलताऊ है। निर्देशक कृष की प्रतिभा आंकने के लिए आपको उनकी तेलुगु फिल्में देखनी होंगी। अब सवाल यह कि इस लंबे सप्ताहांत में क्या करें? कई लोगों के पास सोमवार की भी छुट्टी है। बेहतर हो कि इसे अच्छे कामों में लगाएं। पीएम ने स्वच्छता अभियान का आह्वान किया हुआ है। जाने कितने बेसहारा मदद की आस में हैं। बच्चों को बाहर घूमने की इच्छा है। अच्छी किताबें पढ़ी जाने की प्रतीक्षा में हैं। याद रखें, गब्बर भले ही लौट आए परंतु टिकट पर खर्च किया हुआ धन और गुजरा हुआ वक्त वापस नहीं आता।