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जानिए इस 'देशी कट्टे' में है कितना दम?
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
Updated Sat, 27 Sep 2014 10:35 AM IST
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दो दोस्त। भूखा बचपन। अपराध के रास्ते। यह फिल्मी फार्मूला है। जब इन्हें मिला कर आगे बढ़ा जाता है तो पहले बच्चों के लिए भगवान जैसा गॉडफादर आता है फिर हीरोइनें। हीरोइनें बारिश और समुंदर में नहाते हुए अपराध कथा में प्रेम रस घोलती हैं।
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जब लगता है कि दोस्तों की जिंदगी में सब ठीक हो जाएगा, तब विलेन आता है। एक दोस्त दूसरे के लिए जीवन का बलिदान देता है। हां, मरने वाले की प्रेमिका पहले ही विलेन का शिकार बन चुकी होती है। ऐसे में बलिदानी जीकर करेगा भी क्या।
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निर्देशक आनंद कुमार की यह फार्मूला फिल्म है, जिसमें दो दोस्त ज्ञानी और पाली देसी कट्टों का कारोबार करते हैं। वे अचूक निशानेबाज हैं। कहानी में ट्विस्ट यह कि उनकी जिंदगी में सेना का एक रिटायर्ड मेजर आता है और उनकी प्रतिभा को मांजकर विश्व चैंपियन बनाना चाहता है। एक दोस्त उसकी बात मान जाता है और दूसरा अपराध की दुनिया में आगे बढ़ जाता है।
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फिल्म बेहद सुस्त रफ्तार है। इसमें दृश्यों-संवादों के दोहराव हैं। नेताओं को विलेन और देशद्रोही दिखाने का फैशन है। यहां भी ऐसा नेता ही दिखता है। पिस्टल शूटिंग का ट्रेक जरूर नया है, लेकिन उसमें ऐक्शन, इमोशन और ड्रामा सब गायब है। निर्देशक आनंद कुमार इससे पहले डेल्ही हाइट्स, जुगाड़ और जिला गाजियाबाद जैसी फिल्में बना चुके हैं।
परंतु नाकामियों से उन्होंने कुछ सीखा हो, ऐसा नहीं लगता। रियलिस्टिक एप्रोच के बावजूद फिल्म नकली लगती है। कहानी के साथ ऐक्शन और रोमांस के स्तर पर भी निराश करती है। गीत-संगीत से उम्मीद छोड़ दें। जबकि इनसे कैलाश खेर का नाम जुड़ा है।
जय भानुशाली ने ज्ञानी की भूमिका से जरूर न्याय किया है, लेकिन पाली बने अखिल कपूर अपनी पहली फिल्म में बहुत निराश करते हैं। अखिल बीते जमाने के अभिनेता विनोद खन्ना के भांजे हैं। वह विलेन बनना चाहते हैं या हीरो, इसे लेकर कनफ्यूज हैं। पर्दे पर उनका चेहरा उम्मीद नहीं जगाता। टिया वाजपेयी और साशा आगा ने अपने हिस्से में आया काम किया है। सुनील शेट्टी और आशुतोष राणा ने अपने काम को सही ढंग से अंजाम दिया है। उनके प्रशंसक जरूर फिल्म देख सकते हैं।