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कमांडोः एक्शन को छोड़ बाकी सब बासी
रोहित मिश्र
Updated Sat, 13 Apr 2013 11:15 AM IST
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'कमांडो ए वन मैन आर्मी' से यदि रियल से लगने वाले कुछ एक्शन सीन हटा लिये जाएं तो यह एक रीजनल सिनेमा की दोयम दर्जे जैसी फिल्म हो जाएगी। फिल्म की एकमात्र खूबसूरती उसका एक्शन है। इस एक्शन को कंप्यूटर या ग्राफिक्स डिजाइन के जरिए नहीं बल्कि रियल तरीके से शूट किया गया है। लगता है कि कि वाकई कोई आदमी दस-बीस गुंडों को पीट रहा है।
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इन एक्शन दृश्यों के अलावा यह फिल्म, अपनी कहानी, उसे कहने के अंदाज और अभिनय तीनों ही क्षेत्रों में बुरी तरह से मात खाती है। फिल्म में जो बातें फलैशबैक में होनी चाहिए वहां से यह फिल्म शुरू होती है। फिल्म में घटनाओं को दिखाने का सीक्वेंस भी फिल्मी न होकर एक अपराध समाचार जैसा सपाट लगता है। फिल्म में लीड रोल कर रहे विद्युत जामवाल एक्शन दृश्यों में जितने अच्छे और सहज लगते हैं अभिनय करने के मामले में उतने ही कमजोर और बनावटी।
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फिल्म एक्शन दृश्यों पर इतनी आश्रित है कि गानों में भी विद्युत डांस नहीं बल्कि एक्शन कर रहे होते हैं। कोई भी फिल्म कुछ अच्छे दृश्यों का कोलाज बनाकर अच्छी नहीं बनायी जा सकती है यह बात फिल्म के निर्देशक दिलीप घोष को अंत तक समझ में नहीं आती।
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लड़की को बचा रहा है एक कमांडो
यह कहानी भारतीय सेना के एक कमांडो करन (विद्युत जामवाल) की है। नियमित अभ्यास के दौरान करन का हेलीकॉप्टर चीन के सीमा के पास क्रैस हो जाता है। चीनी सेना उसे भारत का जासूस समझ कर गिरफ्तार कर लेती है। लंबी यातना के बाद करण वहां से भाग निकलता है। वहां से निकलकर वह पंजाब के एक कस्बे सियालकोट पहुंचता है।
वहां बस स्टॉप पर उसे घर से भागी हुई एक लड़की सिमरन (पूजा चोपड़ा) मिलती है। उसके पीछे उस इलाके के बड़े बदमाश एके-74 (जयदीप अहलावत) गुंडे लगे होते हैं। करन, पूजा को उन गुंडों से बचाता है। अब एके 74 का दुश्मन पूजा के साथ करण भी है। करन, पूजा को लेकर जंगल में भाग जाता है। एके 74 और उसके गुंडे जंगल में भी उसका पीछा करते हैं। यहां करन और एके 74 के आदमियों के बीच कई बार मुठभेड़ होती है।
कई फिल्मों की तरह यहां भी चुप से रहने वाले करन पर बातूनी सिमरन फिदा हो जाती है। फिल्म के क्लाइमेक्स में यह दिखाया जाता है कि करन, किस तरह से एके 74 को सियालकोट के चौराहे पर सरेआम फांसी देता है, जोकि अस्सी के दशक की फिल्मों जैसा लगने लगता है।
एक्शन करना अभिनय नहीं होता
यदि खालिस अभिनय की बात की जाए तो एके 74 का किरदार निभाने वाले जयदीप अहलावत सब पर भारी पड़े हैं। सफेद आंखों वाला ऐसा इंसान जो किसी का कत्ल करते समय उसे संता-बंता के जोक सुनाता है दर्शकों को डराता भी है और हंसाता भी।
फिल्म का लीड रोल करने वाले विद्युत जामवाल ने एक्शन दृश्यों में अपनी खूबी दिखायी है। ऐसा एक्शन जो रियल भी लगे और प्रभावी भी। लेकिन जहां बात अभिनय की आती है विद्युत खामोश से हो जाते हैं। कुछ डायलॉग जो उनसे बुलवाए गए हैं वह अच्छे होते हुए भी अपनी चमक खो देते हैं। एक गाने में भी उनका एक्शननुमा डांस करना मजाकिया लगता है।
2009 में मिस वर्ल्ड रहीं पूजा चोपड़ा की यह पहली फिल्म है। पूजा सुंदर तो लगती हैं पर वह अभिनय बिल्कुल नहीं कर पातीं। अपने मां-बाप के मरने की बात वह उस अंदाज में कहती हैं जिस अंदाज और संजीदगी से लोग घर की चाभी खो जाने की बात कहते हैं। लगता है कि संवाद पूजा के मुंह में ठूंस दिए गए थे और उन्होंने बस उन्हें मुंह से किसी तरह निकाल दिया।
कहीं अच्छे तो कहीं बांसी लगे निर्देशक
फिल्म से थोड़ा-बहुत इत्तफाक रखने वाले दर्शकों को यह बार-बार लगेगा कि यह निर्देशक की पहली फिल्म है। हिंदी फिल्मों में दर्जनों बार प्रयोग किए गए कई सीन उठाकर यहां डाल दिए गए हैं। फिल्म के क्लाइमेक्स में जब विलेन की गोली से घायल हुआ हीरो दोबारा उससे बदला लेने के लिए लौटता है तो बैकग्राउंड में चढ़ता हुआ सूरज दिखाना मजाकिया और भद्दा सा लगता है।
दिलीप घोष की मजबूती एक्शन दृश्यों में दिखती है। एक्शन दृश्यों को रियल तरीके से दिखाने के अलावा दिलीप हर जगह कमजोर और पुरानी फिल्मों की नकल करते हुए दिखे हैं। फिल्म का अंत और उस अंत के तरीके को भांप चुके दर्शक जब फिल्म के खत्म होने का इंतजार किया करते हैं तो उसी समय आया एक आयटम सॉन्ग उन्हें इरीटेट कर देता है। दिलीप को कहां पर क्या दिखाना है यह कला भी सीखनी होगी।
गाना एक ही अच्छा
राहत फतेह अली खान द्वारा गाया गया गाना "सावन बैरी" सुनने में अच्छा लगता है। बाकी के सारे गाने कमजोर और बकवास हैं।
क्यों देखें
यदि आप कुछ ऐसे एक्शन सीन देखना चाहते हैं जो वाकई रियल लगें।
क्यों न देखें
एक्शन दृश्यों के अलावा फिल्म में कुछ भी देखने लायक नहीं है।